लेख
09-May-2026
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10 मई, 1960 जिस दिन संत बाबा विनोबा के सामने बागी समर्पण का बीज बोया गया जो 14 अप्रैल,1972 जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की मूर्ति के समक्ष वटवृक्ष बनकर सामने आया। प्रकृति सदैव सृजन करती रहती है। यह सतत प्रक्रिया है। बदलाव प्रकृति का सहज नियम है। जो नियमित चलता रहता है। सृजन- विसृजन, पैदा होना- खत्म होना, बनना-बिगड़ना, जीवन-मरण, शुरू होना-समाप्त होना, विकास-विनाश यह प्राकृतिक शैली है। इसके बिना प्रकृति चल नहीं सकती। इसके लिए प्रकृति के अपने नियम हैं। उन नियमों के अन्तर्गत संचालित है, यह सब प्रक्रिया। नियम के बाहर कुछ नहीं है। प्रकृति में नियम और नियमदाता एक ही है। समग्र और खंड दोनों एक ही नियम से संचालित होते हैं। दोनों के लिए दो नियम होंगे तो परम सत्य अटल कैसे रहेगा। सत्य की सत्ता नहीं प्रभुता स्थापित होती है। सत्ता कितनी भी कोशिश कर ले वह भ्रष्ट हो ही जाती है। सत्य की सत्ता भी भ्रष्ट हो सकती है। सत्य का अन्वेषण, अन्वेषक हो सकता है। सत्य का शोधकर्ता बनकर सत्य की खोज संभव है। इसलिए सत्य की सत्ता नहीं प्रभुता स्थापित की जाएगी तो सत्य की ओर कदम बढ़ेंगे। महात्मा गांधी ने कहा कि सत्य ही ईश्वर है। सत्य, प्रेम, करुणा के प्रयोग जीवन में सतत चलते रहेंगे तो व्यक्ति, समाज, देश-दुनिया, प्रकृति, सृष्टि का संरक्षण, संवर्धन संभव है। ऐसे ही एक प्रयोग की स्मृति को ताजा करने का प्रयास इस लेख में किया गया है। बाबा संत विनोबा भावे उनका भी व्यापक प्रभाव क्षेत्र रहा है। अध्यात्म के शोधक, प्रथम व्यक्तिगत सत्याग्रही, भूदान-ग्रामदान के प्रणेता, विभिन्न धर्मों के ज्ञाता, शांति सेना के संस्थापक, जय जगत का उदघोष देने वाले, सालों-साल भारत वर्ष की पैदल यात्रा करने वाले, गांधी विचार को जानने, समझने, मानने वाले संत विनोबा भावे। चंबल आज हमको शांत, सहज, सरल नजर आ रहा है। यह कभी खौंफ का पर्यायवाची रहा था। लोग रात को आराम से सो नहीं पाते थे, तो दिन में भी चैन की सांस लेना मुश्किल था। हर समय दिल दहशत से धड़कता रहता था। एक जाना अनजाना भय व्याप्त था। चंबल घाटी का नाम सुनकर क्षेत्र के बाहर के लोगों की भी धड़कन बढ़ जाती थी, सांस की गति तेज हो जाती थी। सत्ता, सरकार, पुलिस, प्रशासन क्षेत्र की जनता भी कुछ समाधान नहीं खोज पा रही थी। हिंसा, गोली के दम पर भी शांति की कोई कोशिश सफल नहीं हो पा रही थी। जितनों को मारा जाता कुछ समय बाद उससे अधिक संख्या में फिर नजर आने लगते। लंबे समय से यह सब चलता आ रहा था। उसी चंबल घाटी में आज हर समय बेझिझक आवागमन हो रहा है, चहल पहल देखने को मिल रही है। इसका बीज संत विनोबा भावे के हाथों ही रोपा गया था। उसकी एक संक्षिप्त झलक यहां दी जा रही है। कभी समय मिलेगा तो विस्तार से भी लिखा जा सकता है। बागी न तो अपने पैरों से बीहड़ में जाता है और न अपने पैरों से बीहड़ के बाहर आता है। चंबल के बीहड़ डाकू (बागी) और पुलिस दोनों से ग्रसित थे। चंबल में यह कहावत प्रचलित थी, मगर 1960 से यह बदल गई। और इसकी नींव रखी बागी मानसिंह के बेटे श्री तहसीलदार सिंह ने जो नैनी जेल में बंद थे। वहीं से पत्र लिखकर बाबा संत विनोबा भावे को चंबल में आने का आग्रह किया और उन्हें सूचना भेजी, बताया कि कुछ बागी आत्मसमर्पण करना चाहते हैं। यहां से ही आत्मसमर्पण की भूमिका बननी प्रारंभ हुई। गिरोह के नेता मानसिंह और उनके बेटे नम्बरदार की पुलिस के साथ हुई मुठभेड़ में मौत हो गई थी। घायल तहसीलदार सिंह को गिरफ्तार कर नैनी जेल में रखा गया था। मेजर जनरल श्री यदुनाथ सिंह को बाबा विनोबा ने अपना प्रतिनिधि बनाकर के जेल में श्री तहसीलदार सिंह से मिलकर बातचीत करने को भेजा। मेजर जनरल यदुनाथ सिंह, श्री हरसेवक मिश्र आदि ने अपने ढंग से विनोबा जी के मार्गदर्शन में काम किया। इन सबका परिणाम सामने आया। बाबा संत विनोबा भावे भूदान यात्रा के दौरान जब चंबल के क्षेत्र में पहुंचे। 10 मई को समर्पण का कार्यक्रम प्रारंभ हुआ जो कई दिन तक चला। बाबा विनोबा के सामने आत्मसमर्पण करने वाले बीस बागी यह थे-- 10 मई, 1960 को रामऔतार सिंह, 17 मई को श्री पातीराम, श्री किशन, श्री मोहरमन, 18 मई को श्रीलक्ष्मीनारायण शर्मा (लच्छी), श्री प्रभुदयाल (परभू), 19 मई को पंडित लोकमन दीक्षित (लुक्का), श्री कन्हई, श्री तेजसिंह, श्री हरेलाल, श्री रामस्नेही, श्री दुर्जन, श्री विद्याराम, श्री भूपसिंह (भूपा), श्री जगजीत, श्री मटरे, श्री भगवान सिंह, 20 मई को श्री रामदयाल, श्री बदन सिंह, 26 मई को श्री खचेरे ने आत्मसमर्पण किया। चंबल घाटी शांति समिति ने जिसकी स्थापना मेजर जनरल श्री यदुनाथ सिंह ने की थी। इन बागियों के मुकदमे लड़ना, इनका, इनके द्वारा पीड़ितों का पुनर्वास करना तथा आर्थिक-सामाजिक विकास के कार्यक्रमों को अपनी शक्ति अनुसार करने का कार्य भार संभाला। संस्थाओं, संगठनों ने समिति को सहयोग प्रदान किया। अनेक वकीलों ने निशुल्क मदद की। कुछ मुकदमे झूठे भी बनाए गए थे। बीस में से तेरह बागी तो 1963 में ही छूट गए थे। तीन लोग 1968 में रिहा हुए। एक 1970 में रिहा हुआ। चंबल घाटी शांति समिति ने अभिनव प्रयोग कर जो शानदार काम किया उसने सभी के मध्य सकारात्मक संदेश एवं विश्वास जगाया। जिसका प्रभाव अच्छा रहा। यह बीज अंकुरित हो 14 अप्रैल,1972 में बड़े पैमाने पर देश दुनिया के सामने एक ऐतिहासिक महत्व का, अहिंसा, प्रेम का प्रयास वट वृक्ष के रूप में प्रस्तुत हुआ। हिम्मत करने वालों की कभी हार नहीं होती। त्याग और प्रेम के पथ पर चल कर मूल ना कोई हारा, हिम्मत से पतवार संभालो, फिर क्या दूर किनारा। (यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है) .../ 9 मई /2026