भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर पिछले कुछ वर्षों में जिस प्रकार से “विश्व की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था” का प्रचार किया गया, उसके पीछे की वास्तविकता अब धीरे-धीरे सामने आने लगी है। शेयर बाजार को रिकॉर्ड स्तर पर, विदेशी निवेश और बढ़ते विदेशी मुद्रा भंडार को आर्थिक मजबूती का प्रतीक बताया गया था। अब वही संकेतक गंभीर संकट की ओर इशारा कर रहे हैं। पिछले दस वर्षों में विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) ने भारतीय शेयर बाजार में भारी निवेश किया, यह निवेश दीर्घकालिक औद्योगिक विकास की बजाय अल्पकालिक मुनाफाखोरी पर आधारित रहा। जब-जब वैश्विक परिस्थितियां अनुकूल रहीं, विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से बड़ा लाभ कमाया। भारतीय शेयर बाजार का अपयोग सट्टा बजार के रुप में करके विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से भारी कमाई की है। शेयर बाजार में संकट आते ही भारी निकासी शुरू कर दी। पिछले दो वर्षों में ही लगभग 78 बिलियन डॉलर की निकासी यह साबित करती है, विदेशी निवेशक पूंजी भारत को स्थायी विकास में साझेदार नहीं, बल्कि लाभ कमाने का बाजार मानकर कमाई कर भारतीय पूंजी को विदेश तो जा रही थी। इसके विपरीत भारतीय संस्थागत निवेशकों—बैंक, बीमा कंपनियां और म्यूचुअल फंड—ने बाजार को संभालने के लिए लगातार शेयर बाजार में निवेश किया। इसका अर्थ यह है कि शेयर बाजार की वास्तविक मजबूती घरेलू निवेश पर टिकी हुई है। जबकि विदेशी निवेशकों ने निवेश निकालकर अस्थिरता को बढ़ाने का काम किया है। स्थिति की गंभीरता केवल शेयर बाजार तक सीमित नहीं है। भारत का आयात, लगातार निर्यात से अधिक कई वर्षों से बना हुआ है। कच्चे तेल, गैस और उर्वरक जैसे आवश्यक उत्पादों के लिए भारत को भारी मात्रा में डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। अंतरराष्ट्रीय तनाव, विशेषकर पश्चिम एशिया के संकट और अमेरिका-ईरान टकराव ने ऊर्जा कीमतों को बढ़ाया है। दूसरी ओर डॉलर के मुकाबले रुपया लगातार कमजोर हो रहा है। यदि रुपया 100 प्रति डॉलर के स्तर तक पहुंचता है, तो आयातित महंगाई और भी भयावह हो जाएगी। चिंता का सबसे बड़ा विषय विदेशी मुद्रा भंडार है। जिस विदेशी मुद्रा भंडार को सरकार आर्थिक सुरक्षा कवच बताती रही है। उसकी वास्तविक स्थिति अब भारी दबाव में दिखाई दे रही है। रिजर्व बैंक रुपए को संभालने के लिए बाजार में डॉलर बेच रहा है, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ रहा है। यदि यही स्थिति जारी रही, तो भारत को भुगतान संतुलन संकट का सामना करना पड़ सकता है। 1991 के आर्थिक संकट की यादें फिर ताजा होने लगी हैं। उस समय भी आयात भुगतान और विदेशी मुद्रा की कमी सबसे बड़ी समस्या बनी थी। एक अन्य गंभीर पहलू भारतीय पूंजी का विदेशों की ओर पलायन है। पिछले वर्षों में अनेक उद्योगपतियों और अरबपतियों ने विदेशों में निवेश बढ़ाया है। लाखों भारतीय नागरिकों ने विदेशी नागरिकता तक ली है। इससे यह संकेत मिलता है, देश का बड़ा पूंजी वर्ग भारतीय अर्थव्यवस्था की दीर्घकालिक स्थिरता को लेकर स्वयं आश्वस्त नहीं है। ऐसे समय में जब देश के भीतर निवेश और रोजगार सृजन की आवश्यकता है, तब बड़े औद्योगिक समूहों द्वारा अमेरिका एवं अन्य देशों में अरबों डॉलर का निवेश करना भारतीय अर्थ-व्यवस्था को लेकर कई प्रश्न खड़े करता है। सरकार की गलत आर्थिक नीति आलोचना के घेरे में आ गई है। केंद्र और राज्य सरकारों पर कर्ज लगातार बढ़ रहा है। राजकोषीय घाटा नियंत्रण से बाहर जाता दिखाई दे रहा है। केन्द्र सरकार द्वारा रिजर्व बैंक से लगातार भारी लाभांश लेना और बैंकों पर निर्भरता बढ़ाना, यह दर्शाता है, सरकार के पास संसाधनों का संकट गहराता जा रहा है। यह आशंका व्यक्त की जाने लगी है भारत “लेहमन ब्रदर्स” जैसी स्थिति में पहुंच सकता है। भारतीय वित्तीय संस्थाओं और बैंकों के आर्थिक संकेतकों में बढ़ती अस्थिरता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। भारत की अर्थव्यवस्था अभी भी विशाल घरेलू बाजार, सेवा क्षेत्र और कृषि उत्पादन पर टिकी हुई है। यदि आयात पर नियंत्रण, पूंजी पलायन, बढ़ता कर्ज और कमजोर होती मुद्रा पर समय रहते नियंत्रण नहीं किया गया, तो आर्थिक मंदी और महंगाई का दोहरा संकट भारतीय अर्थव्यवस्था में गहरा सकता है। सरकार को उत्पादन, निर्यात, रोजगार और घरेलू निवेश को मजबूत करने वाली ठोस आर्थिक नीतियों पर काम करना होगा। पूंजीपतियों के हित में निर्णय के स्थान पर कठोर वित्तीय नियंत्रण की नीतियॉ तुरन्त लागू करनी होंगी। अन्यथा विदेशी पूंजी पर अत्यधिक निर्भरता भारत को भविष्य में गंभीर आर्थिक अस्थिरता की ओर धकेल सकती है। अर्थशास्त्री चितिंत हैं। 1991 और 2008 की लेहमेन ब्रदर्श जैसे खतरें की आहट मिनले लगी है। समय रहते कठोर निर्णय लेने की जरुरत है। ईएमएस/25/05/2026