अमेरिका और यूरोप की उड़ गई नींद मॉस्को(ईएमएस)। पिछले कुछ महीनों से मध्य पूर्व में इजरायल, अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने दुनिया को संकट में डाल दिया है। इस टकराव के कारण सामरिक रूप से महत्वपूर्ण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के बाधित होने से वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल और एलपीजी की सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित हुई है, जिससे ऊर्जा की कीमतों में जबरदस्त उछाल देखा जा रहा है। इसी बीच रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के एक ताजा बयान ने अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में खलबली मचा दी है। पुतिन ने घोषणा की है कि रूस और चीन एक बेहद गंभीर तेल और ऊर्जा समझौते के करीब पहुंच गए हैं, जो भविष्य में वैश्विक भू-राजनीति की दिशा बदल सकता है। यह समझौता केवल दो देशों के बीच का व्यापार मात्र नहीं है, बल्कि यह यूरेशियाई महाद्वीप में जीवाश्म ईंधन के प्रवाह के मार्ग को पूरी तरह से परिवर्तित करने की क्षमता रखता है। इस डील का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा पावर ऑफ साइबेरिया-2 पाइपलाइन परियोजना है। यह पाइपलाइन रूस के यामल प्रायद्वीप से शुरू होकर मंगोलिया के रास्ते उत्तरी चीन तक लगभग 2,600 किलोमीटर की दूरी तय करेगी। योजना के मुताबिक, इस पाइपलाइन के जरिए अगले 30 वर्षों तक सालाना 50 अरब क्यूबिक मीटर प्राकृतिक गैस की आपूर्ति की जाएगी। विशेषज्ञों का अनुमान है कि 2030 तक रूस से चीन को होने वाली कुल गैस आपूर्ति 100 बीसीएम सालाना के आंकड़े को पार कर सकती है। यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों ने रूस के लिए यूरोपीय ऊर्जा बाजार के दरवाजे लगभग बंद कर दिए हैं। ऐसे में मॉस्को के लिए चीन और भारत सबसे बड़े विकल्प बनकर उभरे हैं। नई पाइपलाइन के सक्रिय होने से रूस के उस गैस निर्यात का लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा चीन की तरफ मुड़ जाएगा, जो पहले यूरोप को जाता था। यह स्थिति अमेरिका और यूरोपीय देशों की रणनीतिक चिंताएं बढ़ाने वाली है। दिलचस्प बात यह है कि इस विशाल व्यापार के लिए डॉलर के बजाय युआन और रूबल में लेन-देन किया जा रहा है। हालांकि, सितंबर 2025 में हुई इस डील पर अंतिम कानूनी मुहर और कीमत से जुड़े कुछ तकनीकी पहलुओं पर चीन की सहमति मिलनी अभी बाकी है। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि इस सौदे में चीन मोलभाव की मजबूत स्थिति में है, क्योंकि वह जानता है कि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में रूस को इस डील की कहीं अधिक आवश्यकता है। यदि यह समझौता अपनी पूरी क्षमता के साथ धरातल पर उतरता है, तो यह इस दशक के सबसे बड़े ऊर्जा बदलावों में से एक होगा। वीरेंद्र/ईएमएस/10मई 2026