- पर्यावरण मंत्रालय की अव्यावहारिक नीति पर उद्योग जगत ने उठाए सवाल नई दिल्ली (ईएमएस)। भारत की वाहन कंपनियों ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए निर्धारित वाहन कबाड़ (स्क्रैप) से जुड़े इस्पात समतुल्य दायित्वों को पूरा करने में करीब 70 प्रतिशत की भारी कमी दर्ज की है। उद्योग जगत ने इसके लिए पर्यावरण मंत्रालय की अव्यावहारिक नीति को जिम्मेदार ठहराया है, खासकर अन्य इस्पात स्क्रैप सामग्री के प्रावधान को नियमों से हटाने को। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने जनवरी 2025 में ‘पर्यावरण संरक्षण (वाहन को चलाने की अवधि की समाप्ति) नियम, 2025’ अधिसूचित किए थे, जिसके तहत वाहन विनिर्माताओं को विस्तारित उत्पादक दायित्व (ईपीआर) के तहत स्क्रैप किए गए पुराने वाहनों से प्राप्त इस्पात के आधार पर दायित्व पूरा करना था। हालांकि, मंत्रालय ने मार्च 2026 में एक मसौदा संशोधन में अन्य इस्पात स्क्रैप सामग्री के प्रावधान को हटा दिया, जिससे केवल पुराने वाहनों से प्राप्त इस्पात ही ईपीआर प्रमाणपत्र के लिए मान्य रहा। उद्योग अधिकारियों के अनुसार, इस बदलाव ने लक्ष्य हासिल करना लगभग असंभव बना दिया। वित्त वर्ष 2025-26 में कंपनियों को 15-20 वर्ष पुराने निजी और वाणिज्यिक वाहनों के इस्पात समतुल्य का कम से कम आठ प्रतिशत कबाड़ में बदलना था। इसका अर्थ था कि लगभग 7.62 लाख वाहनों को कबाड़ किया जाना आवश्यक था, जबकि आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, केवल 2.42 लाख पुराने वाहन ही कबाड़ केंद्रों पर पहुंचे। यह लगभग 5.2 लाख वाहनों की कमी को दर्शाता है। वाहन विनिर्माताओं के संगठन सियाम ने भी मंत्रालय को पत्र लिखकर पुराने वाहनों की सीमित उपलब्धता पर चिंता जताई है। उद्योग ने इस नीति को अव्यावहारिक बताया है और शुरुआती वर्षों में अन्य इस्पात स्क्रैप के उपयोग की अनुमति देने का सुझाव दिया है। उद्योग अधिकारियों का कहना है कि भविष्य में जब ईपीआर लक्ष्य 13 प्रतिशत और फिर 18 प्रतिशत तक बढ़ेंगे, तो यह कमी और भी गंभीर हो सकती है। उद्योग ने इस नीति की तत्काल समीक्षा की मांग की है। सतीश मोरे/10मई ---