लेख
10-May-2026
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(11 मई आत्मनिर्भर भारत की वैज्ञानिक उड़ान का दिवस) राजस्थान के पोखरण में हुए सफल परमाणु परीक्षणों तथा भारत की ऐतिहासिक तकनीकी उपलब्धियों की स्मृति में प्रतिवर्ष 11 मई को राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस मनाया जाता है। वास्तव में, यह दिवस केवल हमारे देश की वैज्ञानिक सफलताओं का ही उत्सव नहीं है, बल्कि यह नवाचार(इनोवेशन), आत्मनिर्भरता, हमारी वैज्ञानिक सोच और राष्ट्र निर्माण के संकल्प का प्रतीक भी है। यह दिवस हमें यह स्मरण कराता है कि विज्ञान और तकनीक किसी भी राष्ट्र की प्रगति, सुरक्षा और समृद्धि की सबसे मजबूत आधारशिला होते हैं। सरल शब्दों में कहें तो यह दिन भारत की वैज्ञानिक, तकनीकी और नवाचार क्षमता को सम्मान देने के लिए समर्पित है। बहरहाल, यहां पाठकों को बताता चलूं कि राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस मनाने का मुख्य उद्देश्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत की उपलब्धियों का सम्मान करना, युवाओं में अनुसंधान(रिसर्च), नवाचार और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को प्रोत्साहित करना, आत्मनिर्भर भारत एवं आधुनिक तकनीकी विकास को बढ़ावा देना तथा वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और शोधकर्ताओं के योगदान को पहचान देना है। इस अवसर पर विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वाले व्यक्तियों एवं संस्थानों को सम्मानित भी किया जाता है तथा इसका आयोजन प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड द्वारा किया जाता है। गौरतलब है कि पहली बार यह दिवस 11 मई 1999 को मनाया गया था। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि इस दिवस का नामकरण तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा किया गया था। दरअसल, उस समय अटल बिहारी वाजपेयी ने जय जवान, जय किसान के नारे के साथ जय विज्ञान जोड़कर विज्ञान को राष्ट्र शक्ति का तीसरा स्तंभ बताया था। दरअसल, 11 मई 1998 को भारत ने पोखरण-II परमाणु परीक्षण के अंतर्गत सफल परमाणु परीक्षण किए थे, जिन्हें ऑपरेशन शक्ति के कोडनेम से जाना गया। इस मिशन का नेतृत्व तत्कालीन वैज्ञानिक सलाहकार एवं बाद में भारत के राष्ट्रपति बने डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने किया था। दरअसल,11 मई 1998 को भारत ने तीन परमाणु परीक्षण किए थे, जबकि इसके दो दिन बाद 13 मई 1998 को दो और परीक्षण सफलतापूर्वक किए गए। इस प्रकार कुल पाँच परमाणु परीक्षणों ने भारत को विश्व के परमाणु शक्ति संपन्न देशों की श्रेणी में स्थापित कर दिया। इन परीक्षणों के बाद भारत दुनिया का छठा परमाणु शक्ति संपन्न देश बना। विशेष बात यह रही कि भारत ने यह उपलब्धि बिना किसी बाहरी सहायता तथा परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) पर हस्ताक्षर किए बिना प्राप्त की।बहुत कम लोग यह बात जानते हैं कि पोखरण-II परमाणु परीक्षण की पूरी योजना इतनी गोपनीय थी कि कई वरिष्ठ मंत्रियों तक को इसकी जानकारी अंतिम समय में दी गई थी। इतना ही नहीं,परीक्षण स्थल पर वैज्ञानिकों के नाम बदल दिए गए थे और वे सेना के अधिकारियों की तरह पहचान छिपाकर काम कर रहे थे तथा परमाणु परीक्षण की तैयारी रात में की जाती थी, ताकि विदेशी जासूसी उपग्रह गतिविधियों को रिकॉर्ड न कर सकें। परीक्षण के उपकरणों को रेगिस्तान में ले जाते समय उन्हें सामान्य सैन्य-सामान की तरह ढककर रखा गया था। उपलब्ध जानकारी के अनुसार पोखरण परीक्षण के दौरान भारतीय सेना की 58वीं इंजीनियर रेजिमेंट ने अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, लेकिन लंबे समय तक उनका योगदान सार्वजनिक चर्चा में कम रहा।परीक्षण से पहले वैज्ञानिकों ने रेत पर पड़े पैरों के निशान तक मिटा दिए थे, ताकि उपग्रहों को किसी असामान्य गतिविधि का संदेह न हो।उस समय भारत आर्थिक चुनौतियों से गुजर रहा था, फिर भी देश ने स्वदेशी तकनीक के बल पर यह उपलब्धि हासिल की।डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने परीक्षण के बाद कहा था कि शक्ति ही शक्ति का सम्मान करती है। दिलचस्प तथ्य यह है कि उस समय दुनिया की सबसे शक्तिशाली खुफिया एजेंसी मानी जाने वाली सीआईए के उपग्रह भी भारत की इस गुप्त तैयारी का पता नहीं लगा सके थे। भारतीय वैज्ञानिकों और सेना ने अत्यंत गोपनीय ढंग से इस मिशन को सफल बनाया था। यह भारत की रणनीतिक क्षमता और वैज्ञानिक दक्षता का अद्भुत उदाहरण माना जाता है। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि भारत का पहला परमाणु परीक्षण वर्ष 1974 में इसी पोखरण में किया गया था, जिसका कोडनेम स्माइलिंग बुद्धा था। यह परीक्षण 18 मई 1974 को सफलतापूर्वक संपन्न हुआ था और इसे भारत के परमाणु हथियार कार्यक्रम की शुरुआत माना जाता है। उस समय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व में यह परीक्षण भारत की सामरिक सुरक्षा को मजबूत करने के उद्देश्य से किया गया था, विशेषकर चीन और पाकिस्तान से उत्पन्न चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए। इस मिशन में डॉ. राजा रामन्ना सहित अनेक भारतीय वैज्ञानिकों की महत्वपूर्ण भूमिका रही।वर्ष 1998 में जब दोबारा परीक्षण हुआ, तब बुद्ध पूर्णिमा के निकट होने के कारण वैज्ञानिकों ने अनौपचारिक रूप से कहा था-बुद्ध फिर मुस्कराए।कहना गलत नहीं होगा कि यह कथन भारत की दूसरी परमाणु सफलता का प्रतीक बन गया।11 मई 1998 का दिन केवल परमाणु परीक्षणों के कारण ही ऐतिहासिक नहीं बना, बल्कि इसी दिन भारत ने तकनीकी क्षेत्र में अन्य महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ भी हासिल कीं। भारत ने रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) द्वारा विकसित त्रिशूल मिसाइल का सफल परीक्षण किया। दरअसल, त्रिशूल सतह से हवा में मार करने वाली कम दूरी की मिसाइल थी, जो भारत के इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम का महत्वपूर्ण हिस्सा थी। यह कार्यक्रम भारत को रक्षा तकनीक में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम था।इसके अतिरिक्त, इसी दिन भारत के पहले स्वदेशी हल्के विमान हंसा-3 ने भी अपनी पहली सफल उड़ान भरी थी। नेशनल एयरोस्पेस लेबोरेटरीज द्वारा विकसित हंसा-3 भारत का पहला स्वदेशी दो सीटों वाला हल्का विमान था, जिसने बेंगलुरु में अपनी पहली उड़ान भरकर भारतीय विमानन तकनीक की क्षमता का परिचय दिया। वास्तव में, इन सभी उपलब्धियों ने यह सिद्ध कर दिया कि भारत केवल सामरिक शक्ति में ही नहीं, बल्कि विज्ञान, अनुसंधान, रक्षा तकनीक और एयरोस्पेस के क्षेत्र में भी तेजी से आत्मनिर्भर बन रहा है। यही कारण है कि 11 मई भारतीय विज्ञान और तकनीक के इतिहास में एक स्वर्णिम दिवस के रूप में दर्ज है। अंततः, यहां पर यह बात कही जा सकती है कि राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस केवल कैलेंडर की एक तारीख नहीं, बल्कि भारत के आत्मसम्मान, वैज्ञानिक चेतना और आत्मनिर्भरता का महत्वपूर्ण प्रतीक है। 11 मई 1998 की ऐतिहासिक घटनाओं ने पूरी दुनिया को यह संदेश दिया कि भारतीय वैज्ञानिक और इंजीनियर कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी विश्वस्तरीय तकनीक विकसित करने में सक्षम हैं। आज यह दिवस हमें यह प्रेरणा देता है कि नवाचार(इनोवेशन)और तकनीक(टेक्नोलॉजी) का वास्तविक उद्देश्य समाज की समस्याओं का समाधान करना तथा भविष्य की चुनौतियों के लिए राष्ट्र को तैयार करना है। चाहे रक्षा क्षेत्र हो, अंतरिक्ष अनुसंधान हो, डिजिटल तकनीक हो या आम नागरिक का दैनिक जीवन-तकनीकी प्रगति ही एक सशक्त, सुरक्षित, आत्मनिर्भर और आधुनिक भारत की मजबूत नींव है। (सुनील कुमार महला, फ्रीलांस राइटर, कॉलमिस्ट व युवा साहित्यकार, पिथौरागढ़, उत्तराखंड) ईएमएस / 10 मई 26