न्याय पालिका का काम न्याय करना... भारतीय न्यायपालिका को लंबे समय तक लोकतंत्र के सबसे विश्वसनीय स्तंभ के रूप में देखा जाता रहा है। दुनिया भर में भारत की न्याय व्यवस्था की चर्चा इसलिए होती थी क्योंकि यहां लिखित संविधान, स्थापित विधिक परंपराएं और न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लोकतंत्र की आत्मा माना गया। न्याय की देवी की आंखों पर बंधी काली पट्टी इस बात का प्रतीक थी कि अदालतें बिना भेदभाव, केवल संविधान और कानून के आधार पर न्याय करेंगी। यही कारण था कि उच्च न्यायालयों और सुप्रीम कोर्ट के अनेक ऐतिहासिक फैसलों ने भारतीय न्यायपालिका को वैश्विक सम्मान दिलाया। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में न्यायपालिका के कामकाज को लेकर सवाल लगातार उठ रहे हैं। आलोचना के केंद्र में यह धारणा बनी है, कि अदालतें अब पहले जैसी निर्भीक और जनविश्वास की प्रतीक नहीं रह गई हैं। आम लोगों के बीच यह भावना गहराने लगी है कि कई संवेदनशील मामलों में सुनवाई और फैसलों का समय सरकारों की राजनीतिक सुविधा के अनुसार तय होता दिखाई देता है। न्यायपालिका का दायित्व केवल कानून की व्याख्या करना नहीं, बल्कि नागरिकों के मौलिक और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करना भी है। यदि यही भरोसा कमजोर पड़ने लगे, तो लोकतंत्र की नींव भी प्रभावित होती है। एक समय था जब सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश पी.एन. भगवती ने जनहित याचिका की अवधारणा को विस्तार देते हुए आम नागरिकों के लिए न्यायालयों के द्वार खोल दिए थे। पोस्टकार्ड और साधारण पत्रों के माध्यम से भी लोगों को न्याय मिलने लगा था। 1975 में इंदिरा गांधी के चुनाव को अवैध घोषित करने वाला फैसला न्यायपालिका की स्वतंत्रता का प्रतीक माना गया। उस दौर में अदालतों ने कई बार सरकारों के खिलाफ कठोर फैसले दिए और नागरिक अधिकारों की रक्षा की। वर्तमान की बात करें तो आज की स्थिति कहीं अधिक जटिल दिखाई देती है। कई महत्वपूर्ण संवैधानिक मामलों में वर्षों तक सुनवाई लंबित रहती है। चुनाव, नागरिक अधिकार, जांच एजेंसियों की कार्रवाई, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धार्मिक आधार पर बनाए गए कानूनों जैसे विषयों पर समयबद्ध फैसले न आने से न्यायपालिका की भूमिका पर सवाल उठते हैं। यदि किसी मामले का निर्णय तब आए जब उसका प्रभाव समाप्त हो चुका हो, तो न्याय की सार्थकता भी कमजोर पड़ जाती है। इसलिए कहा गया है कि देरी से मिला न्याय भी न्याय नहीं रह जाता है। न्यायपालिका के भीतर पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर भी चिंताएं बढ़ी हैं। जजों पर भ्रष्टाचार के आरोप, महाभियोग की जटिल प्रक्रिया और इस्तीफों के बाद कार्रवाई का समाप्त हो जाना लोगों के मन में असमंजस पैदा करता है। न्यायपालिका की स्वतंत्रता आवश्यक है, लेकिन स्वतंत्रता और जवाबदेही के बीच संतुलन भी उतना ही जरूरी है। लोकतंत्र में कोई भी संस्था आलोचना से ऊपर नहीं हो सकती। हाल के वर्षों में अदालतों में सुनवाई के दौरान की गई कुछ टिप्पणियों ने भी बहस को जन्म दिया है। न्यायाधीशों की टिप्पणियां यदि सामाजिक या राजनीतिक रूप से पक्षधर प्रतीत हों, तो आम नागरिकों का विश्वास प्रभावित होता है। बेरोजगारी, पेपर लीक, लंबित नियुक्तियां और नागरिक अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर युवा वर्ग में पहले से ही असंतोष व्याप्त है। ऐसे समय में अदालतों से संवेदनशील और संतुलित दृष्टिकोण की अपेक्षा स्वाभाविक है। यह भी याद रखने की जरूरत है कि संविधान ने न्यायपालिका को सबसे कमजोर नागरिक की रक्षा का दायित्व सौंपा है। विधायिका और कार्यपालिका स्वाभाविक रूप से शक्तिशाली संस्थाएं होती हैं, जबकि आम नागरिक अक्सर उन्हीं से संघर्ष करते हुए अदालतों तक पहुंचता है। इसलिए न्यायपालिका का मूल उद्देश्य सत्ता की रक्षा नहीं, बल्कि संविधान और नागरिक अधिकारों की रक्षा होना चाहिए। आज आवश्यकता न्यायपालिका को कठघरे में खड़ा करने की नहीं, बल्कि आत्ममंथन की है। न्याय में देरी, पारदर्शिता की कमी और बढ़ती अविश्वसनीयता जैसी चुनौतियों पर गंभीरता से विचार करना होगा। भारतीय न्यायपालिका की सबसे बड़ी ताकत उसका नैतिक अधिकार और जनविश्वास रहा है। यदि वही कमजोर पड़ा, तो लोकतंत्र का संतुलन भी डगमगाने लगेगा। इसलिए समय की मांग है कि न्यायपालिका संविधान की मूल भावना के अनुरूप स्वयं को और अधिक जवाबदेह, संवेदनशील और पारदर्शी बनाए, ताकि आम नागरिक का विश्वास फिर उसी मजबूती से स्थापित हो सके, जिसके लिए भारतीय न्याय व्यवस्था की पहचान सारी दुनिया में थी। एसजे/ 16 मई /2026