लेख
22-May-2026
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भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में 1975 केवल एक वर्ष नहीं, बल्कि सत्ता, आर्थिक संकट और जनाक्रोश के टकराव का प्रतीक भी है। 2026 में देश की परिस्थितियों को देखकर बार-बार 1975 की मंहगाई का वही प्रश्न उठता है, क्या भारत फिर किसी बड़े राजनीतिक और सामाजिक विस्फोट की ओर बढ़ रहा है? जिसमें सत्ता का परिवर्तन भी हुआ था। 1971 के युद्ध में भारत ने पाकिस्तान को पराजित कर स्वतंत्र राष्ट्र के तौर पर बांग्लादेश का निर्माण कराया था। करीब एक करोड़ शरणार्थियों का बोझ भारत ने उठाया। पाकिस्तानी सेना के 95000 से अधिक जवान आत्मसमर्पण कर भारत में रहे। युद्ध के बाद अमेरिका और पश्चिमी देशों के प्रतिबंध ने तेल संकट और आर्थिक प्रतिबंधों ने भारतीय अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी थी। पेट्रोल, डीजल और खाद्यान्न की कमी ने महंगाई को विस्फोटक बना दिया। इंदिरा गांधी 1971 का युद्ध जीतकर “दुर्गा” कहलायीं, लेकिन 1974 आते-आते जनता की नजर में वही इंदिरा गांधी की सरकार महंगाई और बेरोजगारी की प्रतीक बन गई। इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा इंदिरा गांधी का चुनाव अवैध घोषित किया गया, इसने आंदोलन की आग में घी डालने और आंदोलन को उग्र किया। छात्र, कर्मचारी, ट्रेड यूनियन और विपक्ष एक मंच पर आ गए। जयप्रकाश नारायण ने व्यवस्था परिवर्तन का नारा दिया। रेलवे हड़ताल से लेकर विश्वविद्यालयों के छात्र आंदोलनों तक से देश उबाल पर था। जेपी ने पुलिस और सेना को सरकार के आदेश नहीं मानने का आव्हान किया। जब सरकार को लगा कि आंदोलन नियंत्रित करना संभव नहीं है, सत्ता हाथ से निकल सकती है, तब 25 जून 1975 को सरकार ने आपातकाल लागू कर दिया। लोकतंत्र को कुचलने की वह कीमत अंततः कांग्रेस को 1977 के चुनाव में चुकानी पड़ी। उत्तर भारत में कांग्रेस की करारी पराजय हुई। आज का भारत भले तकनीकी रूप से आधुनिक हो। आर्थिक और सामाजिक बेचैनी 1975 जैसी खतरनाक स्तर तक बढ़ती हुई दिख रही है। रुपया लगातार गिर रहा है। 97 के स्तर पर पंहुच गया है। महंगाई आम आदमी की कमर तोड़ रही है, आयात बढ़ गया है। विदेशी मुद्रा का संकट है। युवाओं में बेरोजगारी को लेकर गुस्सा बढ़ रहा है। करोड़ों डिग्रीधारी युवा प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक, भर्ती घोटालों और अस्थायी रोजगार से त्रस्त हैं। जिन युवाओं को अच्छे दिन, करोड़ों युवाओं को हर साल नौकरी देने और “विश्वगुरु भारत” का सपना दिखाया गया था। वही युवा वर्ग आज नौकरी और भविष्य की सुरक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं। सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है, जनता का भरोसा वर्तमान सरकार से तेजी से कमजोर पड़ता दिख रहा है। किसान आंदोलनों, अग्निवीर योजना के विरोध, पेपर लीक, आरक्षण विवाद और मतदाता सूची से नाम काटे जाने भ्रष्टाचार जैसे आरोपों ने लोकतांत्रिक संस्थाओं पर सवाल खड़े हो रहे हैं। न्यायपालिका को लेकर असंतोष और अविश्वास बढ़ा है। हाल में बेरोजगार युवाओं को लेकर मुख्य न्यायाधीश की कथित टिप्पणी ने युवाओं के आक्रोश को और हवा दी है। जब जनता को यह महसूस होने लगे, सत्ता, प्रशासन और न्याय तीनों उसकी पीड़ा को नहीं सुन रहे हैं, तब व्यवस्था के प्रति अविश्वास खतरनाक मोड़ पर पंहुच जाता है। मंहगाई, बेरोजगारी और कर्ज के कारण आम आदमी का जीवन मुश्किल हो गया है। श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल में युवाओं का उग्र असंतोष सत्ता परिवर्तन का कारण बना है। भारत में भी सोशल मीडिया के दौर में नाराजगी अधिक तेज़ी से फैल रही है। फर्क सिर्फ इतना है कि भारत का आकार और सोच कहीं अधिक बड़ी है। यदि आर्थिक संकट, बेरोजगारी, कर्ज और राजनीतिक, धार्मिक ध्रुवीकरण इसी तरह बढ़ते रहे, तो सामाजिक परिवर्तन की दशा में 1975 से ज्यादा गंभीर परिणाम देखने को मिल सकते हैं। इतिहास का सबसे बड़ा सबक यही है कि लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने से नहीं चलता। जब जनता की थाली महंगी हो, जेब खाली हो और भविष्य अंधकारमय लगे, तब सबसे शक्तिशाली सरकार का अस्तित्व समाप्त हो जाता है। 1975 में सत्ता ने असहमति को दबाने का रास्ता चुना था। 2026 के भारत में सत्ता के सामने यही चुनौती है। वर्तमान सरकार लोकतंत्र में पूंजीवादी व्यवस्था के स्थान पर समाजवादी व्यवस्था जिसमें समाज के सभी कमजोर वर्ग को राहत मिले। यह रास्ता चुनेगी या एक बार फिर इतिहास खुद को दोहराने की कोशिश करेगा। ईएमएस / 22 मई 26