(8 मई विश्व रेड क्रॉस दिवस) आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में जब हमारे पास अपनों के लिए भी ठीक से वक्त नहीं है, तब दुनिया में एक ऐसा संगठन भी काम कर रहा है, जिसे न नाम का लालच है और न ही किसी इनाम का। इनका बस एक ही मकसद है। जहाँ मुसीबत हो, वहाँ मदद बनकर पहुँच जाना। हम बात कर रहे हैं रेड क्रॉस की। हर साल 8 मई को जब हम विश्व रेड क्रॉस दिवस मनाते हैं, तो यह सिर्फ कैलेंडर की एक तारीख नहीं है, बल्कि उस जज्बे को सलाम करने का दिन है जो युद्घ के मैदान से लेकर प्रकृति के कहर तक, हर जगह इंसानियत की ढाल बनकर खड़ा रहता है। इस संस्था की शुरुआत की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है। करीब 165 साल पहले इटली में एक भीषण युद्घ हो रहा था, हज़ारों सैनिक घायल होकर तड़प रहे थे। वहीं से गुजर रहे स्विट्जरलैंड के कारोबारी हेनरी डुनेंट से यह दुख देखा नहीं गया। उन्होंने अपना सारा काम छोड़ दिया और गांव वालों को जुटाकर घायलों की सेवा में लग गए। उन्होंने एक ही बात कहा हम सब भाई हैं। यही छोटी सी सोच आगे चलकर दुनिया का सबसे बड़ा मानवीय संगठन रेड क्रॉस बनी। आज हेनरी डुनेंट के जन्मदिन पर ही पूरी दुनिया उन्हें याद करती है।भारत में इस महान संस्था का सफर भी बहुत प्रेरणादायी रहा है। साल 1920 में भारतीय रेड क्रॉस सोसाइटी का गठन हुआ था, और तब से लेकर आज तक यह हमारे देश की हर बड़ी मुश्किल में भरोसे का दूसरा नाम बनी हुई है। चाहे 1947 का वो मुश्किल दौर हो या फिर केदारनाथ की त्रासदी और भुज का भूकंप, रेड क्रॉस के वॉलंटियर्स ने हमेशा आगे बढ़कर मोर्चा संभाला है। आंकड़ों की बात करें तो आज रेड क्रॉस का हाथ दुनिया के 192 देशों तक फैला हुआ है। करीब 1.6 करोड़ से ज्यादा वॉलंटियर्स इस मिशन से जुड़े हैं। अकेले भारत में ही इसकी 1100 से ज्यादा शाखाएं दिन-रात काम कर रही हैं। कोरोना का वो दौर तो हम सबको याद ही है, जब लोग एक-दूसरे से हाथ मिलाने तक से डर रहे थे। उस मुश्किल वक्त में रेड क्रॉस के साथी ही थे जो अपनी जान जोखिम में डालकर घर-घर राशन और दवाइयां पहुँचा रहे थे। रेड क्रॉस का काम केवल जोश पर नहीं, बल्कि सात मजबूत सिद्धांतों पर टिका है, जिन्हें इसकी आत्मा कहा जाता है। ये सिद्धांत हैं - मानवता, निष्पक्षता, तटस्थता, स्वतंत्रता, स्वैच्छिक सेवा, एकता और सार्वभौमिकता। ये भारी-भरकम शब्द सुनने में भले ही कठिन लगें, पर इनका मतलब बहुत सीधा है। रेड क्रॉस किसी की मदद करते समय यह नहीं देखता कि सामने वाला किस धर्म का है या किस देश का है। इसके लिए हर वो इंसान बराबर है जो पीड़ित है। यह संस्था किसी भी राजनीतिक विवाद में नहीं पड़ती, ताकि यह हर जगह बेखौफ जा सके। रेड क्रॉस सिर्फ आपदा के समय ही नहीं दिखता, बल्कि हमारे आसपास एक शांत सैनिक की तरह हमेशा मौजूद रहता है। चाहे वह गरीबों के लिए सस्ती दवाइयां हों, थैलेसीमा पीड़ित बच्चों के लिए सुरक्षित खून का इंतजाम करना हो या फिर एक्सीडेंट के समय दी जाने वाली प्राथमिक सहायता - रेड क्रॉस हर मोड़ पर खड़ा मिलता है।इस संस्था की सबसे बड़ी ताकत इसकी तटस्थता है। जब दो देश आपस में लड़ रहे होते हैं, तब भी रेड क्रॉस का सफेद झंडा और उस पर बना लाल निशान दोनों तरफ के घायलों की सेवा करने की हिम्मत रखता है। यह एक ऐसा पुल है जिसे राजनीति या मजहब की दीवारें कभी नहीं तोड़ पाईं। लेकिन हमें यह भी समझना होगा कि रेड क्रॉस सिर्फ बड़ी-बड़ी बातों से नहीं, बल्कि छोटे-छोटे व्यक्तिगत योगदानों से चलता है। इस 8 मई को अगर हम सिर्फ एक बार रक्तदान करने का मन बना लें, तो यकीन मानिए हम भी इस महान काम का हिस्सा बन सकते हैं। हमारा थोड़ा सा खून किसी मरते हुए को नई जिंदगी दे सकता है। सच तो यह है कि रेड क्रॉस कोई सरकारी दफ्तर नहीं, बल्कि एक अहसास है जो बताता है कि इंसानियत आज भी जिंदा है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि भले ही हम बहुत बड़े अफसर या अमीर न हों, लेकिन किसी की मदद करने के लिए सिर्फ एक नेक दिल की आवश्यकता होती है। (लेखक पत्रकार हैं) ईएमएस / 07 मई 26