क्षेत्रीय
11-May-2026
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- सवालों के घेरे में अफसरशाही, सिस्टम नहीं, साजिश! वनरक्षक पर एकतरफा कार्रवाई, सच बोलने की मिली सजा - निलंबित वनरक्षक ने खोली अफसरशाही की पोल बालाघाट (ईएमएस). वन विभाग में अब कानून नहीं, बल्कि अफसरों की मनमर्जी चल रही है। बिना नोटिस, बिना जवाब-तलब सीधे निलंबन—यह कोई प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, बल्कि तानाशाही का खुला प्रदर्शन है। सवाल यह है कि क्या विभाग में अब न्याय की जगह बदले की राजनीति हावी हो चुकी है? वनरक्षक को सच बोलने की सजा मिली है। वहीं निलंबित वनरक्षक ने भी अफसरशाही की पोल खोल दी है। वन परिक्षेत्र लामता में पदस्थ वनरक्षक शरीफ खान के खिलाफ की गई निलंबन की कार्रवाई ने पूरे सिस्टम की पोल खोल दी है। मवेशी मालिकों से अवैध वसूली के आरोपों की जांच उपवनमंडलाधिकारी उकवा सामान्य द्वारा की गई और 7 अप्रैल को रिपोर्ट डीएफओ को सौंप दी गई। इसके बाद 21 अप्रैल को बिना किसी प्रक्रिया का पालन किए सीधे निलंबन का फरमान सुना दिया गया। निलंबन के आदेश में नियमों की औपचारिकता जरूर पूरी की गई—मुख्यालय तय, जीवन निर्वाह भत्ता मंजूर—लेकिन सबसे जरूरी प्रक्रिया, यानी आरोपी कर्मचारी से जवाब मांगना, पूरी तरह गायब रही। यह कार्रवाई साफ तौर पर बताती है कि विभाग में अब पहले सजा, बाद में जांच का खतरनाक ट्रेंड चल पड़ा है। वनपाल की शिकायत करना पड़ा महंगा मामले का सबसे विस्फोटक पहलू यह है कि वनरक्षक शरीफ खान उन्हीं कर्मचारियों में शामिल थे जिन्होंने वनपाल नीतू गोस्वामी के खिलाफ मोर्चा खोला था। 6 वनरक्षकों ने मिलकर वनपाल पर मानसिक प्रताडऩा, अयोग्यता और खराब व्यवहार के आरोप लगाए थे। यहां तक कि उन्हें हटाने की मांग तक की गई थी। सूत्रों की मानें तो यही गुनाह शरीफ खान पर भारी पड़ गया। उन्होंने व्यक्तिगत तौर पर भी डीएफओ को शिकायत दी थी कि वनपाल उनकी छवि खराब कर रही हैं और इसके बाद शुरू हुआ ‘टारगेट’ करने का खेल। क्या यह विभाग है या ‘तानाशाही का अड्डा’? सबसे बड़ा सवाल अब यही खड़ा हो रहा है कि क्या बालाघाट वन विभाग में नियम-कायदे सिर्फ छोटे कर्मचारियों को दबाने के लिए रह गए हैं? क्या वरिष्ठ अधिकारी अपने चहेतों को बचाने और विरोध करने वालों को कुचलने के लिए पद का दुरुपयोग कर रहे हैं? अगर वनरक्षक पर लगे आरोप सही थे, तो नोटिस देकर जवाब क्यों नहीं मांगा गया? अगर प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ, तो यह कार्रवाई खुद ही संदेह के घेरे में है। सवालों के घेरे में कार्यवाही यह मामला सिर्फ एक निलंबन नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम में फैली तानाशाही, पक्षपात और बदले की राजनीति का जीता-जागता उदाहरण है। अगर इस पर उच्च स्तर से निष्पक्ष जांच नहीं हुई, तो यह साफ संदेश जाएगा जो आवाज उठाएगा, उसे कुचल दिया जाएगा! अब टारगेट में होंगे दूसरे वनरक्षक वनपाल की शिकायत करने से टारगेट में फिलहाल एक ही वनरक्षक आया है। ऐसे में शेष वनरक्षकों पर भी भविष्य में कार्यवाही की गाज गिर सकती है। दरअसल, 2 फरवरी को बुढिय़ागांव के बीटगार्ड सुरेंद रंगारे, भोंडवा बीटगार्ड सीता रावत, महकापाठा बीटगार्ड चंद्रशेखर शुक्ला, डोंगरिया बीटगार्ड राकेश कुमार मेरावी, जनमखार बीट गार्ड हरीश कुमार के साथ लामता बीटगार्ड शरीफ खान ने वनपाल व परिक्षेत्र सहायक नीतू गोस्वामी के खिलाफ मोर्चा खोलकर डीएफओ को लिखित शिकायत की थी। इसी दिनांक को वनरक्षक शरीफ खान ने व्यक्तिगत रुप से भी वनपाल नीतू के खिलाफ शिकायत की थी। इन्हीं शिकायतों के कारण वनरक्षक शरीफ खान अधिकारियों के टारगेट में आ गए। पहले उनका मार्च माह का दो दिन का वेतन काट दिया गया, इसके बाद एक मामूली शिकायत पर बगैर नोटिस जारी किए उन्हें निलंबित कर दिया। इसी तरह अब शेष 5 वनरक्षकों को भी पृथक-पृथक टारगेट कर उनके खिलाफ कार्यवाही की जा सकती है। हालांकि, इस पूरे प्रकरण में बैहर एसडीओ ने मामले की जांच की थी। जांच रिपोर्ट डीएफओ को सौंप दी, जिसमें वरिष्ठ अधिकारियो ंने पूरी तरह से मामले में लीपापोती कर दी है। वनपाल पर ‘मेहरबानी’, वनरक्षक पर ‘कठोर वार’ हैरानी की बात यह है कि वनपाल के खिलाफ आई शिकायतों में पूरा ड्रामा रचा गया—जांच, बयान, कागजी खानापूर्ति और अंत में मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। लेकिन जब बारी वनरक्षक की आई, तो न जांच का विस्तार, न सुनवाई—सीधे निलंबन! यह दोहरा रवैया साफ दिखाता है कि विभाग में न्याय नहीं, बल्कि पद और प्रभाव के आधार पर फैसले लिए जा रहे हैं। भानेश साकुरे / 11 मई 2026