वाशिंगटन (ईएमएस)। वर्ष 2026 के अंत तक ‘सुपर एल नीनो’ जैसी खतरनाक जलवायु स्थिति विकसित हो सकती है, जिसका असर पूरी दुनिया के मौसम पर देखने को मिलेगा। यह गंभीर चेतावनी दी है विशेषज्ञों ने। प्रशांत महासागर में तेजी से बदलते समुद्री तापमान ने दुनिया भर के वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ा दी है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह घटना सूखा, बाढ़, भीषण तूफान, खाद्य संकट और बड़े पैमाने पर आर्थिक नुकसान जैसी स्थितियां पैदा कर सकती है। अमेरिका की नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन यानी एनओएए की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक मई से जुलाई 2026 के बीच एल नीनो बनने की संभावना 82 प्रतिशत तक पहुंच गई है। वहीं दिसंबर 2026 से फरवरी 2027 के दौरान इसके बने रहने की संभावना 96 प्रतिशत बताई गई है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सुपर एल नीनो बनने की आशंका लगातार बढ़ रही है और कुछ मौसम मॉडल इसे अत्यधिक गंभीर स्तर तक पहुंचने की संभावना जता रहे हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार सुपर एल नीनो उस स्थिति को कहा जाता है जब प्रशांत महासागर के उष्णकटिबंधीय हिस्से में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से 2 से 3 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक बढ़ जाता है। समुद्र के तापमान में यह बदलाव वैश्विक मौसम प्रणाली को प्रभावित करता है। इससे दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में मौसम का संतुलन बिगड़ जाता है और अत्यधिक गर्मी, बारिश या सूखे जैसी स्थितियां पैदा होने लगती हैं। इतिहास में 1877-78 का सुपर एल नीनो सबसे विनाशकारी माना जाता है। उस दौरान भारत, चीन, ब्राजील और अफ्रीका के कई हिस्सों में भयंकर सूखा पड़ा था। फसलों के नष्ट होने से बड़े पैमाने पर अकाल फैला और करोड़ों लोगों की मौत हुई थी। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि इस बार भी वैसी स्थिति बनती है तो ग्लोबल वार्मिंग के कारण इसका असर और ज्यादा गंभीर हो सकता है। भारत पर इसका सबसे बड़ा प्रभाव मानसून पर पड़ सकता है। सामान्य तौर पर एल नीनो के दौरान मानसून कमजोर हो जाता है, जिससे वर्षा कम होती है और खरीफ फसलों का उत्पादन प्रभावित होता है। इससे किसानों की आय पर असर पड़ सकता है और खाद्यान्न संकट की स्थिति भी बन सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते तैयारी नहीं की गई तो कृषि क्षेत्र को भारी नुकसान झेलना पड़ सकता है। दुनिया के अन्य हिस्सों में भी इसके अलग-अलग प्रभाव देखने को मिल सकते हैं। दक्षिण अमेरिका में अत्यधिक बारिश और बाढ़, ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया में सूखा, अमेरिका के कुछ हिस्सों में ठंडी और नम सर्दियां तथा प्रशांत महासागर क्षेत्र में अधिक शक्तिशाली तूफानों की संभावना जताई जा रही है। इसके अलावा समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र पर भी खतरा बढ़ सकता है। कोरल ब्लीचिंग, मछली उत्पादन में गिरावट और समुद्री कटाव जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं। भारतीय मौसम विभाग सहित कई अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं। सुदामा/ईएमएस 22 मई 2026