तेहरान(ईएमएस)। अमेरिकी ब्लॉकेड और सख्त आर्थिक पाबंदियों के कारण ईरान का तेल निर्यात लगभग ठप हो गया है, जिससे देश के सामने एक अभूतपूर्व संकट खड़ा हो गया है। ईरान के जमीनी तेल भंडार पूरी तरह भर चुके हैं और अब उसके पास नया तेल रखने के लिए जगह नहीं बची है। इस गंभीर स्थिति से निपटने के लिए तेहरान ने एक ऐसा रास्ता निकाला है जो दुनिया की नजरों के सामने है, लेकिन दुश्मन उस पर कार्रवाई करने में तकनीकी रूप से लाचार नजर आ रहे हैं। ईरान ने अपनी मुख्य पाइपलाइनों और उत्पादन को बंद करने के बजाय अपने विशालकाय और पुराने टैंकरों को ही चलता-फिरता गोदाम यानी फ्लोटिंग स्टोरेज में तब्दील कर दिया है। ईरान के कुल तेल निर्यात का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा खार्ग आइलैंड से होकर गुजरता है, जहां फिलहाल अमेरिकी नौसेना की कड़ी घेराबंदी है। तेल के कुओं से उत्पादन बंद करना ईरान के लिए एक बड़ा जोखिम है, क्योंकि एक बार कुएं बंद होने पर उन्हें दोबारा शुरू करने में भारी तकनीकी और वित्तीय नुकसान हो सकता है। इसी नुकसान से बचने के लिए ईरान अपने पुराने जहाजों को खार्ग आइलैंड के पास समंदर में खड़ा कर उनमें हर दिन करीब 10 लाख बैरल तेल भर रहा है। जब तक ये जहाज अंतरराष्ट्रीय जलसीमा में निर्यात के उद्देश्य से आगे नहीं बढ़ते, तब तक उन पर सीधी कार्रवाई करना मुश्किल बना हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान के जमीनी टैंकों में अब केवल 10 से 13 दिनों का बैकअप बचा है, जिसके कारण वह समंदर की लहरों पर समय बचाने की कूटनीतिक चाल चल रहा है। हालांकि, ईरान का यह जुगाड़ बहुत लंबे समय तक प्रभावी नहीं रह सकता। टैंकरों की अपनी एक भंडारण क्षमता है और यदि अगले दो हफ्तों के भीतर कोई कूटनीतिक समाधान नहीं निकला, तो ईरान को मजबूरन अपना तेल उत्पादन बंद करना होगा। यह स्थिति न केवल ईरान की अर्थव्यवस्था के लिए घातक सिद्ध होगी, बल्कि वैश्विक तेल बाजार में भी बड़ी उथल-पुथल मचा सकती है। इस तनाव का असर पूरी दुनिया पर दिखने लगा है। होर्मुज जलडमरूमध्य, जिसे वैश्विक तेल व्यापार की जीवनरेखा माना जाता है, वहां अब सन्नाटा पसरा हुआ है। सामान्य दिनों में जहाँ यहाँ से रोजाना 140 जहाज गुजरते थे, वहां अब इनकी संख्या घटकर महज 5 रह गई है। इस आपूर्ति संकट के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं। जापान सहित कई विकसित देश अब तेल के वैकल्पिक स्रोतों की तलाश में जुट गए हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि यह तनाव कभी भी एक भीषण युद्ध का रूप ले सकता है। वीरेंद्र/ईएमएस 27 अप्रैल 2026