राष्ट्रीय
14-May-2026


हिंदुत्व और आस्था पर सुप्रीम कोर्ट में हुई बहस नई दिल्ली,(ईएमएस)। सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश और धार्मिक स्वतंत्रता के व्यापक मुद्दों पर सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की संविधान पीठ के समक्ष बुधवार को गहन कानूनी और वैचारिक बहस हुई। प्रधान न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली इस पीठ ने सुनवाई के दौरान हिंदू धर्म की प्रकृति, व्यक्तिगत अधिकार और धार्मिक संप्रदायों की स्वायत्तता पर महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं। सुनवाई के दौरान एक याचिकाकर्ता के वकील की दलीलों पर प्रतिक्रिया देते हुए सीजेआई सूर्यकांत ने आस्था की समावेशी परिभाषा पेश की। उन्होंने कहा, मंदिर जाने वाला व्यक्ति भी उतना ही हिंदू है, जितना अपनी छोटी सी कुटिया में पूरी शांति और मौन तरीके से दीपक जलाने वाला व्यक्ति। सीजेआई ने स्पष्ट किया कि हिंदू धर्म अत्यंत लचीला है और इसमें पूजा के विविध रूपों को समान स्वीकार्यता प्राप्त है। इसके साथ ही उन्होंने अदालत की भूमिका की सीमाएं तय करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट कोई सुपर-स्पिरिचुअल लीडर नहीं है जो धार्मिक प्रथाओं की व्याख्या करे। उन्होंने जोर देकर कहा कि धार्मिक सुधार का मुख्य दायित्व विधायिका का है, न्यायपालिका का नहीं। संविधान पीठ में शामिल जस्टिस बीवी नागरत्ना ने भी इस दौरान अहम टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि अदालत बहुत पहले ही यह स्पष्ट कर चुकी है कि हिंदुत्व जीने का एक तरीका (वे ऑफ लाइफ) है, इसलिए इस पर दोबारा विचार करने की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने तर्क दिया कि कोई व्यक्ति मंदिर जाए या न जाए, इससे उसकी धार्मिक पहचान पर प्रभाव नहीं पड़ता। बहस के केंद्र में संविधान के अनुच्छेद 25 (व्यक्तिगत धार्मिक स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 26 (धार्मिक संप्रदायों के अधिकार) के बीच का संतुलन रहा। वरिष्ठ अधिवक्ता जी. मोहन गोपाल ने तर्क दिया कि धार्मिक संस्थानों के भीतर सुधारवादी आवाजों को जगह मिलनी चाहिए ताकि पुरानी प्रथाओं में बदलाव संभव हो सके। हालांकि, इस पर वरिष्ठ अधिवक्ता सीएस वैद्यनाथन और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कानूनी बारीकियों की ओर ध्यान आकर्षित किया। सॉलिसिटर जनरल ने धर्म परिवर्तन से जुड़ी पुरानी बहस और संविधान सभा के प्रस्तावों का जिक्र करते हुए कुछ दलीलों पर आपत्ति जताई। यह पीठ 10 से 50 वर्ष की आयुवर्ग की महिलाओं के प्रवेश के साथ-साथ मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश और पारसी महिलाओं के अधिकारों जैसे व्यापक संवैधानिक सवालों पर भी विचार कर रही है। अदालत इस मामले में अब यह तय करेगी कि धार्मिक विश्वासों में न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा क्या होनी चाहिए। वीरेंद्र/ईएमएस/14मई 2026