- भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) द्वारा 1 मई 2026 से नए गुणवत्ता मानक जारी- समग्र व्यापक विश्लेषण दिव्यांग एवं वरिष्ठ नागरिक अधिकारों का विस्तार- समानता से सुलभता तक: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 21 और 41 के आलोक में नए गुणवत्ता मानक जारी भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) द्वारा बुजुर्गों और दिव्यांगों के लिए सहायक उपकरणों, विशेषकर वॉकिंग स्टिक्स, बैसाखियों, व्हीलचेयर रैंप और ब्रेल साइनेज के लिए नए गुणवत्ता मानक जारी करना सराहनीय वैश्विक स्तरपर भारत आज एक ऐसे जनसांख्यिकीय संक्रमण (डेमोग्राफ़िकट्रांसिशन) के दौर से गुजर रहा है, जहाँ एक ओर युवा आबादी उसकी आर्थिक शक्ति का आधार बनी हुई है, वहीं दूसरी ओर बुजुर्गों और दिव्यांगजनों की संख्या में तेजी से वृद्धि एक नईसामाजिक आर्थिक और नीतिगत चुनौती के रूप में उभर रही है।चिकित्सा विज्ञान की प्रगति,जीवन प्रत्याशा में वृद्धि, और बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के कारण लोगों की औसत आयु बढ़ी है,जिससे वृद्धजन आबादी काअनुपात लगातार बढ़ रहा है। इसके साथ ही,सड़क दुर्घटनाओं औद्योगिक हादसों,जन्मजात विकृतियों तथा विभिन्न रोगों के कारण दिव्यांगजनों की संख्या भी उल्लेखनीय रूप से सामने आ रही है। ऐसे परिदृश्य में किसी भी आधुनिक और संवेदनशील राष्ट्र की जिम्मेदारी केवल आर्थिक विकास तक सीमित नहीं रहती,बल्कि वह अपने समाज के सबसे कमजोर, निर्भर और विशेष आवश्यकता वाले वर्गों के लिए भी समावेशी (इंक्लूसिव ) और सुलभ (एक्सेसिबल) व्यवस्था सुनिश्चित करने की दिशा में ठोस कदम उठाता है।भारत सरकार ने इसी सोच के तहत विकलांग शब्द को बदलकर दिव्यांग शब्द को अपनाया है, जो केवल भाषाई परिवर्तन नहीं बल्कि एक मानसिकता परिवर्तन का संकेत है। यह बदलाव इस विचार को दर्शाता है कि दिव्यांगजन किसी कमी के प्रतीक नहीं,बल्कि विशेष क्षमताओं वाले व्यक्ति हैं जिन्हें उचित संसाधन,अवसर और अनुकूल वातावरण प्रदान किया जाए तो वे समाज में समान रूप से योगदान दे सकते हैं। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि इसी व्यापक दृष्टिकोण का विस्तार 1 मई 2026 को तब देखने को मिला जब भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस ) ने बुजुर्गों और दिव्यांगों के लिए सहायक उपकरणों,विशेषकर वॉकिंग स्टिक्स, बैसाखियों, व्हीलचेयर रैंप और ब्रेल साइनेज के लिए नए गुणवत्ता मानक जारी किए। यह पहल न केवल भारत के भीतर जीवन की गुणवत्ता सुधारने का प्रयास है, बल्कि इसे वैश्विक मानकों के अनुरूप बनाने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।इन नए मानकों का आधार भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर ) द्वारा राष्ट्रीय आवश्यक सहायक उत्पाद सूचि (एनएलईएपी) तैयार की गई तैयार की गई है।यह सूची विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ )की उसअवधारणा से प्रेरित है, जिसमें सहायक उपकरणों को स्वास्थ्य सेवा का अनिवार्य हिस्सा माना गया है। एनएलईएपी का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि दिव्यांग और बुजुर्गजन केवल उपकरणों की उपलब्धता तक सीमित न रहें,बल्कि उन्हें सुरक्षित, टिकाऊ उपयोग में आसान और अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता के अनुरूप उपकरण प्राप्त हों। इस पहल के तहत तैयार किए गए मानकों में सुरक्षा, एर्गोनॉमिक्स (मानव शरीर के अनुरूप डिजाइन), टिकाऊपन,और उपयोगकर्ता की सुविधा को विशेष प्राथमिकता दी गई है। साथियों बात अगर हम सबसे पहले यदि वॉकिंग स्टिक (छड़ी) के मानकों की बात करें तों, तो बीआईएस ने इसके लिए दो प्रमुख मानक निर्धारित किए हैं आईएस 5145: 2026 और IS 18558 (भाग 4):2025 आईएस 5145: 2026 एक व्यापक भारतीय मानक है, जिसमें लकड़ी,बांस, एल्युमिनियम, प्लास्टिक और रबर जैसे विभिन्न सामग्रियों से बनी छड़ियों के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए गए हैं। इसमें छड़ी की लंबाई, वजन, मजबूती पकड़ (ग्रिप),सतह कीफिनिशिंग और उसकी स्थायित्व जैसे पहलुओं को विस्तार से परिभाषित किया गया है। यह सुनिश्चित करता है कि उपयोगकर्ता को संतुलन बनाए रखने में अधिकतम सहायता मिले और गिरने जैसी दुर्घटनाओं की संभावना कम हो।दूसरी ओर, आईएस 18558 (भाग 4): 2025, जो कि आईएसओ 11334-4 के अनुरूप है, विशेष रूप से तीन या अधिक पैरों वाली वॉकिंग स्टिक्स के लिए तैयार किया गया है। यह उन लोगों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है जिन्हें अतिरिक्त स्थिरता की आवश्यकता होती है, जैसे कि अत्यधिक बुजुर्ग या गंभीर रूप से दिव्यांग व्यक्ति। इस मानक में हैंडल की डिजाइन रबर टिप की गुणवत्ता,और छड़ी के समग्र प्रदर्शन को लेकर सख्त परीक्षण मानदंड निर्धारित किए गए हैं, ताकि उपयोगकर्ता को सटीक रूप से अधिकतम सुरक्षा मिल सके। साथियों बात अगर हम इसी प्रकार एल्बो क्रच (कोहनी वाली बैसाखियों) के लिए उपकरण को समझने की करें तो आईएस 18558 (भाग 1): 2025 मानक जारीकिया गया है, जो आईएसओ 11334-1 के अनुरूप है। इसमें बैसाखियों की ऊंचाई समायोजन क्षमता, हैंडग्रिप की गुणवत्ता, और उपयोगकर्ता के शरीर पर पड़ने वाले दबाव को कम करने के उपायों को ध्यान में रखा गया है। यह न केवल उपयोग में आरामदायक बनाता है बल्कि लंबे समय तक उपयोग करने पर भी शरीर पर दुष्प्रभाव को कम करता है।इन तकनीकी मानकों का महत्व केवल उत्पाद की गुणवत्ता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सुलभता के व्यापक दृष्टिकोण से भी जुड़ा हुआ है। उदाहरण के लिए, आईएस 19189: 2025 मानक टैक्टाइल (स्पर्शनीय) गाइड मैप के डिजाइन और उपयोग से संबंधित है। यह दृष्टिबाधित और कम दृष्टि वाले व्यक्तियों को सार्वजनिक स्थानों—जैसे रेलवे स्टेशन, हवाई अड्डे, पार्क और सरकारी भवन में स्वतंत्र रूप से नेविगेट करने में मदद करता है। इस मानक के तहत यह सुनिश्चित किया गया है कि नक्शों में उपयोग किए गए उभार, टेक्सचर और संकेत इतने स्पष्ट हों कि उन्हें स्पर्श द्वारा आसानी से समझा जा सके। साथियों बात अगर हम इसी क्रम में आईएस 19190: 2025, जो आईएसओ 17049 के अनुरूप है इसको समझने की करें तो, ब्रेल साइनेज के लिए दिशा-निर्देश प्रदान करता है। इसमें ब्रेल अक्षरों के आकार,दूरी,सामग्री और उनके स्थान निर्धारण के मानदंड तय किए गए हैं। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि दृष्टिबाधित व्यक्ति किसी भी सार्वजनिक या व्यावसायिक स्थान पर बिना किसी सहायता के आवश्यक जानकारी प्राप्त कर सकें। यह पहल समान अवसर के सिद्धांत को व्यवहारिक रूप में लागू करने का एक बहुत ही सशक्त उदाहरण है। साथियों बात अगर हम व्हीलचेयर उपयोगकर्ताओं और अन्य गतिशीलता सहायता की आवश्यकता वाले लोगों की जरूरत को समझने की करें तो उनके लिए आईएस19631 : 2026 मानक विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। यह एक स्वदेशी मानक है, जो पोर्टेबल व्हीलचेयर रैंप के डिजाइन और निर्माण से संबंधित है। यह मानक केवल व्हीलचेयर उपयोगकर्ताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें बुजुर्ग, छोटे बच्चे, स्ट्रोलर या कार्ट उपयोग करने वाले लोग भी शामिल हैं।इस मानक के तहत रैंप की ढलान सतह की पकड़, वजन सहन क्षमता,और पोर्टेबिलिटी जैसे पहलुओं को विस्तार से निर्धारित किया गया है। इसका उद्देश्य घरों, कार्यालयों और सार्वजनिक स्थानों को अधिक समावेशी बनाना है। साथियों इन सभी मानकों के निर्माण में एक बहु- हितधारक दृष्टिकोण अपनाया गया है। बीआईएस की तकनीकी समिति में उद्योग जगत, शिक्षाविदों, सरकारी संस्थानों और सामाजिक संगठनों के विशेषज्ञ शामिल रहे हैं। विशेष रूप से भगवान महावीर विकलांग सहायता समिति जैसे संगठनों की भागीदारी इस प्रक्रिया को और अधिक व्यावहारिक और जमीनी बनाती है, क्योंकि ये संगठन सीधे तौर पर दिव्यांगजनों के साथ काम करते हैं और उनकी वास्तविक आवश्यकताओं को सटीक रूप से समझते हैं।यह पहल सुगम्य भारत अभियान को भी नई मजबूती प्रदान करती है, जिसका उद्देश्य देशभर में सार्वजनिक स्थानों, परिवहन प्रणालियों और सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी को दिव्यांगजनों के लिए सुलभ बनाना है। पिछले कुछ वर्षों में इस अभियान के तहत रेलवे स्टेशनों, सरकारी कार्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों में कई सुधार किए गए हैं, लेकिन अब इन नए मानकों के लागू होने से सुलभता का स्तर और अधिक उन्नत हो सकेगा। साथियों बात अगर हम इन मानकों को आर्थिक दृष्टि से से देखे तो भी यह पहल अत्यंत महत्वपूर्ण है। सहायक प्रौद्योगिकी का वैश्विक बाजार तेजी से बढ़ रहा है और इसमें भारत के लिए अपार संभावनाएं हैं। यदि भारतीय निर्माता इन मानकों का पालन करते हैं, तो वे उच्च गुणवत्ता वाले उत्पादों का उत्पादन कर सकते हैं, जिससे मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत जैसी पहल को भी बल मिलेगा। इसके साथ ही, नवाचार को भी प्रोत्साहन मिलेगा, क्योंकि कंपनियां बेहतर और अधिक उपयोगकर्ता- अनुकूल उत्पाद विकसित करने के लिए प्रेरित होंगी।हालांकि, इन मानकों के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए कुछ चुनौतियां भी सामने आ सकती हैं। सबसे बड़ी चुनौती जागरूकता की कमी है कई छोटे और मध्यम उद्योग इन मानकों के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं रखते। इसके अलावा, मानकों के अनुपालन की लागत भी एक बाधा बन सकती है, विशेषकर उन निर्माताओं के लिए जो सीमित संसाधनों के साथ काम करते हैं। इसके समाधान के लिए सरकार को प्रशिक्षण कार्यक्रम, वित्तीय सहायता और तकनीकी मार्गदर्शन प्रदान करना होगा।दूसरी ओर, उपभोक्ताओं के स्तर पर भी जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता है।यदिउपयोगकर्ता स्वयं उच्च गुणवत्ता वाले और प्रमाणित उत्पादों की मांग करेंगे, तो बाजार स्वतः ही मानकों के अनुरूप ढल जाएगा। इसके लिए जन-जागरूकता अभियान मीडिया की भूमिका और नागरिक समाज की भागीदारी निश्चित रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण होगी। साथियों इस पूरे प्रकरण को अगर हम अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में देखें तो यह पहल भारत को एक ऐसे राष्ट्र के रूप में स्थापित करती है, जो न केवल अपने नागरिकों की आवश्यकताओं को समझता है, बल्कि वैश्विक मानकों के अनुरूप खुद को ढालने के लिए भी प्रतिबद्ध है। आईएसओ मानकों के साथ सामंजस्य यह सुनिश्चित करता है कि भारतीय उत्पाद वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा कर सकें। इससे न केवल घरेलू उद्योग को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि निर्यात के नए अवसर भी खुलेंगे। अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन करें इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि यह कहा जा सकता है कि 1 मई 2026 को बीआईएस द्वारा जारी किए गए ये नए मानक केवल तकनीकी दिशा-निर्देश नहीं हैं, बल्कि यह एक समावेशी संवेदनशील और प्रगतिशील समाज की ओर बढ़ने का प्रतीक हैं। यह पहल दर्शाती है कि भारत अब केवल आर्थिक विकास पर ही नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, समान अवसर और मानव गरिमा को भी उतनी ही प्राथमिकता दे रहा है। यदि इन मानकों का प्रभावी ढंग से क्रियान्वयन किया जाता है, तो यह न केवल लाखों दिव्यांगजनों और बुजुर्गों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाएगा, बल्कि भारत को वैश्विक स्तर पर एक जिम्मेदार और समावेशी राष्ट्र के रूप में स्थापित करेगा। (-संकलनकर्ता लेखक - क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) ईएमएस/04/05/2026