लेख
10-May-2026
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राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की वार्षिक रिपोर्ट केवल अपराधों के आंकड़े प्रस्तुत नहीं करती है, बल्कि समाज की बदलती मानसिकता और सामाजिक तनावों का भी आईना होती है। हाल की रिपोर्ट में झारखंड सहित कई राज्यों में 18 से 30 वर्ष आयु वर्ग के युवाओं में बढ़ते गुस्से, असहिष्णुता और आक्रामकता को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की गई है। यह चिंता अपराधों की संख्या तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक बदलाव में उस मानसिक स्थिति का संकेत है, जिसमें भारत की सबसे बड़ी आबादी का युवा वर्ग धीरे-धीरे धैर्य और संतुलन खो रहा है। उसकी संलिप्तता कई अपराधों में महंगाई, बेरोजगारी और आर्थिक कारणों से होने लगी है। युवा वर्ग जरा-जरा सी बात पर गुस्से में नजर आ रहा है। रिपोर्ट के अनुसार रेलवे में अपराध बढ़ रहे हैं। साइबर अपराध, हत्या और आत्महत्या जैसी घटनाओं में अप्रत्याशित वृद्धि हो रही है। जमीन और संपत्ति विवादों के कारण होने वाली हत्याओं में बढ़ोत्तरी असहिष्णुता का उदाहरण है। छोटी-छोटी बातों पर हिंसा, पारिवारिक कलह अब सामाजिक राजनीतिक एवं धार्मिक टकराव की सामान्य अपराधिक घटनाएं बनती जा रही हैं। इस स्थिति का मतलब है, समाज में संवाद और सहनशीलता का स्तर तेजी से कमजोर होता जा रहा है। युवाओं के भीतर बढ़ते गुस्से के पीछे सामाजिक, पारिवारिक और आर्थिक कारण हैं। सबसे बड़ा कारण बेरोजगारी और महंगाई है। पढ़ाई पूरी करने के बाद भी युवाओं को रोजगार नहीं मिल रहा है। सरकारों की असंवेदनशीलता से युवाओं के भीतर गुस्सा निराशा और हताशा बढ़ रही है। बढ़ती महंगाई ने मध्यम और निम्न वर्गीय परिवारों की आर्थिक स्थिति को तेजी से खराब कर दिया है। रोजाना खाने-पीने और जरूरी खर्च भी नहीं उठा पा रहे हैं। युवा अपनी रोजाना की जरूरतों और भविष्य की असुरक्षा तथा शादी-ब्याह नहीं हो पाने के कारण भारी गुस्से में दिख रहा है। इसका एक नजारा पिछले दिनों बिहार में देखने को मिला। युवाओं के प्रदर्शन पर पुलिस ने जमकर लाठियां भांजी, यह स्थिति अब लगभग हर राज्य में दिखने लगी है। युवाओं ने जो सपने संजोए थे, वे सपने ही बनकर रह गए हैं। वास्तविकता से वह कोसों दूर हैं। जिसके कारण युवाओं का गुस्सा, मानसिक तनाव बढ़ता जा रहा है, जो कानून व्यवस्था के लिए भी चुनौती बन रहा है। रिपोर्ट में बढ़ते हुए अपराधों को महंगाई और बेरोजगारी से भी जोड़कर देखा जा रहा है। सोशल मीडिया, डिजिटल संस्कृति, बाजारवाद ने इस समस्या को तेजी के साथ बढ़ाने का काम किया है। युवा अब तेजी से प्रतिक्रिया देने समूह के रूप में सड़कों पर उतरने लगा है। समूह में अपराध करने लगा है। कर्ज, महंगाई, बेरोजगारी के कारण युवाओं का धैर्य खत्म हो गया है। आपसी संवाद और संयम जैसी सामाजिक और मानवीय स्थिति कमजोर पड़ती जा रही है। साइबर अपराधों में युवाओं की बढ़ती संलिप्तता दर्शाती है, तकनीक का उपयोग सकारात्मक कम और त्वरित लाभ के लिए हो रहा है। ऑनलाइन ठगी, फर्जीवाड़ा और डिजिटल उत्पीड़न जैसे अपराधों में युवाओं की भागीदारी गंभीर चेतावनी है। समाज में आत्महत्या के साथ अब पारिवारिक सामूहिक आत्महत्या के बढ़ते मामले भी चिंता का विषय हैं। मानसिक दबाव अब केवल व्यक्ति का नहीं है बल्कि परिवार का बनता जा रहा है। नौकरी के लिए बार-बार परीक्षा, प्रतियोगिता पारिवारिक अपेक्षाएं 25 से 30 वर्ष की उम्र हो जाने के बाद भी शादी विवाह नहीं होना युवाओं को भीतर से तोड़ रही हैं। दुर्भाग्य है इस स्थिति पर सामाजिक, परिवार धार्मिक एवं शासन स्तर पर कहीं चर्चा नहीं हो रही है। मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर चर्चा नहीं है। परिवार समाज और शासन स्तर पर सारी संवेदनाएं खत्म हो चुकी हैं। युवा अपनी समस्याओं को लेकर अकेले संघर्ष कर रहे हैं। जरूरी आवश्यकता के कारण कई बार गलत कदम उठा लेते हैं। सरकार और समाज दोनों को युवाओं की इस स्थिति को कानून-व्यवस्था की समस्या मानकर नहीं देखना चाहिए। यह सामाजिक, आर्थिक और मानसिक तनाव से जुड़ा एक बड़ा सामाजिक संकट है। रोजगार के अवसर बढ़ाने, कौशल विकास को मजबूत करने और युवाओं को वर्तमान स्थिति का मुकाबला किस तरह से किया जाए, उसके लिए उनके साथ सहानुभूति से पेश आने की जरूरत है। शिक्षा व्यवस्था, नैतिक मूल्यों, धैर्य, संवाद और मानसिक स्थिति पर सभी को विशेष ध्यान देना होगा। परिवारों में बच्चों के साथ संवाद बढ़ाना होगा। ताकि वह अपनी समस्याएं खुलकर परिवार और दोस्तों के साथ साझा कर सकें। समाज में शांति, सामाजिक और विकास कार्यों में युवाओं की ऊर्जा की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यही ऊर्जा गुस्से और आक्रामकता में बदल गई। तो इसके परिणाम बेहद गंभीर होंगे। एनसीआरबी की रिपोर्ट बड़ी चेतावनी है। समय रहते युवाओं की समस्याओं को समझा जाए। महंगाई बेरोजगारी और कर्ज जैसी समस्याओं का निराकरण करने का काम सरकारों का है। युवाओं को सही दिशा में अवसर तथा मार्गदर्शन देना होगा। पुलिस कानून से अपराध रोकना पर्याप्त नहीं होगा। सरकार और समाज को मानसिक और सामाजिक वातावरण मैं बदलाव लाना होगा। अन्यथा कभी भी स्थिति बेकाबू हो सकती है। ईएमएस / 10 मई 26