वाशिंगटन(ईएमएस)। आज के दौर में सोना सुरक्षित निवेश और संपन्नता का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है, लेकिन इतिहास के पन्नों में एक ऐसा अध्याय भी दर्ज है जब दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था, अमेरिका में सोना रखना एक गंभीर कानूनी अपराध बन गया था। यह घटना साल 1933 की है, जब अमेरिका ग्रेट डिप्रेशन यानी महामंदी की भीषण मार झेल रहा था। उस समय बैंकिंग व्यवस्था चरमरा गई थी और लोगों का वित्तीय संस्थानों से भरोसा पूरी तरह टूट चुका था। उस दौर में दुनिया गोल्ड स्टैंडर्ड प्रणाली पर आधारित थी, जिसका अर्थ था कि सरकार केवल उतना ही कैश छाप सकती थी जितना उसके पास सोने का भंडार सुरक्षित हो। आर्थिक अनिश्चितता के माहौल में घबराए हुए लोगों ने बैंकों से अपना पैसा निकालकर उसे सोने के सिक्कों और बिस्कुटों में बदलकर घरों में जमा करना शुरू कर दिया। इससे बाजार में सोने की भारी किल्लत हो गई और सरकार के पास नई मुद्रा छापने का जरिया खत्म होने लगा। इस संकट से निपटने के लिए तत्कालीन राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी. रूजवेल्ट ने एक ऐसा कठोर कदम उठाया, जिसकी आज कल्पना करना भी मुश्किल है। 5 अप्रैल 1933 को राष्ट्रपति रूजवेल्ट ने एग्जीक्यूटिव ऑर्डर 6102 जारी किया। इस आदेश के तहत हर अमेरिकी नागरिक के लिए अपना अधिकांश सोना सरकार के पास जमा करना अनिवार्य कर दिया गया। लोगों को केवल गहनों के रूप में सीमित सोना रखने की छूट दी गई। सरकार ने सोने की कीमत 20.67 डॉलर प्रति आउंस तय की और नागरिकों को इसी दर पर अपना सोना बैंकों में सौंपना पड़ा। जो लोग इस आदेश का उल्लंघन करते या सोना छिपाने की कोशिश करते, उनके लिए 10 हजार डॉलर का भारी जुर्माना और 10 साल तक की जेल की सजा का प्रावधान किया गया था। इस फैसले के बाद पूरे अमेरिका में हड़कंप मच गया और लोग मजबूरी में बैंकों के बाहर लंबी कतारों में खड़े नजर आए। सरकार की रणनीति तब और साफ हुई जब भारी मात्रा में सोना इकट्ठा होने के बाद रूजवेल्ट प्रशासन ने रातों-रात सोने की सरकारी कीमत बढ़ाकर 35 डॉलर प्रति आउंस कर दी। इस कदम से अमेरिकी सरकार की संपत्ति में अचानक भारी इजाफा हुआ और उसे अर्थव्यवस्था को फिर से खड़ा करने के लिए जरूरी फंड मिल गया। नागरिकों पर सोना रखने का यह कड़ा प्रतिबंध करीब 41 साल तक लागू रहा और अंततः 1974 में इसे हटाया गया। आज भी इतिहासकार और अर्थशास्त्री इस फैसले को लेकर बंटे हुए हैं; कुछ इसे अर्थव्यवस्था को बचाने वाला मास्टरस्ट्रोक मानते हैं, तो कुछ इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता और निजी संपत्ति पर सरकार का बड़ा हमला करार देते हैं। वीरेंद्र/ईएमएस 15 मई 2026