श्रीरघुनाथजी द्वारा रावण वध उपरान्त उनके शुभ वचनों को सुनकर महादेवजी बोले- शत्रुओं को संताप देने वाले विशाल वक्ष:स्थल से सुशोभित, महाबाहु, कमलनयन! आप धर्मात्माओं में श्रेष्ठ है। आपने रावण का वध कर जो कार्य सम्पन्न कर दिया, यह बड़े सौभाग्य की बात है। दिष्ट्या सर्वस्य लोकस्य प्रवृद्धं दारुणं तम:। अपवृत्तं त्वया संख्ये राम रावणजं भयम्।। वाल्मीकिरामायण युद्धकाण्ड सर्ग ११९-३ श्रीराम! रावणजनित भय और दु:ख सम्पूर्ण लोकों के लिए बढ़े हुए घोर अन्धकार के समान था, जिसे आपने युद्ध में मिटा दिया। महाबली वीर! अब दु:खी भरत को धीरज बँधाकर, यशस्विनी कौसल्या, कैकेयी तथा लक्ष्मण जननी सुमित्रा से मिलकर अयोध्या का राज्य पाकर सुहृदों को आनन्द देकर, इक्ष्वाकुकुल में अपना वंश स्थापित करके अध्वमेध-यज्ञ का अनुष्ठान कर, सर्वोत्तम यश का उपार्जन करके तथा ब्राह्मणों को धन देकर आपको अपने परमधाम में जाना चाहिए। ककुत्स्थ कुल नन्दन! देखिय ये आपके पिता राजा दशरथ विमान पर बैठे हुए हैं। मनुष्य लोक में ये ही आपके यशस्वी गुरु थे। ये श्रीमान् राजा इन्द्रलोक को प्राप्त हुए हैं। आप जैसे सुपुत्र ने इन्हें तार दिया। आप भाई लक्ष्मण के साथ इन्हें नमस्कार करें।महादेवजी की यह बात सुनकर लक्ष्मण सहित श्री रघुनाथजी ने विमान में उच्च स्थान पर बैठे हुए अपने पिताजी को प्रणाम किया। भाई लक्ष्मण सहित भगवान् श्रीराम ने पिताजी को अच्छी तरह देखा। वे निर्मल वस्त्र धारण करके अपनी दिव्य शोभा से देदीप्यवान् थे। हर्षेण महताऽऽविष्टो विमानस्थो महीपति:। प्राणै: प्रियतरं दृष्ट्वा पुत्रं दशरथस्तदा।। वाल्मीकि रामायण युद्धकाण्ड सर्ग ११९-११ विमान पर बैठे हुए महाराज दशरथ अपने प्राणों से भी प्यारे पुत्र श्रीराम को देखकर बहुत प्रसन्न हुए। श्रेष्ठ आसन पर विराजित हुए उन महाबाहु नरेश ने उन्हें गोद में बैठाकर दोनों बाहों में भर लिया और इस प्रकार कहा- राम! मैं तुमसे सच कहता हूँ, तुमसे विलग होकर मुझे स्वर्ग का सुख तथा देवताओं द्वारा प्राप्त हुआ सम्मान भी अच्छा नहीं लगता। आज तुम शत्रुओं का वध करके पूर्ण मनोरथ हो गए और तुमने वनवास की अवधि भी पूरी कर ली, यह सब देखकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है। वक्ताओं में श्रेष्ठ रघुनन्दन! तुम्हें वन में भेजने के लिए कैकेयी ने जो-जो बात कही थी, वे सब आज भी मेरे हृदय में बैठी हुई है। आज लक्ष्मण सहित तुमको सकुशल देखकर ओर हृदय से लगाकर में समस्त दु:खों से छुटकारा पा गया हूँ। ठीक उसी तरह जैसे चन्द्रमा कुहरे से निकल आए हो। बेटा! जैसे अष्टावक्र ने अपने धर्मात्मा पिता कहोल नामक ब्राह्मण को तार दिया था, वैसे ही तुम जैसे महात्मा पुत्र ने मेरा उद्धार कर दिया। इदानीं च विजानामि यथा सौम्य सुरेश्वरै:। वधार्थं रावणस्येह विहितं पुरुषोत्तमम्।। वाल्मीकिरामायण युद्धकाण्ड सर्ग ११९-१८ सौम्य! आज इन देवताओं के द्वारा मुझे ज्ञात हुआ कि रावण का वध करने के लिए स्वयं पुरुषोत्तम भगवान ही तुम्हारे रूप में अवतीर्ण हुए हैं। श्रीराम, कौसल्या का जीवन सार्थक है जो वन से लौटने पर तुम जैसे शत्रु सूदन वीर पुत्र को अपने घर में हर्ष और उल्लास के साथ देखेगा। रघुनन्दन! वे प्रजाजन भी कृतार्थ हैं जो अयोध्या पहुँचने पर तुम्हें राज्य सिंहासन पर भूमिपाल के रूप में अभिषिक्त होते देखेंगे। भरत बड़ा ही धर्मात्मा पवित्र और बलवान है, वह तुममें सच्चा अनुराग रखता है। मैं उसके साथ तुम्हारा शीघ्र ही मिलन देखना चाहता हूँ। सौम्य! तुमने मेरी प्रसन्नता के लिए लक्ष्मण और सीता के साथ रहते हुए वन में चौदह वर्ष व्यतीत किए। अब तुम्हारे वनवास की अवधि पूर्ण हो गई है। मेरी प्रतिज्ञा भी तुमने पूर्ण कर दी तथा संग्राम में रावण को वध कर देवताओं को भी सन्तुष्ट कर दिया। अब तुम भाइयों के साथ राज्य पर प्रतिष्ठित होकर दीर्घ आयु प्राप्त करो। जब राजा इस प्रकार कह चुके तब श्रीरामचन्द्रजी हाथ जोड़कर उनसे बोले- धर्मज्ञ महाराज! आप कैकेयी और भरत पर प्रसन्न हो, उन दोनों पर कृपा करें। सुपुत्रां त्वां त्यजामीति यदुक्ता कैकयी त्वया। स शाप: कैकयीं घोर: सुपुत्रन स्पृशेत् प्रभो।। वाल्मीकिरामायण युद्धकाण्ड सर्ग ११९-२६ प्रभो! आपने जो कैकयी से कहा था कि मैं पुत्र सहित तेरा त्याग करता हूँ आपका वह घोर शाप पुत्र सहित कैकेयी स्पर्श न करें। तब श्रीराम से बहुत अच्छा रहकर महाराज दशरथजी ने उनकी यह प्रार्थना स्वीकार कर ली और हाथ जोड़े खड़े हुए लक्ष्मण को हृदय से लगाकर फिर यह बात कही- वत्स! तुमने विदेहनन्दिनी सीता के साथ श्रीराम की भक्तिपूर्वक सेवा करके मुझे बहुत प्रसन्न किया है। तुम्हें धर्म का फल प्राप्त हुआ है। धर्मज्ञ! भविष्य में भी तुम्हें धर्म का फल प्राप्त होगा और भूमण्डल में महान् यश की उपलब्धि होगी। श्रीराम की प्रसन्नता से तुम्हें उत्तम स्वर्ग और महत्व प्राप्त होगा। सुमित्रा का आनन्द में वृद्धि करने वाले लक्ष्मण! तुम्हारा कल्याण हो। तुम श्रीराम की निरन्तर सेवा करते रहो। ये श्रीराम सदा सम्पूर्ण लोकों के हित में तत्पर रहते हैं। देखो, इन्द्र सहित ये तीनों लोक सिद्ध और महर्षि भी परमात्मा स्वरूप पुरुषोत्तम श्रीराम को प्रणाम करके इनका पूजन-अर्चन कर रहे हैं। विदेहनन्दिनी सीता के साथ शान्तभाव से इनकी सेवा करते हुए तुमने सम्पूर्ण धर्माचरण का फल और महान यश प्राप्त किया है। लक्ष्मण से ऐसा कहकर राजा दशरथ ने हाथ जोड़कर खड़ी हुई पुत्रवधू सीता को बेटीÓ कहकर पुकारा और धीरे-धीरे मधुर वाणी में कहा- कर्तव्यो न तु वैदेहि मन्युस्त्यागमिमं प्रति। रामेणेदं विशुद्ध्यर्थं कृतं वै त्वद्धितैषिणा।। सुदुष्करमिदं पुत्रि तव चारित्रलक्षणम्। कृतं यत् तेऽन्यनारीणां यशो ह्यभिभविष्यति।। वाल्मीकिरामायण युद्धकाण्ड सर्ग ११९-३५-३६ विदेहनन्दिनी! तुम्हें इस त्याग को लेकर श्रीराम पर कुपित नहीं होना चाहिए, क्योंकि ये तुम्हारे हितैषी हैं और संसार में तुम्हारी पवित्रता प्रकट करने के लिए ही इन्होंने ऐसा व्यवहार किया है। बेटीÓ! तुमने अपने विशुद्ध चरित्र को परिलक्षित कराने के लिए जो अग्रिप्रवेश का कार्य किया है यह दूसरी स्त्रियों के लिए अत्यन्त दुष्कर है। तुम्हारा यह कर्म अन्य नारियों के यश को ढंक लेगा। पति सेवा के सम्बन्ध में भले ही तुम्हें कोई उपदेश देने की आवश्यकता न हो, किन्तु इतना तो मुझे अवश्य बता देना चाहिए कि ये श्रीराम ही तुम्हारे सबसे बड़े देवता हैं। इस प्रकार दोनों पुत्रों और सीता को आदेश एवं उपदेश देकर रघुवंशी राजा दशरथजी विमान पर बैठकर सीता सहित दोनों पुत्रों से विदा लेकर देवराज इन्द्र के लोक में चले गए। ईएमएस/17/05/2026