स्वतंत्र भारत के 75 वर्षों की राजनीति पर दृष्टि डालें, तो स्पष्ट दिखाई देता है, भारतीय लोकतंत्र की मूल भावना धीरे-धीरे सत्ता केंद्रित राजनीति में बदलती चली गई। वर्तमान राजनीति का उद्देश्य राष्ट्र निर्माण से अधिक सत्ता प्राप्ति और सत्ता को बनाए रखना है। स्वतंत्रता आंदोलन से निकला नेतृत्व त्याग, संघर्ष और वैचारिक प्रतिबद्धता का प्रतीक था। संविधान निर्माताओं ने भारत की विविधता को ध्यान में रखते हुए जो संविधान तैयार किया था, उसमें अंतिम शक्ति जनता के हाथ में रहे। विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच शक्तियों का संतुलन स्थापित किया गया। नागरिकों और मीडिया को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी गई। इसे चौथा स्तंभ भी संविधान का माना गया। ताकि कोई भी संस्था निरंकुश न हो सके। भारतीय संस्कृति में ब्रह्मा, विष्णु, महेश के पास जिस तरह से प्रकृति का संचालन है, संविधान निर्माताओं ने यही व्यवस्था भारतीय संविधान में की। स्वतंत्रता के बाद के शुरुआती 25 वर्षों में संसाधनों की भारी कमी, युद्ध, अकाल और आर्थिक संकट के बावजूद, तब की सरकारों ने बड़े-बड़े विकास कार्य किये। बड़े-बड़े सार्वजनिक उपक्रम तैयार किया। बड़े-बड़े शिक्षा के संस्थान और औद्योगिक प्रतिष्ठान उसी अवधि में तैयार किए गए। योजना आयोग के माध्यम से केंद्र एवं राज्यों के बीच संघीय शासन व्यवस्था तथा संसाधनों का बंटवारा करने संवैधानिक संस्था बनाई गई। उस समय शासन व्यवस्था में नैतिकता दिखाई देती थी। सभी संवैधानिक संस्थाएं जनता के प्रति जवाबदेह थीं। 1947, 1962, 1965 और 1971 के युद्धों के दौरान अकाल, खाद्यान्न संकट, तथा केंद्र एवं राज्य सरकारों के पास टैक्स के रूप में जब सीमित आर्थिक संसाधन थे। भारत ने सभी संवैधानिक संस्थाओं को स्वतंत्रता देते हुए उन्हें मजबूत किया। विकास की आधारशिला रखी। जब कोई व्यवस्था नहीं थी, उस दौर के नेतृत्व में वैचारिक मतभेद होने के बाद भी राष्ट्रहित सर्वोपरि था। इंदिरा गांधी के नेतृत्व में 1971 का युद्ध और बांग्लादेश का निर्माण भारत की राजनीतिक इच्छाशक्ति का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण वैश्विक स्तर पर आज भी माना जाता है। 1977 के बाद भारतीय राजनीति में बड़ा परिवर्तन आया। 1971 के युद्ध के बाद वैश्विक स्तर पर भारत में बहुत सारे प्रतिबंध लगाए गए। जो लंबे समय तक लागू रहे। भारत को ऊर्जा संकट का सामना कई वर्षों तक करना पड़ा। खाद्यान्न संकट का भी सामना करना पड़ा। इंदिरा गांधी ने इसका मुकाबला किया। प्रतिबंधों के कारण भारत में खाद्यान्न संकट महंगाई और मुनाफाखोरी बढ़, जनता की नाराजी बढ़ी। 1975 में सारे देश में आंदोलन शुरू हो गए। छात्र, ट्रेड यूनियन, विपक्षी राजनीतिक दल सब सड़कों पर आ गए। 1975 में आंदोलन का नेतृत्व कर रहे जयप्रकाश नारायण ने सार्वजनिक रूप से घोषणा की- सेना और पुलिस सरकार की बात नहीं माने। इस समय इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी का चुनाव अवैध घोषित कर दिया था। जिसके कारण राजनीतिक अस्थिरता भी बढ़ गई थी। इंदिरा गांधी ने इस स्थिति से निपटने के लिए आपातकाल की घोषणा की। भारतीय संविधान में आपातकाल का प्रावधान था। सांसद ने भी इसकी पुष्टि की। आपातकाल के विरोध से पैदा हुई राजनीति सत्ता की राजनीति में वैचारिक स्थिरता नहीं ला सकी। गठबंधन, अवसरवाद और सत्ता की होड़ ने राजनीति की दिशा बदल दी। लगभग ढाई वर्ष के बाद केंद्र में जो जनता पार्टी की सरकार बनी थी वह गिर गई। 1980 में पुनः चुनाव हुए जिसमें इंदिरा गांधी भारी बहुमत के साथ सत्ता में वापस आई। 1984 में प्रधानमंत्री निवास में गोलियों से भूनकर उनकी हत्या कर दी गई थी। उसके बाद राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने। 75 वर्ष के इतिहास में वह सबसे ज्यादा सीटों के साथ चुनाव जीतकर प्रधानमंत्री बने। उन्होंने रक्षा सोदों में दलाली बंद करने का निर्णय लिया। तत्कालीन रक्षा मंत्री वीपी सिंह थे, उन्होंने प्रधानमंत्री राजीव गांधी के ऊपर बोफोर्स खरीदी में कमीशन लेने और विदेशी बैंक में जमा करने का आरोप लगाया। 1989 के चुनाव में भ्रष्टाचार राजनीति का सबसे बड़ा हथियार बन गया। कांग्रेस पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। बीपी सिंह प्रधानमंत्री बने। जिस बोफोर्स घोटाले का उन्होंने आरोप लगाया था, प्रधानमंत्री बनने के बाद भी वह उसे प्रमाणित नहीं कर सके। धीरे-धीरे राजनीतिक दलों का लक्ष्य जनसेवा से हटकर चुनावी प्रबंधन और सत्ता के सिंहासन तक सीमित होता चला गया। भारत की राजनीति में नैतिकता का स्थान अनैतिकता में बदलता चला गया। राजनीति स्वार्थ पर आधारित हो गई। 1991 के आर्थिक सुधारों ने भारत को नई दिशा दी। उदारीकरण के बाद भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़ा। प्रधानमंत्री नरसिंहाराव और वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने नई आर्थिक दिशा दी। 2004 मे मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने। वह 2014 तक प्रधानमंत्री के पद पर रहे। इन 10 वर्षों में भारत में बड़ी तेजी के साथ विकास हुआ। वह काम करने में विश्वास करते थे। वह राजनीतिज्ञ नहीं थे। इसका खामियाजा कांग्रेस को संगठन स्तर पर भुगतना पड़ा। 2014 के बीच आर्थिक विकास की गति ने दुनिया का ध्यान भारत की ओर आकर्षित किया। 2008 की वैश्विक मंदी के दौरान भारत ने अपेक्षाकृत संतुलित स्थिति बनाए रखी। 2014 के बाद राजनीति में राष्ट्रवाद, बड़े सपनों और प्रचार आधारित राजनीति के मॉडल का प्रभाव तेजी से बढ़ा। जनता को विकास, रोजगार और समृद्धि के बड़े-बड़े सपने दिखाए गए। इसी दौरान नोटबंदी जीएसटी एवं अन्य सुधार के नाम पर पिछले 12 वर्षों में केंद्र की सत्ता ने जो निर्णय लिए हैं, उसके कारण महंगाई, बेरोजगारी आर्थिक असमानता केंद्र एवं राज्य सरकारों के ऊपर बढ़ता कर्ज आम जनता के ऊपर कर्ज का बोझ बढ़ता ही चला गया। इन्हीं 12 वर्षों में भारत में बेरोजगारी भी तेजी के साथ बढ़ी। सरकारी और कॉर्पोरेट नौकरी में संविदा नियुक्ति का चलन बढ़ा। मशीनीकरण बढ़ाने के कारण रोजगार के अवसर कम हुए। आज स्थिति यह है, आम नागरिक बढ़ते टैक्स, महंगी शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजमर्रा के खर्चों के भारी दबाव में है। युवाओं में बेरोजगारी गहरी निराशा पैदा कर रही है। आर्थिक नीतियों का लाभ कुछ चुनिंदा पूंजीपतियों तक सीमित होकर रह गया है। मध्यम वर्ग और गरीब वर्ग लगातार आर्थिक दबाव झेल रहा है। असंगठित क्षेत्र पूरी तरह से बर्बाद हो गया है। पिछले 12 वर्षों में सरकार के निर्णय पूंजीपतियों के हित में हो रहे हैं। पिछले वर्षों में दो तरह के कानून प्रचलन में आ रहे हैं। लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और निष्पक्षता को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। चुनाव आयोग, न्यायपालिका और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर सरकार के दबाव में काम करने के आरोप लग रहे हैं। भारतीय राजनीति भय, भूख, लालच और सपनों के मिश्रण पर खड़ी है। सत्ता खोने का भय, सत्ता में असीमित समय तक बने रहने की भूख, संसाधनों पर सरकार का नियंत्रण, लालच की राजनीति, आर्थिक संसाधन पर सरकार का नियंत्रण, सत्ता में बने रहने के लिए जनता को प्रभावित करने सपनों की राजनीति ने लोकतंत्र को केवल चुनाव जीतने का माध्यम बना लिया है। जनविश्वास को बनाए रखने के लिए यदि सरकारें वास्तविक समस्याओं जिसमें महंगाई, बेरोजगारी, आर्थिक असंतुलन और सामाजिक असुरक्षा पर गंभीरता से ध्यान नहीं देगी, तो असंतोष बढ़ना स्वाभाविक है। भारत की शक्ति उसकी युवा आबादी और लोकतांत्रिक चेतना है। सत्ता को समझना होगा, लोकतंत्र में विजय केवल प्रचार से नहीं, बल्कि विश्वास, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व से मिलती है। वर्तमान में जो हालात देखने को मिल रहे हैं, वह 1975 में जब आंदोलन शुरू हुए थे उसकी याद दिला रहे हैं। महंगाई बेरोजगारी मुनाफाखोरी के कारण इंदिरा गांधी को आपातकाल लगाना पड़ा था। वही स्थिति आज नजर आने लगी है। सरकार को गंभीरता से इस पर विचार करना होगा। ईएमएस/26/05/2026