लेख
21-May-2026
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा लोगों से एक वर्ष तक सोना न खरीदने की अपील ने देश में नई बहस छेड़ दी। आम लोगों के मन में स्वाभाविक प्रश्न उठा कि जब सरकार स्वयं लगातार सोना खरीद रही है, तब जनता से सोना न खरीदने की अपील क्यों की जा रही है। विपक्ष ने भी इसे मुद्दा बनाया और कहा कि सरकार जनता को त्याग का संदेश दे रही है, जबकि भारतीय रिजर्व बैंक अपने भंडार में लगातार सोना जोड़ रहा है। पहली नजर में यह विरोधाभास लगता है, लेकिन यदि आर्थिक दृष्टि से देखा जाए तो इसके पीछे गहरी रणनीति और गंभीर आर्थिक परिस्थितियां जुड़ी हुई हैं। भारत में सोने का संबंध केवल निवेश से नहीं बल्कि सामाजिक परंपराओं, विवाह संस्कारों और सांस्कृतिक विश्वासों से भी जुड़ा हुआ है। सदियों से भारतीय परिवार सोने को सुरक्षा, प्रतिष्ठा और भविष्य की गारंटी मानते आए हैं। संकट के समय घर का सोना ही सबसे बड़ा सहारा बनता है। यही कारण है कि जब भी आर्थिक अनिश्चितता बढ़ती है, लोग सोने की ओर आकर्षित होते हैं। वर्तमान समय में भी यही हो रहा है। अंतरराष्ट्रीय तनाव, डॉलर की अस्थिरता और वैश्विक आर्थिक संकटों के बीच सोने की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। ऐसे समय में सरकार और जनता दोनों ही सोने को सुरक्षित संपत्ति के रूप में देख रहे हैं, लेकिन दोनों के उद्देश्य अलग-अलग हैं। भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा सोना खरीदने का उद्देश्य देश की आर्थिक सुरक्षा को मजबूत करना है। किसी भी देश का केंद्रीय बैंक अपने विदेशी मुद्रा भंडार को सुरक्षित और संतुलित रखने के लिए डॉलर, यूरो, विदेशी बॉन्ड और सोने जैसी संपत्तियों में निवेश करता है। भारत के पास इस समय लगभग 880 टन से अधिक गोल्ड रिजर्व है, जो अब तक का सबसे बड़ा भंडार माना जा रहा है। पिछले कुछ वर्षों में RBI ने लगातार सोना खरीदा है और विदेशी तिजोरियों में रखा सोना वापस भारत लाने की प्रक्रिया भी तेज की है। यह केवल भारत नहीं कर रहा, बल्कि चीन, रूस, तुर्किये, पोलैंड और ब्राजील जैसे कई देश भी तेजी से सोना खरीद रहे हैं। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण अमेरिकी डॉलर पर घटता भरोसा है। दुनिया की अर्थव्यवस्था लंबे समय से डॉलर आधारित रही है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार, तेल खरीद और विदेशी निवेश अधिकतर डॉलर में ही होता है। लेकिन रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिका ने रूस के विदेशी मुद्रा भंडार पर प्रतिबंध लगा दिया। इससे दुनिया के कई देशों को यह डर सताने लगा कि यदि भविष्य में किसी देश के साथ राजनीतिक मतभेद होते हैं, तो अमेरिका डॉलर को आर्थिक हथियार की तरह इस्तेमाल कर सकता है। इस घटना ने वैश्विक स्तर पर डॉलर की विश्वसनीयता को झटका पहुंचाया। परिणामस्वरूप देशों ने अपने रिजर्व में सोने की हिस्सेदारी बढ़ानी शुरू कर दी। भारत भी इसी रणनीति पर काम कर रहा है। सोना ऐसी संपत्ति है जिस पर किसी दूसरे देश का नियंत्रण नहीं होता। डॉलर की कीमत गिर सकती है, विदेशी बॉन्ड पर प्रतिबंध लग सकता है, लेकिन सोना हर परिस्थिति में मूल्यवान रहता है। यही कारण है कि आरबीआई सोना खरीदकर भारत की आर्थिक सुरक्षा को मजबूत करना चाहता है। यदि भविष्य में वैश्विक संकट पैदा हो जाए, व्यापार युद्ध बढ़ जाए या डॉलर में अस्थिरता आ जाए, तब यही सोना देश के लिए सुरक्षा कवच का काम करेगा। अब प्रश्न उठता है कि यदि सोना इतना महत्वपूर्ण है तो सरकार जनता को सोना खरीदने से क्यों रोक रही है। इसका उत्तर भारत की आयात व्यवस्था और विदेशी मुद्रा भंडार में छिपा हुआ है। भारत अपनी जरूरत का लगभग पूरा सोना विदेशों से आयात करता है। इसका मतलब यह है कि जितना अधिक सोना भारत खरीदेगा, उतने अधिक डॉलर विदेशों को देने पड़ेंगे। भारत पहले ही कच्चे तेल, इलेक्ट्रॉनिक सामान और मशीनरी के आयात पर भारी खर्च करता है। ऐसे में सोने का बढ़ता आयात विदेशी मुद्रा भंडार पर अतिरिक्त दबाव डालता है। पिछले कुछ वर्षों में सोने की कीमतों में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। कम मात्रा में सोना खरीदने पर भी अधिक डॉलर खर्च करने पड़ रहे हैं। यही कारण है कि भारत का गोल्ड इम्पोर्ट बिल तेजी से बढ़ गया है। सरकार को डर है कि यदि आम लोग बड़ी मात्रा में सोना खरीदते रहे, तो देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ेगा और रुपया कमजोर होगा। रुपया कमजोर होने का सीधा असर पेट्रोल, डीजल, गैस, दाल, खाद्य तेल और अन्य आयातित वस्तुओं की कीमतों पर पड़ता है। इससे महंगाई बढ़ती है और आम जनता की आर्थिक स्थिति प्रभावित होती है। प्रधानमंत्री की अपील का वास्तविक अर्थ यही है कि देश को फिलहाल अनावश्यक सोना खरीदने से बचना चाहिए ताकि विदेशी मुद्रा भंडार सुरक्षित रह सके। यह अपील किसी कानूनी प्रतिबंध की तरह नहीं बल्कि आर्थिक अनुशासन के संदेश के रूप में देखी जानी चाहिए। सरकार चाहती है कि लोग इस समय सोने में अत्यधिक निवेश करने के बजाय अन्य उत्पादक क्षेत्रों में निवेश करें। यदि लोग अपनी बचत उद्योग, बैंकिंग, शेयर बाजार, स्टार्टअप या सरकारी योजनाओं में लगाएंगे, तो अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी। लेकिन यदि बड़ी मात्रा में पैसा सोने की खरीद में चला जाएगा, तो वह अर्थव्यवस्था में सक्रिय पूंजी के रूप में उपयोग नहीं हो पाएगा। इस समस्या का दूसरा पक्ष भी महत्वपूर्ण है। भारतीय समाज में सोने के प्रति भावनात्मक लगाव इतना गहरा है कि केवल अपील से इसकी मांग कम होना आसान नहीं है। विवाह और त्योहारों में सोना खरीदना सामाजिक प्रतिष्ठा का हिस्सा बन चुका है। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी लोग बैंकिंग व्यवस्था की तुलना में सोने पर अधिक भरोसा करते हैं। इसलिए सरकार को केवल अपील करने के बजाय लोगों को बेहतर निवेश विकल्प भी देने होंगे। समस्या के समाधान के लिए सबसे पहले भारत को सोने पर अपनी आयात निर्भरता कम करनी होगी। देश में गोल्ड रीसाइक्लिंग को बढ़ावा देना आवश्यक है। भारतीय घरों और मंदिरों में हजारों टन सोना निष्क्रिय पड़ा हुआ है। यदि सरकार ऐसी योजनाएं बनाए जिनसे लोग अपना सोना बैंक में जमा करें और बदले में ब्याज प्राप्त करें, तो नए आयात की आवश्यकता कम हो सकती है। गोल्ड बॉन्ड और गोल्ड डिपॉजिट स्कीम जैसी योजनाओं को अधिक आकर्षक और सरल बनाना होगा। दूसरा समाधान यह है कि लोगों में वित्तीय जागरूकता बढ़ाई जाए। अधिकांश लोग सोने को ही सबसे सुरक्षित निवेश मानते हैं, जबकि लंबी अवधि में कई अन्य निवेश विकल्प बेहतर रिटर्न दे सकते हैं। यदि लोगों को शेयर बाजार, म्यूचुअल फंड, सरकारी बॉन्ड और पेंशन योजनाओं की सही जानकारी मिलेगी, तो सोने पर अत्यधिक निर्भरता कम होगी। तीसरा महत्वपूर्ण कदम यह है कि भारत को निर्यात बढ़ाना होगा। यदि देश का निर्यात मजबूत होगा तो डॉलर की आमद बढ़ेगी और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव कम होगा। इसके साथ ही घरेलू उद्योगों को मजबूत बनाकर आयात कम करना भी जरूरी है। आत्मनिर्भर भारत की अवधारणा का वास्तविक अर्थ यही है कि देश अपनी जरूरतों के लिए विदेशी बाजारों पर कम निर्भर हो। सरकार को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि रुपये की स्थिरता बनी रहे। यदि रुपया लगातार कमजोर होगा तो लोग स्वाभाविक रूप से सोने की ओर भागेंगे, क्योंकि उन्हें अपनी बचत की सुरक्षा चाहिए। मजबूत अर्थव्यवस्था, नियंत्रित महंगाई और स्थिर मुद्रा ही लोगों का विश्वास बनाए रख सकती है। वास्तव में प्रधानमंत्री की अपील और आरबीआई की सोना खरीद दो अलग-अलग स्तरों की रणनीतियां हैं। आरबीआई देश की आर्थिक सुरक्षा के लिए सोना खरीद रहा है, जबकि सरकार जनता से अनावश्यक आयात कम करने की अपील कर रही है। इसे विरोधाभास नहीं बल्कि दोहरी आर्थिक रणनीति के रूप में समझना चाहिए। एक तरफ देश अपने भविष्य को सुरक्षित करने के लिए रिजर्व मजबूत कर रहा है, दूसरी तरफ वर्तमान आर्थिक दबावों को नियंत्रित करने का प्रयास कर रहा है। आज भारत ऐसे दौर में खड़ा है जहां आर्थिक राष्ट्रवाद केवल नारों से नहीं बल्कि व्यवहारिक अनुशासन से तय होगा। यदि देश को मजबूत बनाना है तो सरकार और जनता दोनों को संतुलित आर्थिक निर्णय लेने होंगे। सोना सदियों से भारतीय समाज की पहचान रहा है, लेकिन आज आवश्यकता इस बात की है कि भावनाओं और अर्थव्यवस्था के बीच संतुलन बनाया जाए। तभी भारत मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार, स्थिर रुपया और आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था की दिशा में आगे बढ़ सकेगा। ईएमएस/21/05/2026