अमेरिकी राजनयिक बर्न्स ने की भविष्यवाणी वाशिंगटन(ईएमएस)। दुनिया की बदलती भू-राजनीति के बीच दिग्गज अमेरिकी राजनयिक निकोलस बर्न्स ने भारत के बढ़ते वैश्विक प्रभाव को लेकर एक बड़ी भविष्यवाणी की है। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के न्यू डिप्लोमेसी प्रोग्राम में अपने संबोधन के दौरान बर्न्स ने स्पष्ट किया कि भारत अब केवल एक उभरती हुई शक्ति नहीं, बल्कि एक हकीकत बन चुका है। उन्होंने आत्मविश्वास के साथ कहा कि अगले 40 वर्षों में भारत दुनिया की सबसे बड़ी ग्लोबल पावर के रूप में स्थापित हो सकता है। बर्न्स के मुताबिक, भारत के पास एक महाशक्ति बनने के लिए आवश्यक सभी बुनियादी तत्व—विशाल आबादी, उत्कृष्ट वैज्ञानिक प्रतिभा और रणनीतिक भौगोलिक स्थिति—मौजूद हैं। निकोलस बर्न्स, जो 2005-2008 के बीच ऐतिहासिक भारत-अमेरिका नागरिक परमाणु समझौते (सिविल न्यूक्लियर डील) के मुख्य वार्ताकार रहे हैं, भारत की प्रगति को विज्ञान और युवाओं के कौशल से जोड़कर देखते हैं। उनका मानना है कि भारत की युवाओं की फौज आज वैश्विक स्तर पर तकनीक और नवाचार का नेतृत्व कर रही है। इसके साथ ही, हिंद-प्रशांत (इंडो-पैसिफिक) क्षेत्र में भारत की भौगोलिक स्थिति इसे सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिहाज से एक अनिवार्य केंद्र बनाती है। बर्न्स ने जोर देकर कहा कि आज की कूटनीति में लोकेशन ही सबसे महत्वपूर्ण है और भारत की समुद्री सीमाएं उसे वैश्विक शक्ति संतुलन में दूसरों से ऊपर रखती हैं। उनके अनुसार, 21वीं सदी के अंत तक दुनिया का पावर बैलेंस पूरी तरह भारत के पक्ष में झुक जाएगा। भारत और अमेरिका के संबंधों पर चर्चा करते हुए बर्न्स ने परमाणु समझौते को एक टर्निंग पॉइंट करार दिया। इसी समझौते ने भारत के दशकों पुराने परमाणु अलगाव को खत्म कर वाशिंगटन और नई दिल्ली के बीच रणनीतिक साझेदारी की नींव रखी थी। बर्न्स का तर्क है कि भारत का उदय न केवल भारतीय उपमहाद्वीप के लिए, बल्कि अमेरिका के रणनीतिक हितों के लिए भी बेहद जरूरी है। वे भारत को चीन की बढ़ती क्षेत्रीय आक्रामकता के खिलाफ एक अभेद्य दीवार के रूप में देखते हैं। चीन के साथ बढ़ते मुकाबले के संदर्भ में बर्न्स ने स्पष्ट किया कि आने वाले समय में चीन अमेरिका का सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी होगा। ऐसे में अमेरिका के लिए भारत को अपने साथ रखना एक रणनीतिक मजबूरी और जरूरत दोनों है। उन्होंने पिछले अमेरिकी राष्ट्रपतियों—बिल क्लिंटन से लेकर जॉर्ज डब्ल्यू बुश तक—के प्रयासों की सराहना की जिन्होंने भारत से करीबी बढ़ाने को प्राथमिकता दी। हालांकि, उन्होंने वर्तमान टैरिफ नीतियों और व्यापारिक तल्खी पर चिंता जताते हुए कहा कि भारत को खुद से दूर करना अमेरिका के लिए एक गंभीर रणनीतिक भूल साबित हो सकती है। उनके लिए भारत एक नेचुरल हब है, जो सुरक्षा, तकनीक और जलवायु कूटनीति के मोर्चे पर भविष्य की दुनिया का नेतृत्व करेगा। वीरेंद्र/ईएमएस/30अप्रैल2026