बिलासपुर (ईएमएस)। साहित्यकार जगन्नाथ प्रसाद चौबे वनमाली की 50वीं पुण्यतिथि पर उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर एक विमर्श का आयोजन किया गया। यह आयोजन वनमाली सृजन पीठ, भाषा एवं साहित्य विभाग तथा आंतरिक गुणवत्ता आश्वासन प्रकोष्ठ के संयुक्त तत्वावधान में हुआ। मुख्य वक्ता देवधर महंत ने वनमाली को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि 64 वर्षों के जीवनकाल में उन्होंने साहित्य, शिक्षा और चिंतन के क्षेत्र में असाधारण कार्य किए। उनके पुत्र संतोष चौबे आज वैश्विक स्तर पर हिंदी का परचम लहरा रहे हैं। महंत ने वनमाली की चर्चित कहानियों जिल्दसाज (1934) और पराया धन पर विस्तार से चर्चा की, उनके कथ्य, शिल्प और सामाजिक सरोकारों को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि उनकी उत्कृष्ट कहानियों का समुचित मूल्यांकन और शोध होना चाहिए, ताकि युवा साहित्यकारों को नई दिशा मिल सके। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे विश्वविद्यालय के कुलसचिव अरविंद कुमार तिवारी ने कहा कि साहित्य के पोषण और संवर्धन पर यह आयोजन सार्थक रहा। उन्होंने नारी शिक्षा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वनमाली ने अपने कार्यों की शुरुआत शिक्षा के दान से की और उस समय भी नारी शिक्षा को अत्यंत आवश्यक माना। आज बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ उनकी ही सोच का यथार्थ रूप है। तिवारी ने बताया कि जांजगीर की बहुउद्देशीय शाला में वनमाली को संस्थापक प्राचार्य के रूप में जाना जाता है। वनमाली सृजन पीठ का प्रयास है कि प्रतिष्ठित साहित्यकारों के अनुभवों से नवोदित साहित्यकार सीख सकें। इस अवसर पर वेद प्रकाश मिश्रा ने बताया कि वनमाली भाषा को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखने के पक्षधर थे। उनकी प्रथम कर्मभूमि बिलासपुर रही। उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्हें डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के कर-कमलों से राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। वनमाली के पुत्र संतोष चौबे ने हिंदी साहित्य को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाई है। कार्यक्रम का संचालन आंचल श्रीवास्तव ने किया और योगेश मिश्रा ने आभार व्यक्त किया। मनोज राज 01 मई 2026