बेंगलुरु,(ईएमएस)। यह मामला व्यक्तिगत निजता के हनन और डिजिटल युग में महिलाओं की सुरक्षा से जुड़ी एक गंभीर चेतावनी है। कर्नाटक हाईकोर्ट ने जिस तरह से मामले में टिप्पणी की है, वह समाज में बढ़ती डिजिटल तांक-झांककी प्रवृत्ति पर कड़ा प्रहार है। दरअसल पूरा विवाद बेंगलुरु मेट्रो चिक्स नामक इंस्टाग्राम हैंडल से शुरू हुआ। इस अकाउंट का संचालक बेंगलुरु मेट्रो में सफर करने वाली महिलाओं की उनकी जानकारी या अनुमति के बिना तस्वीरें लेता और वीडियो बनाता था। इन तस्वीरों को न केवल सोशल मीडिया पर सार्वजनिक करता था, बल्कि उनके साथ बेहद आपत्तिजनक और भद्दी भाषा का इस्तेमाल करता था। जब यह मामला कानूनी प्रक्रिया में पहुँचा, तब आरोपी ने अपने खिलाफ दर्ज केस को खत्म करने के लिए कर्नाटक हाईकोर्ट में याचिका दायर की, इस याचिका को अदालत ने सिरे से खारिज कर दिया। सुनवाई के दौरान अदालत की सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि किस तरह के आदमी हो तुम? जस्टिस एम. नागप्रसन्न की पीठ ने मामले के तथ्यों को देखकर गहरी नाराजगी व्यक्त की। सुनवाई के दौरान जज के तेवर काफी कड़े थे। जज ने आरोपी को फटकारते हुए कहा, तुम महिलाओं की आगे और पीछे से तस्वीरें लेते हो और उन्हें इंस्टाग्राम पर पोस्ट करते हो? किस तरह के आदमी हो तुम? नॉनसेन्स! अदालत ने महिला सुरक्षा पर चिंता जताकर कहा कि इसरतरह कृत्यों के कारण महिलाओं के लिए मेट्रो जैसे सार्वजनिक स्थान भी सुरक्षित नहीं रह गए हैं। जब आरोपी के वकील ने तर्क दिया कि मामले में जांच अधिकारी ही शिकायतकर्ता है और कोई वास्तविक अपराध नहीं हुआ है, तब जज ने स्पष्ट कहा कि तकनीकी बारीकियों के पीछे छिपकर इसतरह के घिनौने कृत्य को सही नहीं ठहराया जा सकता। भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 77 वॉयरिज्म (दृश्यरतिकता) के अपराध को परिभाषित करती है। इस कानून के तहत यदि कोई व्यक्ति किसी महिला की उसकी सहमति के बिना ऐसी स्थिति में तस्वीर लेता है जहाँ उस महिला की निजता की उम्मीद हो, तब यह दंडनीय अपराध है। केवल फोटो खींचना ही नहीं, बल्कि उन तस्वीरों या वीडियो को इंटरनेट पर साझा करना भी इस धारा के अंतर्गत आता है। इसतरह के मामलों में दोषी पाए जाने पर कैद और जुर्माने का प्रावधान है, ताकि सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं की गरिमा बनी रहे। कर्नाटक हाईकोर्ट का यह रुख स्पष्ट करता है कि कानून अब डिजिटल अपराधों और महिलाओं की निजता के उल्लंघन को लेकर कोई नरमी नहीं बरतेगा। अदालत ने ट्रायल कोर्ट में आरोपी के खिलाफ कार्यवाही जारी रखने का आदेश देकर यह संदेश दिया है कि अभिव्यक्ति की आजादी या तकनीकी खामियों का सहारा लेकर किसी की गरिमा के साथ खिलवाड़ नहीं किया जा सकता। आशीष दुबे / 27 अप्रैल 2026