लेख
22-May-2026
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लखनऊ जिला अदालत परिसर के बाहर जो कुछ हुआ वह केवल अतिक्रमण हटाने की प्रशासनिक कार्रवाई नहीं थी बल्कि कानून व्यवस्था और लोकतांत्रिक मर्यादाओं की एक गंभीर परीक्षा थी। अदालतों में न्याय की लड़ाई लड़ने वाले अधिवक्ताओं पर जिस तरह लाठीचार्ज हुआ उसने पूरे न्यायिक तंत्र को झकझोर दिया है। पुलिस और प्रशासन की यह कार्रवाई केवल चैंबर तोड़ने तक सीमित नहीं रही बल्कि उसने उस संवैधानिक गरिमा को भी आहत किया जिस पर भारतीय लोकतंत्र टिका हुआ है। घटना की शुरुआत हाईकोर्ट के आदेश के पालन के नाम पर हुई। नगर निगम की टीम भारी पुलिस बल और बुलडोजर लेकर अदालत परिसर के बाहर पहुंची और कथित अवैध निर्माण हटाने लगी। जिन चैंबरों में वर्षों से वकील अपने पेशे का संचालन कर रहे थे उन्हें अचानक ढहाया जाने लगा। कई अधिवक्ताओं का आरोप है कि उन्हें पर्याप्त समय और स्पष्ट सूचना तक नहीं दी गई। जिन लोगों ने जीवन के कई दशक अदालत परिसर में बिताए उनके सामने अचानक रोजी रोटी और सम्मान दोनों पर संकट खड़ा हो गया। विरोध होना स्वाभाविक था। वकील बुलडोजर के सामने खड़े हो गए। कुछ सड़क पर बैठ गए। कुछ हाथ जोड़कर अपने चैंबर बचाने की गुहार लगाते रहे। लेकिन प्रशासन ने संवाद और समाधान का रास्ता चुनने के बजाय शक्ति प्रदर्शन का रास्ता अपनाया। देखते ही देखते बहस धक्का मुक्की में बदली और फिर पुलिस ने लाठीचार्ज शुरू कर दिया। जिस समाज में वकील संविधान और कानून के रक्षक माने जाते हैं उसी समाज में उन्हें सड़कों पर दौड़ा दौड़ाकर पीटना बेहद चिंताजनक दृश्य था। सबसे दुखद पहलू यह रहा कि पुलिस की कार्रवाई में संवेदनशीलता लगभग दिखाई नहीं दी। एक अधिवक्ता ने आत्महत्या की धमकी दी। दूसरे अधिवक्ता रोते हुए कह रहे थे कि उनका चैंबर अवैध नहीं है और यदि उसे तोड़ा गया तो वे जीवित नहीं रहेंगे। इन आवाजों में केवल विरोध नहीं था बल्कि वर्षों की मेहनत और असुरक्षा का दर्द भी था। प्रशासन यदि चाहता तो बातचीत कर स्थिति संभाल सकता था। लेकिन जब राज्य की मशीनरी संवाद के स्थान पर डंडे को प्राथमिकता देती है तब हालात हिंसक बन जाते हैं। इस घटना ने एक बड़ा सवाल खड़ा किया है कि क्या बुलडोजर अब प्रशासनिक कार्रवाई का स्थायी प्रतीक बन चुका है। कानून का शासन केवल कार्रवाई से नहीं बल्कि न्यायपूर्ण प्रक्रिया से चलता है। यदि किसी निर्माण को अवैध माना गया था तो उसके लिए स्पष्ट नोटिस पुनर्वास और सम्मानजनक विकल्प देने चाहिए थे। अदालत परिसर में दशकों से बैठे अधिवक्ताओं को अचानक अपराधियों की तरह खदेड़ना किसी सभ्य व्यवस्था का संकेत नहीं हो सकता। घटना के दौरान पथराव भी हुआ जो निंदनीय है। किसी भी परिस्थिति में हिंसा समाधान नहीं हो सकती। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि जब प्रशासन संयम खो देता है तो भीड़ भी उग्र हो जाती है। पुलिस का दायित्व केवल बल प्रयोग करना नहीं बल्कि स्थिति को नियंत्रित रखना भी होता है। यदि पुलिसकर्मी स्वयं पत्थर उठाते दिखाई दें तो यह कानून व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न है। जनता पुलिस से निष्पक्षता और संयम की अपेक्षा करती है न कि प्रतिशोध की। वकीलों पर लाठीचार्ज का असर केवल बार एसोसिएशन तक सीमित नहीं रहेगा। इसका प्रभाव आम जनता के न्यायिक विश्वास पर भी पड़ेगा। वकील अदालत और समाज के बीच की महत्वपूर्ण कड़ी हैं। यदि वही अपने को असुरक्षित महसूस करेंगे तो न्याय व्यवस्था का वातावरण भी प्रभावित होगा। अदालत परिसर हमेशा गरिमा और संवाद का स्थान माना जाता रहा है। वहां हिंसा और टकराव लोकतांत्रिक संस्थाओं की छवि को कमजोर करते हैं। यह भी विचारणीय है कि प्रशासनिक कार्रवाई में समानता दिखाई दी या नहीं। कई अधिवक्ताओं ने आरोप लगाया कि कुछ अन्य निर्माणों को छोड़ दिया गया जबकि केवल चुनिंदा चैंबरों पर कार्रवाई हुई। यदि ऐसा है तो यह और गंभीर विषय है क्योंकि कानून की नजर में सब समान होने चाहिए। चयनात्मक कार्रवाई हमेशा अविश्वास और आक्रोश को जन्म देती है। सरकार और प्रशासन को समझना होगा कि कानून का पालन केवल शक्ति से नहीं कराया जा सकता। संवेदनशील मामलों में संवाद धैर्य और मानवीय दृष्टिकोण अधिक प्रभावी होते हैं। अधिवक्ताओं के साथ बैठकर समाधान निकाला जा सकता था। पुनर्वास की स्पष्ट योजना बनाई जा सकती थी। लेकिन जिस तरह बुलडोजर और पुलिस बल के सहारे कार्रवाई की गई उसने पूरे मामले को संघर्ष में बदल दिया। लोकतंत्र में असहमति अपराध नहीं होती। विरोध को सुनना और उसका सम्मान करना शासन की जिम्मेदारी है। यदि हर विरोध का उत्तर लाठी से दिया जाएगा तो समाज में भय और अविश्वास ही बढ़ेगा। पुलिस की भूमिका जनता की सुरक्षा करना है न कि उन्हें अपमानित करना। अदालत परिसर में हुई यह घटना प्रशासनिक असंवेदनशीलता का उदाहरण बन गई है। आज जरूरत इस बात की है कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो। यह तय होना चाहिए कि लाठीचार्ज की नौबत क्यों आई। किसके आदेश पर बल प्रयोग हुआ। क्या वैकल्पिक उपाय संभव थे। साथ ही घायल अधिवक्ताओं और पुलिसकर्मियों दोनों के प्रति संवेदना दिखाते हुए समाधान खोजा जाना चाहिए। लोकतंत्र की ताकत संवाद में होती है दमन में नहीं। लखनऊ की यह घटना केवल एक शहर का विवाद नहीं बल्कि पूरे देश के लिए चेतावनी है। यदि न्याय की लड़ाई लड़ने वाले लोग ही सड़कों पर असुरक्षित महसूस करने लगें तो यह लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं। कानून की रक्षा करने वालों के साथ कानूनसम्मत व्यवहार होना ही चाहिए। तभी जनता का विश्वास व्यवस्था में बना रहेगा। ईएमएस/22/05/2026