लेख
10-May-2026
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संपादक : ब्रजेश कुमार सिन्हा, राजेश कुमार मिश्र व अन्य प्रकाशक : हिंदी विज्ञान साहित्य परिषद, मुंबई वैज्ञानिक का अप्रैल -जून 26 अंक डॉ शिव गोपाल मिश्र स्मृतिअंक है जिसमें हिंदी में विज्ञान लेखन के प्रमुख स्तंभ डॉ. शिव गोपाल मिश्र का 24मार्च को 93 वर्ष की आयु में निधन हो गया था जिसके वे प्रधानमंत्री रहें विज्ञान परिषद की स्थापना 1913 में हुई और 1915 में देश की पहली विज्ञान की पत्रिका विज्ञान का प्रकाशन हुआ यानि आजादी से पहले ही भारत में विज्ञान संचार की नींव विज्ञान परिषद, प्रयाग ने रखी जब अंग्रेजी हुकूमत में प्रिंट करना बड़ा काम था अतः देश की आजादी में हिंदुस्तान की आवाम को विज्ञान से जोड़ कर रखना एक मुश्किल काम था और आज 1956 में आप विज्ञान परिषद से जुड़े और विज्ञान पत्रिका के संपादक मंडल के सदस्य बने। 1958 में जब विज्ञान परिषद् प्रयाग द्वारा देश की प्रथम हिन्दी शोध पत्रिका विज्ञान परिषद् अनुसंधान पत्रिका का प्रकाशन आरम्भ किया गया तो उसके संपादक डा० सत्यप्रकाश जी ने डा० शिवगोपाल मिश्र को इस पत्रिका का प्रबंध संपादक नियुक्त किया। लेखक डॉ दीपक कोहली के अनुसार स्वर्गीय प्रोफेसर शिवगोपाल मिश्र का निधन भारतीय वैज्ञानिक, शैक्षिक तथा हिंदी विज्ञान लेखन की परंपरा के लिए एक गहरी क्षति के रूप में दर्ज किया जाएगा। उनका व्यक्तित्व उन विरल शिक्षाविदों और विज्ञान-संवर्धकों में था, जिन्होंने न केवल विज्ञान को आत्मसात किया, बल्कि उसे समाज के व्यापक सरोकारों से जोड़ने का आजीवन प्रयास किया। वे इस तथ्य के प्रबल समर्थक थे कि विज्ञान की प्रासंगिकता तभी सुनिश्चित होती है, जब वह जनमानस की भाषा में, उसकी बौद्धिक संरचना के अनुरूप और उसके जीवनानुभवों से संवाद स्थापित करते हुए प्रस्तुत किया जाए। प्रोफेसर मिश्र का कार्यक्षेत्र बहुआयामी था, किंतु उनकी पहचान विशेष रूप से विज्ञान परिषद प्रयाग, प्रयागराज से जुड़ी रही, जहाँ उन्होंने प्रधानमंत्री के रूप में दीर्घकाल तक कार्य करते हुए संस्था को एक सुदृढ़ वैचारिक आधार प्रदान किया। 1913 में स्थापित विज्ञान परिषद प्रयाग ने हिंदी में विज्ञान के प्रचार-प्रसार को एक संगठित आंदोलन का स्वरूप दिया था। औपनिवेशिक काल में जब ज्ञान-विज्ञान की भाषा के रूप में अंग्रेज़ी का वर्चस्व स्थापित हो चुका था, उस समय हिंदी में विज्ञान को प्रतिष्ठित करना एक बौद्धिक और सांस्कृतिक चुनौती थी। इस चुनौती का सामना परिषद ने जिस प्रतिबद्धता के साथ किया, प्रोफेसर मिश्र ने उसी परंपरा को समकालीन संदर्भों में पुनर्स्थापित और विस्तारित किया। उनके कार्यकाल में परिषद की गतिविधियों का स्वरूप अधिक गतिशील, समावेशी और समाजोन्मुख हुआ। उन्होंने यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया कि विज्ञान का विमर्श केवल अकादमिक परिसरों तक सीमित न रह जाए, बल्कि वह विद्यालयों, महाविद्यालयों और सामान्य जनजीवन तक पहुँचे। वैज्ञानिक व्याख्यानमालाएँ, संगोष्ठियाँ, छात्र-केंद्रित कार्यशालाएँ तथा विज्ञान लोकप्रियकरण कार्यक्रम उनके नेतृत्व में निरंतर विस्तारित हुए। इन आयोजनों का उद्देश्य केवल सूचना का प्रसार नहीं, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास था, एक ऐसा दृष्टिकोण जो जिज्ञासा, तर्कशीलता और प्रमाण-आधारित चिंतन को प्रोत्साहित करता है। शिक्षण के क्षेत्र में प्रोफेसर मिश्र का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। वे उन शिक्षकों में थे, जिनके लिए अध्यापन एक औपचारिक दायित्व नहीं, बल्कि एक बौद्धिक प्रतिबद्धता थी। उनके कक्षा-कक्ष में ज्ञान का संप्रेषण एकतरफा न होकर संवादात्मक होता था। वे छात्रों को प्रश्न पूछने, स्थापित मान्यताओं पर पुनर्विचार करने और स्वतंत्र चिंतन विकसित करने के लिए प्रेरित करते थे। इस प्रकार उन्होंने न केवल विषय-विशेषज्ञ तैयार किए, बल्कि ऐसे युवा मस्तिष्कों का निर्माण किया, जो वैज्ञानिक पद्धति को जीवन के विविध आयामों में लागू करने में सक्षम हों। उनके निर्देशन में संपन्न हुए शोध कार्यों की गुणवत्ता और विविधता इस बात का प्रमाण है कि वे अनुसंधान को किस गंभीरता से लेते थे। उनके लिए शोध केवल शैक्षणिक उपाधि प्राप्त करने का माध्यम नहीं था, बल्कि ज्ञान-निर्माण की एक सतत प्रक्रिया थी, जिसका अंतिम लक्ष्य समाज की समस्याओं के समाधान में योगदान देना है। वे इस बात पर बल देते थे कि अनुसंधान का मूल्यांकन केवल प्रकाशनों की संख्या से नहीं, बल्कि उसकी सामाजिक उपयोगिता और वैचारिक नवीनता से किया जाना चाहिए मशहूर पर्यावरणविद डॉ दयाशंकर त्रिपाठी जी के अनुसार शिवगोपाल मिश्र जी के गोलोकगमन का दुखद समाचार हिन्दी विज्ञान लेखकों और विज्ञान संचारकों को स्तब्ध कर दिया है। एक महान विभूति, विज्ञान की विवधताओं को गहराई से समझने और अपनी अन्तिम सांस तक आगामी पीढियों में रोपित करते का दायित्व निर्वहन प्रोफेसर मिश्र जी से सीखा जा सकता है जो समय, तन, मन और धन से परिषद को सीचने और पुष्पित-पल्लवित करने का कार्य किया है। हम सब गर्व के साथ कह सकते हैं कि एक हिन्दी में विज्ञान लेखक पैदा करने और नये लेखकों को प्रोत्साहित करने वाला महान व्यक्तित्व हिन्दी में विज्ञान की सेवा करते हुए पूरा जीवन समर्पित कर दिया। पुस्तक में इन्ही सब कार्यों को लेखक ने पिरोया है। ईएमएस/10/05/2026