गुजरात लंबे समय से देश के सबसे विकसित और सुरक्षित राज्यों में गिना जाता रहा है। उद्योग, व्यापार, निवेश और रोजगार के कारण इस राज्य की पहचान एक मजबूत आर्थिक केंद्र के रूप में बनी है। खासतौर पर सूरत को देश की डायमंड और टेक्सटाइल राजधानी कहा जाता है, जहां करोड़ों रुपए का कारोबार प्रतिदिन होता है। लेकिन अब यही सूरत बढ़ते अपराधों के कारण चिंता का विषय बनता जा रहा है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट ने जिस तरह गुजरात में अपराधों की बढ़ती संख्या को सामने रखा है, उसने कानून व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आंकड़े बताते हैं कि राज्य में अपराध लगातार बढ़ रहे हैं और अपराधियों में पुलिस का डर कम होता दिखाई दे रहा है। एनसीआरबी की रिपोर्ट के अनुसार गुजरात में वर्ष 2024 के दौरान 6.15 लाख से अधिक अपराध दर्ज किए गए। यह संख्या पिछले दो वर्षों की तुलना में करीब 18 प्रतिशत अधिक है। राज्य में शराबबंदी लागू होने के बावजूद शराब और ड्रग्स से जुड़े मामलों की संख्या सबसे ज्यादा दर्ज की गई है। कुल अपराधों में लगभग 58 प्रतिशत मामले शराब और नशे से संबंधित हैं। यह स्थिति बताती है कि प्रतिबंध होने के बाद भी अवैध कारोबार खुलेआम जारी है और अपराधी नेटवर्क मजबूत होता जा रहा है। राज्य में हिंसक अपराधों की बढ़ती संख्या सबसे अधिक चिंता पैदा करती है। हत्या, हत्या की कोशिश, मारपीट और गंभीर हमलों जैसे मामलों में एक वर्ष के भीतर 33 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। वर्ष 2024 में गुजरात में 999 लोगों की हत्या हुई। यह केवल आंकड़ा नहीं बल्कि कानून व्यवस्था के कमजोर होते ढांचे का संकेत है। यदि किसी राज्य में अपराधी खुलेआम हत्या करने से नहीं डर रहे हैं तो इसका सीधा अर्थ है कि अपराधियों के मन से कानून का भय कम हो चुका है। सूरत की स्थिति इस संदर्भ में और भी गंभीर दिखाई देती है। देश के बड़े शहरों में अपराध के मामलों में सूरत तीसरे स्थान पर पहुंच चुका है। शहर में लगभग 63 हजार अपराध दर्ज हुए हैं। हत्या, लूट, हमला, चोरी, दुष्कर्म और अवैध गतिविधियों के मामलों में लगातार वृद्धि हो रही है। पांडेसरा, उधना और लिम्बायत जैसे क्षेत्रों में हर महीने हत्या और हमले की घटनाएं सामान्य होती जा रही हैं। स्थानीय लोगों के बीच असुरक्षा की भावना बढ़ रही है। कई मामलों में अपराधी खुलेआम वारदात को अंजाम देकर फरार हो जाते हैं। इससे आम नागरिकों का भरोसा कमजोर पड़ता है। सूरत केवल एक सामान्य शहर नहीं है। यह देश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देने वाला औद्योगिक केंद्र है। यहां लाखों मजदूर और व्यापारी काम करते हैं। डायमंड उद्योग और टेक्सटाइल कारोबार से जुड़े करोड़ों रुपए हर दिन बाजार में घूमते हैं। ऐसे शहर में यदि अपराध बढ़ते हैं तो उसका असर सीधे व्यापारिक माहौल पर पड़ता है। निवेशक और व्यापारी सबसे पहले सुरक्षा और स्थिरता देखते हैं। यदि शहर में लगातार हत्या, हमला और गैंग गतिविधियां बढ़ेंगी तो इसका प्रभाव उद्योग और रोजगार पर भी पड़ेगा। शहर में अपराध बढ़ने के पीछे कई कारण दिखाई देते हैं। तेजी से बढ़ती आबादी, बाहरी राज्यों से आने वाले श्रमिकों की बड़ी संख्या, बेरोजगारी, नशे का फैलता कारोबार और स्थानीय स्तर पर सक्रिय असामाजिक तत्व अपराध को बढ़ावा दे रहे हैं। कई क्षेत्रों में अवैध शराब और ड्रग्स का नेटवर्क युवाओं को अपराध की ओर धकेल रहा है। पुलिस कार्रवाई होने के बावजूद अपराधी गिरोह दोबारा सक्रिय हो जाते हैं। इससे यह धारणा बनती है कि अपराधियों के खिलाफ कठोर और लगातार कार्रवाई की कमी है। एनसीआरबी की रिपोर्ट में महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराधों की स्थिति भी चिंताजनक बताई गई है। महिलाओं के खिलाफ हजारों मामले दर्ज हुए, लेकिन बहुत कम मामलों में अंतिम फैसला आया। जब अपराधियों को सजा मिलने में लंबा समय लगता है तो अपराध का डर कम हो जाता है। यही कारण है कि कई अपराधी कानून की कमजोर प्रक्रिया का फायदा उठाकर बच निकलते हैं। महिलाओं की सुरक्षा किसी भी समाज की सभ्यता का पैमाना होती है। यदि महिलाएं सुरक्षित महसूस नहीं करेंगी तो विकास के सारे दावे कमजोर पड़ जाएंगे। साइबर अपराध भी तेजी से बढ़ रहे हैं। ऑनलाइन धोखाधड़ी, बैंक फ्रॉड, फर्जी लिंक और डिजिटल ठगी के मामलों में लगातार वृद्धि हो रही है। अपराधी अब तकनीक का इस्तेमाल करके लोगों को निशाना बना रहे हैं। दूसरी ओर पुलिस और जांच एजेंसियों के सामने तकनीकी संसाधनों और विशेषज्ञों की कमी भी चुनौती बनी हुई है। आने वाले समय में साइबर अपराध कानून व्यवस्था के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन सकते हैं। राज्य में चोरी और लूट के मामलों ने भी चिंता बढ़ाई है। पिछले 12 वर्षों में हजारों करोड़ रुपए का माल चोरी हुआ लेकिन उसका केवल एक चौथाई हिस्सा ही बरामद हो सका। यह स्थिति पुलिस जांच और रिकवरी सिस्टम की कमजोरी को दर्शाती है। जब चोरी का माल वापस नहीं मिलता तो पीड़ित व्यक्ति का विश्वास टूटता है। अपराधियों को भी लगता है कि वे आसानी से बच सकते हैं। आत्महत्या के आंकड़े भी समाज की गंभीर स्थिति को उजागर करते हैं। बेरोजगारी, करियर का दबाव, पारिवारिक समस्याएं और बीमारी के कारण हजारों लोगों ने आत्महत्या की। यह केवल मानसिक स्वास्थ्य का मुद्दा नहीं बल्कि सामाजिक और आर्थिक दबाव का संकेत भी है। जब युवा रोजगार और भविष्य को लेकर निराश होते हैं तो समाज में अस्थिरता बढ़ती है। ऐसी परिस्थितियों में अपराध का वातावरण भी मजबूत होता है। सूरत जैसे शहर में पुलिस की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। लोगों के बीच यह भावना बननी चाहिए कि कानून सबसे ऊपर है और अपराध करने वालों को किसी भी स्थिति में छोड़ा नहीं जाएगा। इसके लिए पुलिस को अधिक सक्रिय, आधुनिक और सख्त बनना होगा। संवेदनशील क्षेत्रों में लगातार गश्त, सीसीटीवी निगरानी, नशे के कारोबार पर कठोर कार्रवाई और हिस्ट्रीशीटर अपराधियों पर विशेष नजर रखने की जरूरत है। केवल अपराध दर्ज करना पर्याप्त नहीं है बल्कि अपराध रोकना सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। पुलिस और जनता के बीच विश्वास बढ़ाना भी आवश्यक है। कई बार लोग डर या अविश्वास के कारण शिकायत दर्ज नहीं कराते। यदि स्थानीय पुलिस जनता से संवाद बढ़ाए और त्वरित कार्रवाई करे तो अपराध पर नियंत्रण संभव है। मोहल्ला स्तर पर निगरानी समितियां, व्यापारिक संगठनों के साथ समन्वय और युवाओं के लिए जागरूकता अभियान भी प्रभावी साबित हो सकते हैं। राज्य सरकार को भी यह समझना होगा कि केवल विकास परियोजनाएं और बड़े निवेश ही पर्याप्त नहीं हैं। यदि कानून व्यवस्था कमजोर होगी तो विकास की गति भी प्रभावित होगी। सुरक्षित वातावरण किसी भी विकसित समाज की पहली शर्त होता है। गुजरात की पहचान उद्योग और शांति से रही है। इसलिए अपराध की बढ़ती घटनाओं को सामान्य मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सूरत में हर महीने होने वाली हत्याएं और हमले इस बात का संकेत हैं कि अपराधियों में पुलिस का डर कम हो रहा है। यह स्थिति किसी भी शहर के लिए खतरनाक होती है। पुलिस का खौफ अपराधियों के मन में होना जरूरी है, लेकिन इसका अर्थ केवल सख्ती नहीं बल्कि प्रभावी और निष्पक्ष कानून व्यवस्था भी है। अपराधी चाहे कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, यदि उसे तुरंत कार्रवाई और सजा का डर होगा तो अपराध स्वतः कम होंगे। आज जरूरत केवल आंकड़ों पर चर्चा करने की नहीं बल्कि ठोस कार्रवाई की है। गुजरात और विशेष रूप से सूरत को सुरक्षित बनाए रखना सरकार, पुलिस प्रशासन और समाज तीनों की साझा जिम्मेदारी है। यदि समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए तो अपराध का यह बढ़ता ग्राफ आने वाले वर्षों में और बड़ी चुनौती बन सकता है। (वरिष्ठ पत्रकार साहित्यकार स्तम्भकार) (यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है) .../ 14 मई /2026