स्टैनफोर्ड (ईएमएस)। वैज्ञानिकों ने दुनिया के लिए एक ऐसी तकनीक विकसित की है, जो भविष्य में पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बड़ा बदलाव ला सकती है। ग्लोबल वार्मिंग और बढ़ते प्रदूषण से जूझ रही दुनिया के लिए नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी और स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने मिलकर एक ऐसा सिस्टम तैयार किया है, जो वातावरण और फैक्ट्रियों से निकलने वाली कार्बन डाइऑक्साइड को उपयोगी कच्चे माल में बदल सकता है। इस कच्चे माल का इस्तेमाल प्लास्टिक, दवाइयों और रोजमर्रा की कई जरूरी चीजें बनाने में किया जा सकेगा। अब तक कार्बन डाइऑक्साइड को केवल प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग की बड़ी वजह माना जाता था, लेकिन इस नई खोज ने इसे उपयोगी संसाधन में बदलने की संभावना पैदा कर दी है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह तकनीक कार्बन को ‘कार्बन लेगोस’ की तरह इस्तेमाल करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, यानी कार्बन के छोटे-छोटे हिस्सों से जरूरत के अनुसार नए रसायन और उत्पाद तैयार किए जा सकेंगे। शोधकर्ताओं ने इस नई तकनीक का नाम ‘रिडक्टिव फॉर्मेट पाथवे’ रखा है, जिसे संक्षेप में ‘रीफॉर्म’ कहा जा रहा है। यह सिस्टम जीवित कोशिकाओं के बाहर काम करता है और कार्बन डाइऑक्साइड को ‘एसिटाइल-कोए’ नामक महत्वपूर्ण अणु में बदल देता है। यह वही अणु है, जिसका उपयोग मानव शरीर भोजन को ऊर्जा में बदलने के लिए करता है। वैज्ञानिकों ने प्रकृति की इसी प्रक्रिया की नकल करते हुए लैब में एंजाइम्स और बिजली की मदद से यह सिस्टम विकसित किया है। सबसे पहले कार्बन डाइऑक्साइड को ‘फॉर्मेट’ नामक साधारण कार्बन कंपाउंड में बदला जाता है। इसके बाद विशेष रूप से डिजाइन किए गए एंजाइम्स कार्बन के इन छोटे हिस्सों को जोड़कर बड़े और उपयोगी मॉलिक्यूल तैयार करते हैं। इस रिसर्च में वैज्ञानिकों ने 66 अलग-अलग एंजाइम्स का परीक्षण किया और उनमें से सबसे प्रभावी एंजाइम्स को चुना। इन एंजाइम्स को इस तरह तैयार किया गया कि वे कार्बन को तेजी से जोड़कर उपयोगी रसायनों में बदल सकें। पूरी प्रक्रिया किसी फैक्ट्री की असेंबली लाइन की तरह काम करती है, जहां हर चरण में नया रासायनिक ढांचा तैयार होता जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह तकनीक पारंपरिक जैविक प्रणालियों से ज्यादा प्रभावी है। पेड़-पौधे और बैक्टीरिया भी कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करते हैं, लेकिन उन्हें जीवित रहने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है। इसके विपरीत ‘रीफॉर्म’ सिस्टम पूरी तरह सेल-फ्री है, इसलिए इसकी सारी ऊर्जा केवल उपयोगी उत्पाद बनाने में खर्च होती है। स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर माइकल जेवेट के अनुसार, यह पहली बार है जब किसी सिंथेटिक मेटाबॉलिक पाथवे ने इतनी कुशलता से काम किया है। यह सिस्टम फॉर्मेट के अलावा फॉर्मलडिहाइड और मेथनॉल जैसे रसायनों का भी उपयोग कर सकता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि इस तकनीक को सौर और पवन ऊर्जा जैसी स्वच्छ ऊर्जा के साथ जोड़ा जाए, तो यह पूरी तरह पर्यावरण अनुकूल बन सकती है। इससे उन रसायनों का उत्पादन भी संभव होगा, जिनके लिए आज दुनिया पेट्रोलियम और जीवाश्म ईंधन पर निर्भर है। हालांकि यह तकनीक अभी शुरुआती चरण में है और बड़े स्तर पर इस्तेमाल के लिए वैज्ञानिकों को एंजाइम्स की क्षमता और टिकाऊपन पर और काम करना होगा। सुदामा/ईएमएस 17 मई 2026