सियोल,(ईएमएस)। प्रशांत महासागर के रणनीतिक जलक्षेत्र में अमेरिका और चीन के बीच जारी वर्चस्व की जंग अब आसमान के उस छोर पर पहुंच गई है, जहां जीत का फैसला मिसाइलों की रफ्तार और अचूक मारक क्षमता से होगा। इसी महाशक्ति संघर्ष के बीच दक्षिण कोरिया ने अपनी रक्षा कंपनी हनवा एयरोस्पेस के माध्यम से एक ऐसा दांव चला है, जिसने वैश्विक रक्षा विशेषज्ञों को हैरान कर दिया है। दक्षिण कोरिया द्वारा विकसित की जा रही लॉन्ग रेंज एयर टू एयर मिसाइल केवल एक हथियार नहीं, बल्कि उस एशियाई चक्रव्यूह का जवाब है जिसने अब तक पश्चिमी तकनीक पर निर्भरता बनाए रखी थी। हनवा एयरोस्पेस की यह मिसाइल दक्षिण कोरिया के स्वदेशी लड़ाकू विमान केएफ-21 बोरामे को एक अजेय शक्ति प्रदान करेगी। इसे अक्सर कोरियन मीटियर कहा जा रहा है, क्योंकि इसका उद्देश्य यूरोपीय मीटियर मिसाइलों पर निर्भरता को खत्म करना है। इस मिसाइल की सबसे बड़ी खासियत इसका डक्टेड रैमजेट प्रोपल्शन सिस्टम है। पारंपरिक रॉकेटों के विपरीत, यह इंजन उड़ान के दौरान वायुमंडल से ऑक्सीजन खींचकर ईंधन जलाता है, जिससे ऑक्सीडाइजर ले जाने की जरूरत नहीं पड़ती और मिसाइल हल्की होने के बावजूद लंबी दूरी तय कर पाती है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस मिसाइल की मारक क्षमता 200 किलोमीटर से अधिक होने का अनुमान है, जो इसे दुनिया की सबसे घातक बियॉन्ड विजुअल रेंज मिसाइलों की श्रेणी में शामिल करती है। रैमजेट तकनीक की बदौलत यह मिसाइल मैक 4 (ध्वनि से चार गुना तेज) की रफ्तार से दुश्मन के विमानों को तबाह कर सकती है। इस विकास के रणनीतिक निहितार्थ बहुत गहरे हैं। पहला, दक्षिण कोरिया अब मिसाइल तकनीक में आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहा है। दूसरा, स्वदेशी हथियारों से लैस होने के बाद केएफ-21 लड़ाकू विमान के निर्यात की राह आसान हो जाएगी, क्योंकि इसके लिए अब किसी तीसरे देश की अनुमति की आवश्यकता नहीं होगी। साथ ही, हनवा एयरोस्पेस के उत्पादों की लागत पश्चिमी देशों के मुकाबले 20 से 30 प्रतिशत कम होने के कारण यह वैश्विक बाजार में एक मजबूत प्रतिस्पर्धी के रूप में उभरेगा। जब यह मिसाइल पूरी तरह तैनात होगी, तो इसकी गूंज न केवल सियोल में, बल्कि बीजिंग के सैन्य गलियारों और पेंटागन के रणनीतिक नक्शों पर भी साफ सुनाई देगी। वीरेंद्र/ईएमएस/14मई 2026