लेख
24-May-2026
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देश तप रहा है उत्तर प्रदेश के बांदा और महाराष्ट्र के वर्धा दोनों ही शहरों में भीषण गर्मी का रिकार्ड बनाया है। मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार, बांदा में अधिकतम तापमान 48.2°C तक दर्ज किया गया, जो देश में सबसे अधिक है, जबकि वर्धा में भी पारा 47.1°C के उच्च स्तर पर पहुंच गया है।बांदा और वर्धा में गर्मी की स्थिति:बांदा (उत्तर प्रदेश) हाल ही में बांदा में तापमान 48°C के पार पहुंच गया, जिससे यह क्षेत्र भारत और एशिया के सबसे गर्म स्थानों में शामिल हो गया है।वर्धा (महाराष्ट्र) विदर्भ क्षेत्र में स्थित वर्धा शहर भी इस भीषण लू की चपेट में है, जहां तापमान 47.1°C तक पहुंच गया है इससे पहले राजनांदगांव काा तापमान रिकार्ड बना चुका है लगता है देर-सवेर देेश के सभी शहर कस्बे ऐसा ही रिकार्ड बनाएंगे मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, रेगिस्तानी और पश्चिमोत्तर इलाकों से आ रही गर्म हवाओं (लू) और आसमान साफ होने के कारण धूप की प्रचंडता से इन क्षेत्रों में तापमान लगातार बढ़ रहा है। देश इस समय ऐसी भीषण गर्मी से गुजर रहा है, जिसने सामान्य जनजीवन को हिला दिया है। जब दुनिया के 50 सबसे गर्म शहरों की सूची में सभी शहर भारत के ही दर्ज हों, तो यह केवल चौंकाने वाली खबर नहीं, बल्कि गंभीर चिंता का विषय है। ओडिशा के बलांगीर में 45 डिग्री सेल्सियस तापमान, महाराष्ट्र राष्ट्र के चंद्रपुर और उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में 44 डिग्री सेल्सियस, तथा उत्तर भारत और मध्य भारत के कई शहरों में 42 से 43 डिग्री सेल्सियस तापमान यह बताने के लिए काफी है कि गर्मी अय सामान्य मौसमी बदलाव से आगे बढ़कर जनजीवन के लिए खतरा बन चुकी है। अगर देखा जाए, यह केवल मौसम की सामान्य मार नहीं है, बल्कि एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट का संकेत है। जब किसी देश के कई शहर दुनिया के सबसे गर्म स्थानों की सूची में शामिल हो जाएं, तब यह समझना जरूरी हो जाता है कि समस्या केवल तापमान की नहीं, बल्कि तैयारी, जागरूकता और व्यवस्था की भी है। भारत में गर्मी कोई नई बात नहीं है। हर साल अप्रैल, मई और जून में लू चलती है, खेत सूखते हैं, सड़कें तपती हैं और लोग छांव की तलाश करते हैं। लेकिन इस बार गर्मी का स्वरूप ज्यादा तीखा, व्यापक और खतरनाक दिखाई दे रहा है। उत्तर भारत, मध्य भारत, पश्चिम भारत और पूर्वी भारत के कई हिस्सों में तापमान लगातार ऊंचा बना हुआ है। उत्तर प्रदेश, ओडिशा, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, हरियाणा और तेलंगाना जैसे राज्यों में भीषण गर्मी ने लोगों की परेशानी बढ़ा दी है। गर्मी और लू को लंबे समय तक केवल मौसम की परेशानी समझा जाता रहा है, लेकिन आज यह सोच बदलने की जरूरत है। लू शरीर पर सीधा हमला करती रती है। है। चकर आना, कमजोरी, तेज प्यास, घबराहट, सिरदर्द, पेट दर्द, बेहोशी और शरीर का तापमान बढ़ना इसके शुरुआती संकेत हो सकते हैं। यदि समय पर ध्यान न दिया जाए तो यही स्थिति हीट स्ट्रोक में बदल सकती है, जो जानलेवा साबित हो सकत्ती है। सबसे अधिक खतरा बच्चों, बुजुगों, गर्भवती महिलाओं, पहले से बीमार लोगों, मजदूरों, किसानों, रिक्शा चालकों, निर्माण कार्य से जुड़े श्रमिकों और सड़क पर काम करने वाले कर्मचारियों को होता है। ये लोग अक्सर मजबूरी में तपती धूप में काम करते हैं। इनके पास न तो पर्याप्त छांव होती है, न ठंडा पानी और न आराम की सुविधा। ऐसे में केवल सलाह देना पर्याप्त नहीं है, इनके लिए स्थानीय स्तर पर ठोस व्यवस्था भी जरूरी है। केंद्र और राज्य सरकारों की ओर से से एडवाइ एडवाइजरी जारी की जा रही है। अस्पतालों में हीटस्ट्रोक कक्ष, ओआरएस, इलेक्ट्रोलाइट्स, आइस पैक, ठंडे तरल पदार्थ और प्रशिक्षित चिकित्सा कर्मियों की व्यवस्था की जा रही है। यह स्वागत योग्य कदम है। लेकिन सवाल यह है कि क्या ये तैयारियां केवल कागजों तक सीमित रहेंगी या जमीन पर भी दिखाई देंगी? हर जिला अस्पताल, उप-जिला अस्पताल और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में गर्मी से जुड़ी बीमारियों के इलाज की स्पष्ट व्यवस्था होनी चाहिए। एंबुलेंस कर्मियों को भी हीट स्ट्रोक की स्थिति में तत्काल राहत राहत देने का प्रशिक्षण मिलना चाहिए। स्थानीय प्रशासन को वाजारों, बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन, श्रमिक क्षेत्रों, निर्माण स्थलों और भीड़भाड़ वाले स्थानों पर पेयजल की व्यवस्था करनी चाहिए। सार्वजनिक स्थानों पर अस्थायी छांव, पानी के टैंकर और प्राथमिक उपचार केंद्र बनाए जा सकते हैं। स्कूलों, खेल आयोजनों और सामूहिक कार्यक्रमों के समय में बदलाव जरूरी है। इस भीषण गर्मी को केवल मौसमी घटना मानकर भूल जाना बड़ी भूल होगी। लगातार बढ़ता तापमान, शहरी इलाकों में कंक्रीट का फैलाव, पेड़ों की कटाई, जल स्रोतों का सिकुड़ना और प्रदूषण ये सभी मिलकर गर्मी को और घातक बना रहे हैं। शहरों में गर्मी गांवों की तुलना में अधिक महसूस होती है, क्योंकि वहां कंक्रीट, डामर और बंद स्थान तापमान को और बढ़ा देते हैं। इसे शहरी ताप द्वीप प्रभाव कहा जाता है। यदि शहरों में हरियाली नहीं बढ़ाई गई, जल संरक्षण नहीं किया गया और अनियोजित निर्माण पर नियंत्रण नहीं लगाया गया, तो आने वाले वर्षों में गर्मी और भी भयावह रूप ले सकती है। हमें सड़क चौड़ी करने से पहले पेड़ों के महत्व को समझना होगा। विकास का अर्थ केवल इमारतें और पलाईओवर नहीं है, बल्कि रहने योग्य शहर भी है। देश में 25 मई से नौतपा शुरू होने जा रहा है। परंपरागत रूप से नौतपा को साल के सबसे गर्म दिनों में माना जाता है। इस दौरान सूर्य की तपिश और लू का असर बढ़ जाता है। इस बार नौतपा से पहले ही कई राज्यों में गर्मी असहनीय हो चुकी है। ऐसे में आने वाले दिनों के लिए सावधानी और भी जरूरी हो जाती है। नौतपा को केवल धार्मिक या परंपरागत दृष्टि से देखने के बजाय स्वास्थ्य और आपदा प्रबंधन के नजरिए से भी समझना चाहिए। प्रशासन को इस अवधि में विशेष निगरानी रखनी चाहिए। अस्पतालों को तैयारी, पानी की व्यवस्था, बिजली आपूर्ति और अग्नि सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा जरूरी है। बढ़ती गर्मी के कारण बिजली उपकरणों पर दवाव बढ़ता है, जिससे अस्पतालों और सार्वजनिक भवनों में आग का खतरा भी बढ़ सकता है। यहां आपको बता दें कि हाल ही में लीड्स विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने एक महत्वपूर्ण शोध किया है, जो जलवायु परिवर्तन के बारे में हमारी समझ को और गहरा करता है। अर्थ फ्यूचर नामक पत्रिका में प्रकाशित इस शोध में बताया गया है कि जैसे-जैसे पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है, वैसे-वैसे पर्माफ्रॉस्ट (जमी हुई मिट्टी) पिघल रही है। यह पिघलना केवल एक सामान्य प्रक्रिया नहीं है, बल्कि इससे वातावरण में खतरनाक गैसों का उत्सर्जन तेजी से बढ़ सकता है। पर्माफ्रॉस्ट वह मिट्टी होती है जो कई वर्षों तक जमी रहती है। यह मुख्य रूप से आर्कटिक क्षेत्रों में पाई जाती है। इस मिट्टी के अंदर बहुत बड़ी मात्रा में कार्बन और अन्य गैसें फंसी रहती हैं। जब यह मिट्टी जमी रहती है, तब ये गैसें बाहर नहीं निकल पातीं। इसलिए पर्माफ्रॉस्ट को जलवायु परिवर्तन के खिलाफ एक प्राकृतिक सुरक्षा कवच माना जाता है। गर्मी से बचाव के उपाय कठिन नहीं हैं, लेकिन उन्हें गंभीरता से अपनाना जरूरी है। लोगों को बार-बार पानी पीना चाहिए, भले ही प्यास न लगी हो। हल्के रंग के ढीले सूती कपड़े पहनने चाहिए। सिर को कपड़े, टोपी या छाते से ढकना चाहिए। खाली पेट धूप में बाहर नहीं निकलना चाहिए। शराब, बहुत अधिक चाय-कॉफी और अत्यधिक तले-भुने भोजन से बचना चाहिए। घर से बाहर निकलते समय पानी की बोतल जरूर रखनी चाहिए। यदि किसी व्यक्ति को चकर आए, तेज कमजोरी महसूस हो, शरीर गर्म हो जाए या बेहोशी जैसी स्थिति दिखे तो उसे तुरंत छांच या ठंडी जगह पर ले जाना चाहिए। कपड़ों को डीला करना चाहिए, शरीर पर ठंडा पानी डालना चाहिए और तुरंत चिकित्सा सहायता लेनी चाहिए। भीषण गर्मी अब केवल असुविधा नहीं, जीवन और मृत्यु का प्रश्न बनती जा रही है। सरकार, प्रशासन, समाज और नागरिक सभी को अपनी भूमिका निभानी होगी। मौसम विभाग की चेतावनी को हल्के में लेना खतरनाक हो सकता है। हर परिवार को अपने चच्चों और बुजुर्गों का विशेष ध्यान रखना चाहिए। हर मोहल्ले, पंचायत और वार्ड स्तर पर जागरूकता अभियान चलना चाहिए। गर्मी की यह मार हमें एक बड़ा संदेश दे रही है। प्रकृति के साथ खिलवाड़, शहरों का अनियोजित विस्तार और पर्यावरण की उपेक्षा अब सीधे हमारे स्वास्थ्य पर असर डाल रही है। आज जरूरत है कि हम केवल गर्मी से बचने की तैयारी न करें, बल्कि भविष्य को ठंडा और सुरक्षित बनाने की दिशा में भी गंभीर कदम उठाएं, क्योंकि यदि आज हमने चेतावनी नहीं समझी, तो आने वाला समय और भी अधिक तपिश लेकर आएगा।इसलिए सिर्फ जागरूकता और बचाव ही जीवन रक्षक हैं। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं पिछले 38 वर्ष से लेखन और पत्रकारिता से जुड़े हैं) (यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है) .../ 24 मई /2026