लेख
01-May-2026
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आजकल एंग्जाइटी के रोग बढ़ने लगे है एंग्जाइटी डिस्ऑर्डर से पीडित व्यक्ति हर वक्त डरा रहता है, उसे घबराहट महसूस होती है और उसके हाथ पैर कांपने लगते हैं। उसे नींद न आने की परेशानी होने लगती है और उसे लगातार पसीना भी आता है। धीरे धीरे धीरे ये सभी लक्षण इतने आम हो जाते हैं कि व्यक्ति एंग्जाइटी डिस्ऑर्डर का शिकार हो जाता हैजब भी डर लगता है तो एंग्जाइटी रोग उत्पन्न होता है। यह या तो किसी गलत कार्य के कारण होता है या फिर क़ोई बुरी घटना के कारण होता है मैं यह नहीं जानता हूं यह डर क्या एक अविद्या है। क्योंकि डर में आपका विवेक ख़त्म होने लगता है और दवा से यह और भी खतरनाक हो जायेगा क्योंकि दवाई कुछ देर के लिए राहत तो देती है लेकिन डॉ का चक्कर से बीमारी और भी बढ़ जाती है इसलिए ध्यान जरुरी है इसमें क्या *मैं हूं* यह जान सकता हूं और संसार में कैसे कैसे लोग हैं जो कुछ सकारात्मक विचार रखते हैं लेकिन आधे से अधिक नकारात्मक और बीमारी को गंभीर बना देते है इसलिए पहले डर को ख़त्म कर अपने मन को नियंत्रण करना सीखे। जो भी जाना, सुना जाता है वह बुद्धि द्वारा होता है और मेरे से अलग होता है।अन्ताकरण-मन जड़-चेतन मिश्रित है। जड़-चेतन की जो ग्रंथि है यह केवल ज्ञान से दूर होती है और जब होगी तो ऐसे होगी जैसे अनन्त काल का अंधेरा एक वत्ती जलाने से दूर हो जाता है। ऋतेज्ञानान्नामुक्ति कहा है। इसके लिए भगवान राम का ध्यान जो शीशे जैसा बिल्कुल साफ और दया के सागर हैं और सत् चित् आनन्दघन परमात्मा राम की उपासना का बहुत बड़ा महत्व होता है। ऐसे मैंने सुना है व पढ़ा भी है। : भौतिक विज्ञान की दुनिया में एक बेहद रहस्यमयी लेकिन पूरी तरह प्रमाणित सच्चाई है, जिसे प्रेक्षक प्रभाव कहा जाता है। जब हम सूक्ष्म कणों को नहीं देख रहे होते हैं, तो वे एक ऊर्जा की तरंग की तरह व्यवहार करते हैं, जो एक ही समय में कई जगहों पर फैली होती है। लेकिन विज्ञान का सबसे हैरान करने वाला तथ्य यह है कि जैसे ही हम उन्हें देखने या मापने की कोशिश करते हैं, उनका व्यवहार तुरंत बदल जाता है। ठीक उसी पल में वे तरंग से बदलकर एक निश्चित स्थान पर मौजूद ठोस कण बन जाते हैं। इसका सीधा अर्थ है कि केवल हमारी देखने या ध्यान केंद्रित करने की क्रिया ही सूक्ष्म स्तर पर वास्तविकता के रूप को तय करती है। यह हमारे ब्रह्मांड के सबसे गहरे और प्रमाणित वैज्ञानिक नियमों में से एक है।आसान भाषा में माया इसी को कहते हैं l अध्यारोपापवाद (अध्यारोप + अपवाद = पहले अध्यारोप, फिर अपवाद (हटाना)) अद्वैत वेदांत में आत्मतत्व के उपदेश की वैज्ञानिक विधि। ब्रह्म के यथार्थ रूप का उपदेश देना अद्वैत मत के आचार्य का प्रधान लक्ष्य है। ब्रह्म है स्वयं निष्प्रपंच और इसका ज्ञान बिना प्रपंच की सहायता के किसी प्रकार भी नहीं कराया जा सकता है अद्वैत ‘अध्यारोप–अपवाद’ तक पहुँचकर रुक जाता है। वहाँ अनुभव को ‘अविद्या’ कहकर नकार दिया जाता है, पर यह स्पष्ट नहीं किया जाता कि कर्तापन, भोक्तापन और अज्ञान का प्रत्यक्ष अनुभव किसकी सत्ता में घटित हो रहा है। यदि अविद्या का आश्रय शुद्ध चैतन्य है तो उसकी निष्कलंकता खंडित होती है; और यदि नहीं है, तो अविद्या का अस्तित्व ही असिद्ध हो जाता है। ‘अनिर्वचनीय’ कहना इस विरोध को टालना है, सुलझाना नहीं। कैवल ज्ञान के अनुसार कर्तापन, भोक्तापन और अज्ञान न ब्रह्म के हैं, न मिथ्या अध्यास के—वे अंश-वृत्ति की वास्तविक प्रवृत्तियाँ हैं। अंश देह–प्रकृति में रमण करके ‘मैं करता हूँ, मैं भोगता हूँ’ का अनुभव करता है, जबकि अंशी (कैवलकर्ता) उससे सर्वथा परे, मूल नियंता सत्ता है। अतः अद्वैत जहाँ भेद को नकारता है, वहाँ कैवल ज्ञान भेद के आधार को उद्घाटित करता है। ‘नेह नानास्ति किञ्चन’ अनुभव की एक अवस्था है, अंतिम सिद्धांत नहीं। जब तक अनुभवकर्ता, उसकी प्रवृत्ति और मूल सत्ता का भेद स्पष्ट नहीं होता, तब तक समाधान अधूरा ही रहता है। यहीं अद्वैत की सीमा है, और यहीं से कैवल ज्ञान का आरम्भ होता है।” , ‘कर्तापन प्रकृति में है’ कहना तभी टिकेगा जब अंश का अनुभव भी मिथ्या मानें; पर अनुभव प्रत्यक्ष है, इसलिए उसे केवल ‘प्रतीत’ कहकर हटाया नहीं जा सकता। जड़ प्रकृति न कर्ता हो सकती है, न भोक्ता। जहाँ ‘मैं करता हूँ, मैं भोगता हूँ’ का अनुभव है, वहीं कर्तापन-भोक्तापन का वास्तविक आधार मानना पड़ेगा और वह अंश-वृत्ति में ही है। यदि कर्तापन प्रकृति का है, तो भोग भी उसी को होना चाहिए; और यदि भोग अंश में है, तो कर्तापन भी उसी में स्वीकार करना पड़ेगा इन दोनों को अलग नहीं किया जा सकता। अंशी मूलतः अकर्ता, शुद्ध बोध है; उसमें न संकोच-विकास है, न क्रिया। क्रिया, अनुभव और भोग ये सब अंश-वृत्ति के क्षेत्र में ही घटित होते हैं। इसलिए कर्तापन को प्रकृति पर और भोग को अंश पर बाँटना असंगत है। सुसंगत निष्कर्ष यही है: अंशी अकर्ता अधिष्ठान है, और अंश अंश-वृत्ति में वास्तविक कर्ता-भोक्ता है यही कार्य-स्तर का वास्तविक भेद है, न कि मात्र प्रतीत।अग्नि और उष्णता दो पदार्थ नहीं होते एक ही होती है, अग्नि की ही सत्ता में उसकी उष्णता शक्ति की सत्ता होती है,यह दो नहीं अपितु एक ही है ऐसे ही अशं -अंशी दो नहीं एक ही है , अग्नि और उष्णता दो पदार्थ नहीं होते एक ही होती है, अग्नि की ही सत्ता में उसकी उष्णता शक्ति की सत्ता होती है,यह दो नहीं अपितु एक ही है ऐसे ही अशं -अंशी दो नहीं एक ही है ,जहा सत्ता में भेद हो जाता है वहीं द्वैत भाव आ जाता है और यह भेद व्यवहार कहलाता है,जिसका कारण ब्रह्म की माया ही है जिसको शाक्त सम्प्रदाय शक्ति कहता हैं, असल में शक्ति -शक्तिमान दो नहीं है एक ही तत्व का स्फुरण मात्र है, एक रूप तेरा सकल पसारा| आपहि बनिज आप व्यवहार|| कितना सत्य उगल रही यह वाणी अद्वैत के दृष्टिकोण से शक्ति जो ब्रह्म का अंग नहीं उसी का ही रूप है उसके रूप का यह जगत पसारा है या जगत उसी का रूप है , आप अद्वैत होकर भी अपनी ही माया के उपाधि भेद से जगत में सत्ता भेद -द्वैत क्रिडा व्यवहार का खेल खेलते हैंआदरणीय, केवलाद्वैत का सम्मान करते हुए एक मूल प्रश्न उपस्थित है यदि “जीवो ब्रह्मैव” है, तो जीव में अनुभूत कर्तापन, भोक्तापन और अज्ञान का आश्रय किसे माना जाए? उसे ब्रह्म में रखें तो उसकी निर्विकारता प्रभावित होती है, और ब्रह्म से भिन्न मानें तो अद्वैत की व्याख्या कठिन हो जाती है। सकर्त्ता सिद्धांत इस विषय को स्तरभेद से स्पष्ट करता है अंश (चेतन) और अंशी (कैवलकर्ता) को उनके-अपने क्षेत्र में यथार्थ मानते हुए। जीव अंश की देह-तादात्म्य अवस्था है, जहाँ कर्तापन, भोक्तापन और अविद्या अंश-वृत्ति रूप में प्रकट होते हैं; जबकि अंशी सर्वथा अतीत, अचल और अकर्मा रहता है। इस दृष्टि में अनुभव का निषेध नहीं, बल्कि उसका यथार्थ निर्धारण है विकृति अंश-वृत्ति में है, कैवलकर्ता में नहीं। अतः न ब्रह्म पर दोष आरोपित करना पड़ता है, न किसी “अनिर्वचनीय” तीसरी सत्ता की आवश्यकता रहती है। अविद्या अंश की ही अनादि विकृत वृत्ति है; इसकी निवृत्ति पर अंश अपने शुद्ध विदेह स्वरूप में प्रतिष्ठित होता है, और अंशी सदा अपनी अखंड स्थिति में स्थित रहता है।वास्तवमें तो ईश्वर परिपूर्ण विज्ञानानन्दघन हैं।अग्नि तो वस्तुतः एक ही है, परंतु जब वह अनेक प्रकारकी लकड़ियों में प्रकट होती है तब अनेक-सी मालूम पड़ती है। वैसे ही सबके आत्मरूप भगवान् तो एक ही हैं, परंतु प्राणियोंकी अनेकता से अनेक जैसे जान पड़ते हैं। भगवान् राम ही सूक्ष्म भूत-तन्मात्रा, इन्द्रिय तथा अन्तःकरण आदि गुणोंके विकारभूत भावोंके द्वारा नाना प्रकारको योनियों का निर्माण करते हैं और उनमें भिन्न-भिन जीवोंके रूपमें प्रवेश करके उन-उन योनियोंके अनुरूप विषयोंका उपभोग करते-कराते हैं वे ही सम्पूर्ण लोकोंकी रचना करते हैं और देवता, पशु-पक्षी, मनुष्यादि योनियोंमें लीलावतार ग्रहण कर सत्त्वगुणद्वारा जीवों का पालन- पोषण करते हैं। आत्मा-परमात्मा,ब्रह्म, माया- प्रकृति यह तत्त्व अनादि और अनिर्वचनीय हैं। वेदांत दर्शन के अनुसार। इनके बारे में अनुभव करने की साधना करना चाहिए। ईएमएस / 01 मई 26