क्षेत्रीय
06-May-2026
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- तानाशाही की हद पार! ड्यूटी पर मौजूद, फिर भी अनुपस्थित! वन रक्षक का रोका वेतन, वेतन रोकने की कार्रवाई पर मचा बवाल, वन रक्षक बोला-साजिशन फंसाया गया वनरक्षक ने शिकायत कर की जांच व कार्यवाही की मांग लामता परिक्षेत्र में वन विभाग घिरा विवादों में बालाघाट (ईएमएस). जिले के लामता वन परिक्षेत्र में अधिकारियों के कथित तानाशाह रवैये ने एक बार फिर विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। कर्मचारियों का आरोप है कि न सिर्फ मानसिक प्रताडऩा दी जा रही है, बल्कि झूठे दस्तावेजों के सहारे कार्रवाई कर उनका मनोबल तोड़ा जा रहा है। हाल ही में एक वनरक्षक का दो दिनों का वेतन रोक दिया है, उस पर निलंबन की कार्यवाही भी की जा रही है, जिसका उसने विरोध जताया है। वनरक्षक ने इस मामले की लिखित शिकायत सीएफ, डीएफओ, एसपी और जिला अध्यक्ष जिला वन एवं वन्यप्राणी कर्मचारी संघ से की है। लामता वन परिक्षेत्र में वन विभाग एक बार फिर अपने ही अधिकारियों के रवैये को लेकर कटघरे में खड़ा नजर आ रहा है। विभाग के भीतर बढ़ती असंतोष की लहर अब खुलकर सामने आने लगी है। इससे पहले भी वनरक्षकों द्वारा वनपाल के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए अभद्र व्यवहार, मानसिक उत्पीडऩ और तानाशाही के आरोप लगाए जा चुके हैं। अब इस पूरे विवाद ने और तूल पकड़ लिया है। परिक्षेत्र में पदस्थ वन रक्षक शरीफ खान ने अपने वेतन रोके जाने को लेकर विभागीय अधिकारियों पर गंभीर और चौंकाने वाले आरोप लगाए हैं। उन्होंने सीधे तौर पर कहा है कि उन्हें साजिशन फंसाने के लिए झूठे पंचनामा तैयार किए गए और गलत रिपोर्ट के आधार पर अनुपस्थित दिखाकर वेतन काटा गया। वनरक्षक ने उच्च अधिकारियों से निष्पक्ष जांच कराकर न्याय दिलाने की मांग की है और कहा है कि दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि भविष्य में किसी कर्मचारी के साथ इस प्रकार का अन्याय न हो। मार्च माह का काटा गया है वेतन शरीफ खान ने मुख्य वनसंरक्षक को दिए आवेदन में स्पष्ट किया है कि 8 और 9 मार्च 2026 के वेतन में कटौती की गई, जबकि वे अपने बीट क्षेत्र में पूरी तरह सक्रिय और उपस्थित थे। विभागीय पत्रों में 8 और 9 मार्च को अनुपस्थित दर्शाया गया, जबकि उन्हीं तिथियों पर उनके द्वारा क्षेत्र में आगजनी की घटना का रिकॉर्ड भी विभागीय रजिस्टर में दर्ज है। एसडीओ, परिक्षेत्र सहायक ने तैयार किया पंचनामा वनरक्षक ने अपने शिकायत में गंभीर आरोप यह भी लगाया है कि उप वनमंडल अधिकारी और परिक्षेत्र सहायक ने मिलकर पंचनामा तैयार किया, जिसमें वास्तविक स्थिति को नजरअंदाज किया गया। कर्मचारी का दावा है कि पंचनामा बनाते समय जिन गवाहों का उल्लेख किया गया, वे मौके पर मौजूद ही नहीं थे। ऐसे में पूरे दस्तावेज की वैधता पर सवाल खड़े होना लाजमी है। मासिक प्रतिवेदन में पूरे माह उपस्थिति दर्ज हैरानी की बात यह भी है कि मासिक उपस्थिति प्रतिवेदन में उनकी पूरे माह की उपस्थिति दर्ज होने के बावजूद वेतन रोक दिया गया। बिना किसी कारण बताओ नोटिस के सीधे इस तरह की कार्रवाई को कर्मचारी ने नियमों के विरुद्ध और अन्यायपूर्ण बताया है। शरीफ खान ने अधिकारियों पर मानसिक प्रताडऩा, पक्षपातपूर्ण रवैया और बदले की भावना से कार्रवाई करने का आरोप लगाते हुए कहा कि पूर्व में भी शिकायत की गई थी, लेकिन उस पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। उल्टा अब उनके खिलाफ निलंबन जैसी कार्रवाई की जा रही है, जो पूरे मामले को और संदिग्ध बनाती है। निष्पक्ष जांच होगी या फिर फाइलों में दबेगा प्रकरण यह मामला न सिर्फ एक कर्मचारी के अधिकारों का हनन दर्शाता है, बल्कि यह भी बताता है कि यदि विभाग के भीतर ही पारदर्शिता और जवाबदेही नहीं होगी, तो वन संरक्षण जैसे महत्वपूर्ण कार्य किस तरह प्रभावित होंगे। अब बड़ा सवाल यही है कि क्या प्रशासन इन गंभीर आरोपों की निष्पक्ष जांच कर दोषियों पर कार्रवाई करेगा, या फिर यह मामला भी फाइलों में दबाकर ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा। भानेश साकुरे / 06 मई 2026