लेख
27-Apr-2026
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भगवान सत्यनारायण की कथा शायद ही ऐसा कोई हो,जिसने सुनी न हो।इस ऐतिहासिक , पुरातन व धार्मिक कथा को हरि चापेकर ने लिखा था,जिसका वाचन प्रायः हर शुभ मुहूर्त व पूजा अर्चना के समय पंडित जी करते है। आज जो घर घर में सत्यनारायण की कथा घर की सुख सम्रद्धि के लिए कराई जाती है,उस कथा को हरी चापेकर ने सन 1877 में लिखा था, स्कंद पुराण के आधार पर ये कथा लिखी गई थी। इन्ही हरि चापेकर के तीन पुत्रो ने देश की आजादी के लिए फांसी के फंदे पर झूलकर राष्ट्रभक्ति की अनूठी व वंदनीय मिशाल पेश की थी। हरि चापेकर के पिता विनायक चापेकर ,महाराष्ट्र में पुणे के पास चिंचवाड़ के रहने वाले थे।विनायक चापेकर को व्यापार में बार बार घाटा होने व देश पर गुलामी की छाया से उभरने के लिए उनके पुत्र हरि चापेकर ने भगवान की शरण मे कीर्तन करना शुरू किया।पहले कुछ मित्रो के साथ और बाद में बेटों को साथ लेकर कीर्तन करने लगे। हरि चापेकर ने संगीत केवल शौक के लिए सीखा था। बाद में उसी संगीत को उन्होंने गृहस्थी चलाने का माध्यम बना लिया। भगवान का कीर्तन करते हुए वे रूहानियत की दुनियां में खो जाते थे।उनके तीनों बेटे दामोदर चापेकर, बालकृष्ण चापेकर और वासुदेव चापेकर कीर्तन की बदौलत ही पलने व बढ़ने लगे। उन्होंने अंग्रेजों से देश को मुक्त कराने के लिए लोकमान्य गंगाधर तिलक से संपर्क किया। लोकमान्य तिलक की प्रेरणा से उन्होंने एक व्यायाम मंडल बनाया और उसके जरिए युवकों को जोड़ने लगे और अंग्रेजों के खिलाफ माहौल बनाने में जुट गए। एक दिन मुंबई में क्वीन विक्टोरिया के पुतले पर दामोदर चापेकर ने तारकोल पोतकर उसके गले में जूतों की माला डाल दी। चापकेर बंधुओं के खिलाफ पुलिस ने चार्जशीट में इस घटना का जिक्र किया गया है।लोकमान्य तिलक के आव्हान पर उन्होंने पूना में सन 1894 से शिवाजी उत्सव और गणेशोत्सव की परम्परा शुरू की और शिवाजी श्लोक और गणेश श्लोकों के जरिए वे युवाओं में इस देश के प्रति राष्ट्रभक्ति की अलख जगाने का काम करने लगे।शिवाजी श्लोक कहता था, भांड की तरह शिवाजी की वीरता की कहानियों को सुनने सुनाने से कुछ नहीं होगा, आवश्यकता है कि शिवाजी और बाजीराव की तरह तलवार और ढाल उठाकर मैदान ए जंग में उतरा जाए। जबकि गणेश श्लोक में धर्म और गाय की रक्षा की बात की गई, अंग्रेजों से ना लड़ने वालों को नपुंसक तक करार दिया गया। धीरे धीरे चापेकर बंधु लोकप्रिय हो गए, लेकिन अब वे गुप्तचरों और भारतीय भेदियों के जरिए अंग्रेजों की नजर में भी आने लगे थे। अंग्रेजों के प्रति नफरत आग बढ़ गई थी, पूरे पुणे में कमिश्नर रैंड को सबक सिखाने की बात चलने लगी। तब चापेकर बंधुओं ने रैंड को सबके सिखाने का जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली, उनको पता था कि बचने का कोई सवाल ही नहीं है, लेकिन ऐसे नारकीय जीवन जीने से तो बेहतर एक वीर की मौत मरना, अपनी जन्मभूमि की आजादी की खातिर मरना। रैंड पर हमले का दिन तय गया 22 जून, यानी क्वीन विक्टोरिया के गोल्डन जुबली फंक्शन का दिन। पूरे पुणे में तब तक 2091 लोग प्लेग मर चुके थे और उन सभी के घर वाले अपने घरवालों की लाशों पर मातम कर रहे थे और पुणे में अंग्रेज बड़ा जलसा करके विक्टोरिया का गोल्डन जुबली मनाएं, ये किसी को मंजूर नहीं था। गर्वनमेंट हाउस पर 22 जून 1897 की रात जलसा था, प्लेग कमिश्लर रैंड को भी जाना था। रास्ते में एक पीले बंगले के पास दामोदर और बालकृष्ण, दोनों चापेकर भाइयों ने पोजीशन ले ली। दोनों के पास पिस्तौल थी और बैकअप प्लान के लिए तलवार और कुल्हाड़ी तक ले ली गई। रैंड की बग्घी को देखकर दामोदर ने कोड में आवाज लगाई- गोंडया आला रे और तान दी पिस्तौल, सीधे गोली उतार दी रैंड के सीने में, उधर बालकृष्ण ने पीछे से गोली चलाई जो रैंड की सिक्योरिटी में लगे लैफ्टिनेंट आयर्स्ट को लगी। आयर्स्ट की वहीं पर मौत हो गई और रैंड तीन दिन बाद हॉस्पिटल में मर गया। पूरे शहर में कोहराम मच गया।सरकार ने सारे गुप्तचर काम पर लगा दिए गए।किसी ने रात में रैंड को गोली मारते नहीं देखा, लेकिन दो लोगों को इस घटना की जानकारी थी, दोनों भाई थे, उन्हें द्रविण भाई कहा जाता है। गणेश शंकर द्रविण और रामचंद्र द्रविण। जब पुलिस कमिश्नर ने इस घटना का सुराग बताने वाले को बीस हजार के इनाम का ऐलान किया तो उन्होंने ईनाम के लालच में पुलिस को बता दिया कि ये लोग रैंड की हत्या की साजिश रच रहे थे। तीनों चापेकर भाइयों के अलावा इस योजना में महादेव विनायक रानाडे और खांडो विष्णु साठे भी शामिल थे। साठे नाबालिग था, इसलिए केवल दस साल की सजा हुई ,बाकियों को फांसी दे दी गई। हालांकि कुल 31 लोगों को गिरफ्तार किया गया था। सबसे पहले दामोदर चापेकर को पकड़ लिया गया। बाद में तिलक उनसे मिलने आए और उनको एक गीता भेंट की, जो फांसी के तख्ते तक उनके हाथ में थी। पुलिस ने बाकी भाइयों की गिरफ्तारी के लिए चापेकर बंधुओं के कुछ रिश्तेदारों को गिरफ्तार करके प्रताड़ित करना शुरू कर दिया तो बालकृष्ण चापेकर ने सरेंडर कर दिया। लेकिन छोटा भाई बासुदेव उनका सुराग देने वाले गद्दारों द्रविण भाइयों को सबक सिखाना चाहता था। 8 फरवरी 1899 को बासुदेव और उनके मित्र महादेव गोविंद रानाडे ने उन गद्दारों को ढूंढ ही निकाला और उनको वहीं मौत के घाट उतार दिया। उसी शाम उन्होंने पुलिस कांस्टेबल रामा पांडु को गोली मारने की कोशिश की, लेकिन पकड़े गए। तीनों चापेकर भाइयों और रानाडे को यरवदा जेल में फांसी पर लटका दिया गया।ब्रिटिश सरकार ने तिलक को भी नहीं छोड़ा, तिलक पर आरोप था कि उन्होंने चापेकर बंधुओं को रैंड की हत्या के लिए उकसाया। इसको साबित करने के लिए तिलक के अखबार केसरी की कुछ प्रतियां भी पेश की गईं, जिसमें प्लेग कमिश्नर के तौर तरीकों का विरोध किया गया था। तिलक पर देशद्रोह का आरोप लगाया गया। देखा जाए तो ब्रिटिश सरकार द्वारा लगाया गया ये पहला देशद्रोह का केस था, जो तिलक जैसे एक नेशनल लीडर पर लगाया गया था। तिलक को देशद्रोह के आरोप में जेल भेज दिया गया, पूरे 18 महीने के लिए। आज भले ही सत्यनारायण की कथा पूरी दुनियां के हर हिंदू घर में कही जाती है, लेकिन चापेकर बंधुओं के पिता हरि चापेकर को कोई याद नहीं करता। इसी तरह अंग्रेजों के खिलाफ खुली बगावत करके फांसी पर चढ़ने वाले चापेकर बंधुओं को शत शत नमन। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार व आध्यात्मिक चिंतक है) ईएमएस / 27 अप्रैल 26