लेख
22-May-2026
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‘‘ एक सवाल? जिसने भारत की वैश्विक छवि को फिर बहस में ला दिया।’’ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ऐतिहासिक नार्वे यात्रा सफलतापूर्वक संपन्न हुई। 43 वर्षों बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री की यह पहली आधिकारिक नार्वे यात्रा थी। यह दौरा क्लीन एनर्जी, समुद्री सुरक्षा, डिजिटल टेक्नोलॉजी और स्पेस सहयोग जैसे क्षेत्रों में भारत-नार्वे संबंधों को नई दिशा देने वाला सिद्ध हुआ। प्रधानमंत्री मोदी को नार्वे के सर्वोच्च नागरिक सम्मान “ग्रैंड क्रॉस ऑफ द रॉयल नॉर्वेजियन ऑर्डर ऑफ मेरिट” से भी सम्मानित किया गया। यह उन्हें प्राप्त होने वाला 32वाँ अंतरराष्ट्रीय सम्मान है। किन्तु राजनीति और कूटनीति में अक्सर कहा जाता है, “एक छोटी चूक, बड़ी उपलब्धियों पर भी परछाईं डाल देती है।” दुर्भाग्यवश, इस यात्रा के दौरान ऐसा ही एक प्रसंग विश्व व्यापी चर्चा का विषय बन गया। ‘‘संयुक्त पत्रकार वार्ता, विदेशी दौरे के समापन की सामान्य क्रिया है।’’ राजधानी ओस्लो में आयोजित संयुक्त पत्रकार वार्ता के समापन पर नार्वे की पत्रकार ने प्रधानमंत्री मोदी से जाते-जाते प्रश्न पूछा “प्रधानमंत्री मोदी, दुनिया की सबसे स्वतंत्र प्रेस से कुछ प्रश्न क्यों नहीं लेते?” प्रधानमंत्री बिना उत्तर दिये आगे बढ़ गये। इसके बाद भारतीय दूतावास की प्रेस ब्रीफिंग में उसी पत्रकार ने दूसरा तीखा प्रश्न किया। “जब हम साझेदारी मजबूत कर रहे हैं, तो हम आप पर भरोसा क्यों करें? क्या आप यह सुनिश्चित करेंगे कि आपके देश में मानवाधिकार उल्लंघन करें?” एक जानकारी के अनुसार भारत का इस मामले में ह्यूमन फ्रीडम इंडेक्स और ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स में क्रमशः 110 व 130 वा स्थान है। भारतीय विदेश सेवा के वरिष्ठ अधिकारी सी.बी. जॉर्ज ने लगभग 13 मिनट तक इस पर विस्तृत उत्तर दिया। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या प्रधानमंत्री स्वयं इसका छोटा, संयमित और आत्मविश्वास पूर्ण उत्तर नहीं दे सकते थे? वे सहजता से कह सकते थे। “भारत एक जीवंत लोकतंत्र है, जहां प्रेस की स्वतंत्रता है। मानवाधिकारों की रक्षा के लिए संवैधानिक संस्थाएँ निरंतर कार्यरत हैं। आपका प्रश्न गलत तथ्यों पर आधारित है।” इतना भर कह देने से भारत का पक्ष कहीं अधिक प्रभावशाली ढंग से विश्व के सामने आता। ‘‘प्रेस फ्रीडम इंडेक्स क्या बला है?’’ चूंकि नॉर्वे (जहां प्रधानमंत्री अभी दौरे पर गए) इसका सिरमौर बना हुआ है इसलिए इसकी चर्चा अभी ज्यादा है। पेरिस स्थित अंतर्राष्ट्रीय गैर सरकारी संस्था रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स वर्ष 2002 से ‘‘विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक’’ को प्रकाशित कर रही है। विश्व के 180 देशों में नार्वे लगातार प्रथम स्थान पर बना हुआ है, जबकि भारत वर्ष 2026 की सूची में 157 वें स्थान पर है। आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि भारत से ऊपर पाकिस्तान (152 वे) और बांग्लादेश (153 वे) जैसे देश हैं। हालांकि भारत सरकार और अनेक विशेषज्ञ समय-समय पर इस सूचकांक की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठाते रहे हैं। सूचना एवं प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने 2020 में संसद में कहा था कि यह रैंकिंग सीमित सैंपल, गैर-पारदर्शी प्रक्रिया और पक्षपातपूर्ण दृष्टिकोण (Biased)पर आधारित है। इन तरीकों में कुछ दम भी दिखाई देता है। फिर भी, विश्व स्तर पर प्रेस की स्वतंत्रता मापने के लिए यह सूचकांक सबसे अधिक उद्धृत किया जाता है। ‘‘मीडिया का मूल धर्म-सवाल पूछना?’’ पत्रकारिता का मूल प्राथमिक दायित्व ‘‘सत्ता’’ से सवाल पूछना है। नार्वे की डीएक्सबी सेन दैनिक समाचार पत्र की अपरिचित महिला पत्रकार Helen Eggen द्वारा प्रधानमंत्री मोदी से पूछा गया प्रश्न इसी लोकतांत्रिक परंपरा का हिस्सा था। किंतु भारत के सोशल मीडिया के एक वर्ग और मेनस्ट्रीम मीडिया चैनलों ने जिस प्रकार उस महिला पत्रकार को ट्रोल किया, वह दुर्भाग्यपूर्ण होकर आत्मघाती भी है। दरअसल, यह घटना भारतीय मीडिया के लिए आत्ममंथन का अवसर थी। लेकिन कुछ कट्टर समर्थक मेनस्ट्रीम मीडिया की ओछी प्रतिक्रिया ने अनजाने में भारत के 157वें स्थान की पुष्टि कर दी, जिनका भारत खंडन करना चाहता है। ‘‘लोकतंत्र का चौथा स्तंभ! मीडिया।’’ विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र भारत है, जबकि अमेरिका सबसे पुराना लोकतांत्रिक राष्ट्र है। लोकतंत्र की मजबूती का सबसे बड़ा पैमाना प्रेस की स्वतंत्रता है। दोनों का चोली-दामन का साथ है। परंतु विडंबना देखिए! प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में अमेरिका भी 80वें स्थान पर है। यह कहना भी पूरी तरह उचित नहीं होगा कि प्रेस की स्वतंत्रता पर आक्रमण केवल वर्ष 2014 के बाद बढ़ा। आंकड़े बताते हैं कि समस्या पुरानी है। वर्ष 2002 में भारत 80 वें स्थान पर था (139 देशों में) नीचे से 59वां। वर्ष 2008 में 118 वें स्थान पर पहुँच गया (173 देशों में) नीचे से 55वां। वर्ष 2014 में 140 वें स्थान पर था (180 देशों में) नीचे से 40वां। और अब 157 वें स्थान पर पहुँच चुका है (180 देशों में) नीचे से 23वां। मतलब लगातार भारत निम्न से निम्नतर स्तर पर जा रहा है। स्पष्ट है कि सत्ता कोई भी रही हो, प्रेस और सरकार के संबंध कभी पूर्णतः सहज नहीं रहे। आपातकाल आज भी भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में प्रेस को लेकर “काले अध्याय” के रूप में याद किया जाता है। इतिहास गवाह है, जब भी लोकतंत्र को नियंत्रित करने का प्रयास होता है, सबसे पहला प्रहार ‘‘प्रेस की स्वतंत्रता’’ पर ही होता है। इसलिए भारतीय प्रेस व सरकार दोनों को इस पर गहनता से विचार करने की आवश्यकता है कि लोकतंत्र का सबसे मजबूत खंबा प्रेस मजबूत बना रहा है, ताकि लोकतंत्र लड़खड़ाए नहीं। “सोलो प्रेस कॉन्फ्रेंस” से परहेज क्यों? प्रधानमंत्री मोदी अब तक 6 महाद्वीपों के 80 देशों की 100 विदेश यात्राएँ कर चुके हैं। अधिकांश दौरों में संयुक्त बयान जारी हुए, लेकिन स्वतंत्र प्रेस वार्ताओं से सामान्यतः दूरी बनाकर बचते ही रहे। वर्ष 2023 में अमेरिकन राष्ट्रपति जो बाइडेन और वर्ष 2025 में डोनाल्ड ट्रंप के साथ संयुक्त प्रेस वार्ताओं में सीमित प्रश्न (2+2=4) लिये गये, लेकिन 2014 के बाद से प्रधानमंत्री मोदी ने कोई स्वतंत्र “सोलो प्रेस कॉन्फ्रेंस” नहीं की है। ’‘सेंचुरी’’ विदेश यात्रा में मोदी को ‘‘छक्का’’ मारने की आवश्यकता थी, जिसका अवसर उन्हें मिला था। दुर्भाग्यवश यह अवसर उन्होंने बाल खो दिया। आप कह सकते है नो बॉल आ वाईड बॉल फेंकी गई थी। ‘‘एक अवसर जो हाथ से निकल गया’’। राजनीति में कई बार “मौन भी संदेश बन जाता है।” नार्वे की इस घटना के बाद अंतरराष्ट्रीय मीडिया में यह संदेश गया कि भारत में पत्रकारों के कठिन प्रश्नों से बचा जाता है। विडंबना यह रही कि जिस प्रेस फ्रीडम इंडेक्स को भारत “अर्धसत्य”,“पक्षपातपूर्ण” व द्विवेश पूर्ण बताता है, उसी धारणा को यह प्रसंग और बल देता दिखाई दिया। प्रधानमंत्री मोदी अपनी बुद्धिमता पूर्ण उत्तर व वाकपटुता से न केवल आलोचनाओं का प्रभाव कम कर सकते थे, बल्कि भारत की लोकतांत्रिक परिपक्वता का भी प्रभावशाली प्रदर्शन कर सकते थे। इसलिए यह केवल एक ‘‘प्रोटोकॉल’’ संबंधित चूक नहीं थी, बल्कि राजनयिक कूटनीतिक त्रुटि भी थी। ‘‘उपसंहार।’’ लोकतंत्र की असली शक्ति केवल चुनावों से नहीं, बल्कि आलोचना सहने की क्षमता से भी मापी जाती है। प्रेस से असहमति हो सकती है, लेकिन प्रेस से दूरी लोकतंत्र को कमजोर करती है। लोकतंत्र में ‘‘प्रश्न’’ असुविधाजनक हो सकते हैं, कहीं होने भी चाहिए, परंतु वही लोकतंत्र को जीवित भी रखते हैं। और अंततः “सवालों का सामना करने वाला नेतृत्व ही इतिहास में आत्मविश्वासी माना जाता है।” (लेखक कर सलाहकार एवं पूर्व बैतूल नगर सुधार न्यास अध्यक्ष हैं) ईएमएस/22/05/2026