झारखंड के जमशेदपुर में दो दिवसीय राष्ट्रीय नदी-पर्वत सम्मेलन में देशभर से आए पर्यावरणविदों, विधि विशेषज्ञों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और जनप्रतिनिधियों ने नदियों और पहाड़ों के संरक्षण के लिए अलग और सशक्त कानून बनाने की जरूरत पर जोर दिया। इन लोगों ने हिमालयी क्षेत्र से लेकर झारखंड, राजस्थान और अन्य क्षेत्रों की नदियों तथा पहाड़ों की स्थिति, उस पर मंडराते खतरे और पर्यावरण पर पड़नेवाले प्रतिकूल प्रभाव पर चिंता का इजहार किया और कहा गया कि दरअसल, आज वाला विकास का मॉडल विनाश का मॉडल है। विकास का काम जरूरी है लेकिन वो ऐसा विकास हो, जो चरैवेति चरैवेति के सिद्धांत पर हो। पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहे और आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्राकृतिक संसाधन छोड़े। इस विकास के मॉडल को उन्होंने ‘सनातन विकास’ का नाम दिया। इस सम्मेलन द्वारा पारित प्रस्ताव में नदी-पहाड़ संरक्षण, संवर्धन एवं सुरक्षा के लिए कानून बनाने की मांग की गई। दो दिनों के सम्मेलन का आयोजन तरुण भारत संघ, आईआईटी (आईएसएम) धनबाद, युगांतर भारती, नेचर फाउंडेशन, स्वर्णरेखा क्षेत्र विकास ट्रस्ट, जल बिरादरी और मिशन वाई की ओर से मोती लाल नेहरु पब्लिक स्कूल में किया गया था। सम्मेलन में कहा गया कि सरकारें पहाड़ों का केवल दोहन नहीं, बल्कि शोषण करवा रही हैं। शोषण की कोई मर्यादा नहीं होती, जबकि दोहन की सीमा निर्धारित होती है। सरंडा, दामोदर, स्वर्णरेखा तथा अरावली के चंबल और मत्स्य-मेवात क्षेत्रों के पुनर्जीवन से सीख लेते हुए सरकारों को पहाड़ों और नदियों के संरक्षण, संवर्धन एवं पुनर्जीवन के कार्यों में जुटना चाहिए। सम्मेलन में यह भी प्रस्ताव रखा कि भारतीय पर्वतों की स्थिति का सतत आकलन करने हेतु एक राष्ट्रीय मॉनिटरिंग तंत्र अथवा ऐप विकसित किया जाए। इस तंत्र को पर्वतीय क्षेत्रों की वास्तविक स्थिति को यथावत बनाए रखने हेतु आवश्यक अधिकार प्रदान किए जाएँ। भारतीय समाज अपने पहाड़ों को तीर्थ एवं जीवन-सुरक्षा का आधार मानता है। ये भारत की प्रकृति और संस्कृति के संरक्षण के मूल आधार हैं। इसलिए इनके संरक्षण हेतु सशक्त एवं सतत कानून की आवश्यकता है। यह कानून केवल पहाड़ों की सुरक्षा का नहीं, बल्कि भारत की सीमा-सुरक्षा, संस्कृति, प्रकृति और तीर्थों की रक्षा का भी आधार बनेगा। सम्मेलन में यह भी कहा गया कि उच्चतम न्यायालय द्वारा “सस्टेनेबल” शब्द की व्याख्या के प्रकाश में पूरी अरावली को खनन हेतु खोल दिया गया था। अतः प्रस्तावित कानून का नाम “भारतीय पर्वत सतत एवं सुरक्षा अधिनियम, 2026” रखा जाए। सम्मेलन ने अंत में कहा कि पर्वत हमारी अगली पीढ़ी की धरोहर हैं। हमने उन्हें अपने पूर्वजों से उधार लेकर उपयोग किया है और हमें उन्हें उसी स्वरूप में अगली पीढ़ी को लौटाना है। जैसे हमारे पुरखों ने हमें ये धरोहर सौंपी, वैसे ही हमें भी आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित और संरक्षित पर्वत सौंपने होंगे। सम्मेलन में हिमालय एवं गंगा नदी को जीवनीय बनाए रखने हेतु जीवन-त्याग और बलिदान करने वाले प्रो. जी.डी. अग्रवाल जी को सम्मेलन ने अनेक बार स्मरण किया। सम्मेलन में कहा गया कि आज हिमालय में नई परियोजनाएँ भले ही न आएँ, किंतु लंबे समय से रुकी हुई एवं रद्द परियोजनाओं को पुनः चालू करने का प्रस्ताव उच्चतम न्यायालय को भेजा गया है। यह भारत की जनता को भ्रम में डालकर पहाड़ों की हत्या करने तथा नदियों, विशेषकर गंगा नदी, को सुखाकर समाप्त करने जैसा षड्यंत्र है। सम्मेलन में 11 मई 2025 को गुजरात के पीपावाव पोर्ट विस्तार से संबंधित मामले की सुनवाई के दौरान खुली अदालत में की गई टिप्पणियों के संदर्भ में सम्मेलन ने गंभीर चिंता व्यक्त की। उच्चतम न्यायालय की यह टिप्पणी कि,“देश में जिस तरह की मुकदमेबाजी केवल सभी विकास परियोजनाओं को रोकने के लिए दायर की जा रही है, वही पूरी समस्या है।”तथा“आप हमें इस देश में एक भी परियोजना दिखाओ जहाँ ये तथाकथित पर्यावरणविद् विकास परियोजनाओं का स्वागत करते हैं।” पर्यावरण एवं साझे भविष्य हेतु कार्य करने वालों के लिए संकट उत्पन्न करने वाली मानी गई। सम्मेलन ने मांग की कि 11 मई 2026 को पीपावाव पोर्ट सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश द्वारा की गई मौखिक टिप्पणियाँ वापस ली जाएँ। जनहित याचिकाओं को सामान्य मुकदमेबाजी से अलग मानकर सम्मानपूर्वक सुना जाए। जनहित याचिकाओं से जुड़े समुदायों को संवैधानिक सम्मान प्राप्त है, जिसे न्यायपालिका सुनिश्चित करे तथा अपने संवैधानिक दायित्व का निर्वहन करे। भारत के जैव-भौगोलिक क्षेत्र गंभीर रूप से संकटग्रस्त हैं। भारत के प्रमुख जैव-भौगोलिक क्षेत्र केवल जैव विविधता के भंडार नहीं हैं। ये वह कार्यात्मक अवसंरचना हैं जिन पर हमारे जल, खाद्य और जलवायु तंत्र निर्भर करते हैं। उनका क्षरण विकास की परिधि में एक संरक्षण चिंता नहीं है- यह विकास के लिए ही एक खतरा है। अरावली यह प्राचीन पर्वत श्रृंखला उत्तर-पश्चिम भारत के लिए एक महत्वपूर्ण भूजल पुनर्भरण क्षेत्र है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त सेंट्रल एंपावर्ड कमिटी (सीईसी) की 2018 की रिपोर्ट में पाया गया कि 1967-68 से राजस्थान में अवैध खनन के कारण अरावली श्रृंखला का 25ः नष्ट हो गया और पट्टे की सीमाओं के बाहर 10,300 हेक्टेयर से अधिक प्रभावित हुए हैं। खनन क्षेत्रों में भूजल स्तर 1,500-2,000 फीट तक गिर गया है। पहाड़ियों से बहने वाली नदियाँ और धाराएँ सूख गई हैं या गंभीर रूप से प्रदूषित हो गई हैं। पश्चिमी घाट प्रायद्वीपीय भारत के जल मीनार हैं, जो कई करोड़ लोगों के लिए जल और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने वाली बारहमासी नदियों को जीवित रखते हैं। अपनी पारिस्थितिक महत्ता और पारिस्थितिक सेवाओं के आर्थिक मूल्य के बावजूद, वे अनियोजित अवसंरचना विस्तार, खनन और बागान कृषि के बढ़ते दबाव का सामना कर रहे हैं।2025 के मानसून सत्र में हिमालयी आपदाओं का पैमाना और आवृत्ति इतनी अधिक थी कि सर्वोच्च न्यायालय ने स्वयं घोषित कियाः यदि वर्तमान स्थिति जारी रही, तो वह दिन दूर नहीं जब हिमाचल प्रदेश का पूरा राज्य हवा में विलीन हो जाएगा। छह न्यायालय के अपने शब्द ही इस सुझाव का सबसे शक्तिशाली खंडन हैं कि हिमालय में या भारत के किसी भी पारिस्थितिकी संवेदनशील क्षेत्र में विकास की न्यायिक जाँच राष्ट्र-विरोधी या विकास-विरोधी है। आजीविका सुरक्षा-पारिस्थितिक ज्ञान की कीमत पर विकास भारतीयों को महँगा पड़ रहा है। हम पर्यावरणविद् (एनवायरमेंटलिस्ट) लेबल को एक नकारात्मक या डेलिगिटिमाइजिंग शब्द के रूप में उपयोग किए जाने पर कड़ी आपत्ति जताते हैं जो विकास के प्रति वैचारिक रूप से विरोधी एक विशेष-हित समूह का बोध कराता है। पर्यावरणवादी होना एक सकारात्मक अर्थ रखता है, ऐसे नागरिक जो संविधान के अनुच्छेद 51 (आ) (जी) के अंतर्गत अपना कर्तव्य निभा रहे हैं। वास्तव में, संविधान प्रत्येक नागरिक (न्यायाधीशों सहित) को पर्यावरण का संरक्षक होने की कल्पना करता है। इस अर्थ में, हम संवैधानिक ढाँचे के बाहर नहीं, बल्कि पूरी तरह उसके भीतर कार्य कर रहे हैं और अच्छे कानून-पालक नागरिक हैं। कई मामलों में, मुकदमेबाजी अंतिम उपाय इसीलिए है क्योंकि पर्यावरणीय नियोजन भारत में परियोजना डिजाइन की मूल प्रक्रिया में अभी तक एकीकृत नहीं है। सम्मेलन को संबोधित करते हुए मैग्सेसे पुरस्कार विजेता जलपुरुष राजेंद्र सिंह ने कहा कि सरकारों ने बीते 77 सालों में नाक-बाल काटने वाले कई कानून बनाए, जिन्हें इन्वायरमेंट प्रोटेक्शन एक्ट के नाम से जाना जाता है। उन्होंने कहा कि हृदय और फेफड़े को न काटने वाला कानून आज तक न बना। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 और 41 में जीवन को बचाने की जिम्मेदारी है। सिर्फ आदमी का नहीं, पेड़-पौधे, जीव-जंतु की रक्षा के लिए व्यवस्था है। राजेंद्र सिंह ने सवाल किया कि ब्यूरोकेसी, ज्यूडिशयरी, टेक्नोक्रेटस, अधिवक्ता...ये सब क्या कर रहे हैं। उन्होंने इसका जवाब भी खुद ही दिया। जो चीजें बिगड़ रही हैं, उन्हें ये टेमपरोरी सॉल्यूशन देकर चलने लायक बना दे रहे हैं। ‘जुगाड़’ करके चीजों को ठीक रहे हैं, ताकि जनता में उफान न आए। इसके लिए बहुतेरे कानून बनाए गए हैं। भारतीय संविधान भारतीय धरती पर रहने वालों को संरक्षण और सुरक्षा देना चाहता है, उस संविधान के इरादे को लोग देख नहीं पा रहे हैं। जलपुरुष ने कहा कि पहाड़ लगातार कट रहे हैं। अरावली पर उन्होंने लड़ाई लड़ी और जीते भी। तभी 28000 खदानें बंद हो सकीं क्योंकि सुप्रीम कोर्ट लगातार पहाड़ों-नदियों के जीवन को बचाने के लिए न सिर्फ मामला सुन रहा था, बल्कि लगातार फैसला भी दे रहा था। राजेंद्र सिंह ने कहा कि अभी चार माह पहले देश के शीर्ष न्यायालय ने पुरानी तमाम फैसलों को एक तरफ रख कर फैसला दिया कि 100 मीटर से जो ऊंचा है, वही अरावली पहाड़ है, बाकी नहीं। यह दृष्टि दोहन की नहीं, शोषण की दृष्टि है। दोहन में एक मर्यादा होती है। शोषण में कोई मर्यादा नहीं होती। बाद में उस पैसले को वापस लिया, क्योंकि उस पर विरोध हुआ। आज के दौर के जितने कानून हैं, सारे के सारे कानून, नए-नए शब्द गढ़ कर शोषण करना चाहते हैं नेचर का। चाहे वह शब्द सब्सटेनेबल डेवलपमेंट हो या कुछ और। भारतीय ज्ञान परंपरा में कहा गया है कि पर्वत मेरी मां के स्तन हैं। मां समुद्र से लेकर धरती तक विराजती हैं। अथर्ववेद में लिखा है कि जो पृथ्वी को कष्ट देता है, हे पृथ्वी तू उसका वध कर दे, रौंद दे। यह 12 हजार साल पहले लिखा गया था। राजघराना समुद्रों पर कब्जा कर रहा है, नदियों को प्रदूषित कर रहा है। जो हमारी धरती को शोषित कर रहा है, नष्ट कर रहा है, हम प्रार्थना करते हैं कि हे प्रकृति! तू उसे नष्ट कर दे। क्या यह प्रार्थना यहां मौजूद लोग कर सकते हैं? तभी हम नए कानून पर बात कर सकते हैं। हमें पहाड़ का कैसा और नदी का कैसा कानून चाहिए? उन्होंने कहा कि हमें अगर एक नया और अच्छा कानून चाहिए तो हमें संविधान के दायित्वों को समझना होगा। संविधान का दायित्व कहता है कि हम इस पूरी पृथ्वी को रहने लायक बनाएंगे। जो हमारी प्राचीन जीवन पद्धति है, उसे अपनाएंगे। तभी प्रकृति का कल्याण संभव है। इस वक्त हम अपनी नदियों और पृथ्वी का बेरहमी से शोषण कर रहे हैं। पहले दोहन होता था, मर्यादा से होता था। अभी शोषण हो रहा है। कोई मर्यादा नहीं है। कोई सीमा नहीं है। इसलिए हमें कानून चाहिए। पहाड़ और नदियों को जीवित रखने के लिए, उनके संरक्षण और संवर्द्धन के लिए हमें एक कानून चाहिए। हम पानी चाहते हैं तो हमें पहाड़ को बचाना ही होगा। हिंदुस्तान के सारे पहाड़ों को बचाना होगा। सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत न्यायाधीश वी. गोपाला गौड़ा ने कहा कि 77 साल बीत गए लेकिन हम लोग पहाड़ों और नदियों के लिए कोई कानून न ला सके। देश में एक से एक बुद्धिजीवी, न्यायाधीश टेक्नोक्रेट हैं, फिर भी पहाड़ों और नदियों के लिए कोई कानून नहीं है। जमशेदपुर में हम लोग इस कानून पर काम कर रहे हैं। अपील करता हूं देश की राष्ट्रपति से कि वो इसका संज्ञान लें। प्रधानमंत्री से कहें। प्रधानमंत्री मंत्रिमंडल के सहयोगियों से चर्चा करें। विधेयक संसद से ही पास होगा। यह बेहद जरूरी है। य़ह अत्यावश्यक है। नदी और पर्वतों के लिए नियम नहीं बनेंगे तो ये लुप्त हो जाएंगे। इस पर कानून बनना ही चाहिए। जैसे 2004 और 2023 में संसद का विशेष सत्र बुलाया गया था, उसी प्रकार से पहाड़-नदी पर कानून बनाने के लिए संसद का विशेष सत्र आहूत किया जाए। पर्यावरण के दृष्टिकोण से हमें पहाड़ एवं नदियों को संरक्षित करने की आवश्यकता है। इन मामलों में सुप्रीम कोर्ट को भी सक्रिय होना होगा ताकि हमारे बच्चों एवं देश का भविष्य सुरक्षित रहे। सुप्रीम कोर्ट द्वारा कई मामलों में उटपटांग फैसले दिए गए है, कई मामलों में अच्छे फैसले भी हैं। अच्छे फैसलों के कारण ही आज राजस्थान की नदियों एवं नालों में पानी बह रहा है। जमशेदपुर पश्चिम के विधायक सरयू राय ने कहा कि पहाड़ों और नदियों के लिए एक ठोस कानून की जरूरत है। बहुतेरी नदियां ऐसी हैं, जो रैयती जमीनों से होकर बहती हैं। पटना में गंगाजी एक किलोमीटर दूर चली गईं। ये विडंबना ही तो है कि मां गंगा का विस्तार कम हो गया। जमशेदपुर में 2005 तक बस्तियों के किनारे रहने वाले लोगों का स्वर्णरेखा नदी से मधुर संबंध था। वो इसी के पानी से खाना-पीना, नहाना-धोना करती थीं। वो इस नदी पर ही आश्रित थीं। 2026 में स्वर्णरेखा की स्थिति अत्यंत खराब हो गई। जल प्रदूषित हो गया। अब कोई उधर नजरें उठा कर देखना भी पसंद नहीं करता। पहाड़ों की स्थिति बेहद खराब है। झारखंड के साहेबगंज में जो पहाड़ हैं, उन्हें बेतरतीब तरीके से काटा जा रहा है। लोग भूल जाते हैं कि पहाड़ों का रहना हम सभी के लिए बेहद जरूरी है। यह बिना सशक्त कानून बनाए संभव होता नहीं दिखता। हम लोगों ने कानून का ड्राफ्ट बनाया है। उसमें सुधार की भरपूर गुंजाइश है। जरूरी सुधारों-सुझावों को लागू किया जाएगा। प्रख्यात पर्यावरणविद दिनेश मिश्र ने कहा कि नदियां मां के समान हैं। हम नदियों को इतना उत्तेजित क्यों करते हैं कि वह हमारा (अपने बच्चों का) वध करने पर उतारू हो जाए? नदियों से कम छेड़छाड़ करें। आज का परिवेश शोषक का है। हमें नदियों के रुप में संसाधन दिखता है। जब नदी को मां मान लिया तो एक मां को भला संसाधन के रुप में कौन देखता है? एक मां कभी भी संसाधन नहीं हो सकती। हम नदियों से फायदा उठाते रहे हैं। पहले एक मर्यादा थी। उसकी एक सीमा थी। अब वह सीमा खत्म हो गई। हमने मर्यादा की सीमा तय नहीं की। परिवेश बेहद खराब हो गया है। हमें पहाड़ों का भी दोहन नहीं करना चाहिए। जल बिरादरी के राष्ट्रीय संयोजक बोलिशेट्टी सत्यनारायणा ने कहा कि हमें पहाड़ों को हर हाल में बचाना ही होगा। पहाड़ नहीं रहेंगे तो बारिश नहीं होगी। बारिश नहीं होगी तो पानी कहां से आएगा। इस देश के नौजवानों से अपील है कि वो आगे आएं और इस समस्या का समाधान करें। वही इस देश को बचा सकते हैं। वही नदी और पर्वत को बचा सकते हैं। आईआईटी (आईएसएम, धनबाद) के मिशन वाई के संयोजक प्रोफेसर अंशुमाली ने कहा कि दामोदर नदी की लंबाई 70 फीसद कम हो गई है। यह ठीक नहीं है। हमें उसकी लंबाई को उसके पुराने स्वरूप में लाना होगा, बढ़ाना होगा। स्वागत भाषण युगांतर प्रकृति के अध्यक्ष अंशुल शरण ने दिया। उन्होंने उपस्थित अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि भारत में पर्वतों-नदियों पर कोई कानून नहीं बना है इसीलिए आज पर्वतों-नदियों की दशा दयनीय हो गई है। दुनिया भर में पांच-छह देश ही ऐसे हैं, जिन्होंने पहाड़ों-नदियों को संरक्षित करने के लिए जरूरी कदम उठाए, कानून बनाए हैं। इसके पूर्व सर्वोच्च न्यायालय के सेवानृवित्त न्यायाधीश वी. गोपाला गौड़ा का स्वर्णरेखा क्षेत्र विकास ट्रस्ट के ट्रस्टी आशुतोष राय ने, राजेंद्र सिंह का सुधीर सिंह ने, सरयू राय का पिंटू सिंह ने, बोलिशेट्टी सत्यनारायणा का नीरज सिंह ने, दिनेश मिश्र का शेषनाथ पाठक ने, अशोक गोयल का अमृता मिश्रा ने, अंशुल शरण का विश्वजीत ने शाल, स्मृतिचिन्ह और पौधा देकर स्वागत किया। मंच संचालन मनोज सिंह ने जबकि आभार प्रदर्शन वरिष्ठ समाजसेवी तथा स्वर्णरेखा क्षेत्र विकास ट्रस्ट के ट्रस्टी अशोक गोयल ने किया। पत्रकार दीपक पर्बतियार ने कहा कि पर्यावरण से संबंधित कानून तो बनते हैं पर फिर हालात वैसे ही हो जाते हैं, जो पहले थे। दरअसल, यह बात लोगों को समझनी होगी कि पहाड़, कानूनों को नहीं जानते। डॉ. रामबूझ ने कहा कि नदियां प्रदूषित हो गई हैं। हमारे संविधान में लिखा गया है कि इंसानों को नदियों को खराब नहीं करना है, प्रदूषित नहीं करना है लेकिन ये तो खराब हैं, प्रदूषित हैं। डॉ. राकेश कुमार सिंह ने कहा कि पर्यावरण से संबंधित कई कानून हैं। इन कानूनों के रहते न पहाड़ बच रहे हैं, न ही कोई नदी। इसके पीछे का मूल कारण यह है कि इनकी मॉनीटरिंग करने वाले संस्थान ही फेल कर गए हैं। खास कर राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड तो पूरी तरह फेल है। इनकी डिजाइन ही ऐसी है, जिसमें इन्हें फेल करना ही है। 31 मार्च को जमशेदपुर में टनों टन मछलियां मर गईं। पब्लिक के बीच से कोई आवाज नहीं उठी। डॉ. समीर ने कहा कि हमें इस बात पर काम करना होगा कि नदी को स्वस्थ कैसे बनाया जाए। हमें सोचना होगा कि नदी न कटे। उन्होंने गंडक नदी पर फोकस्ड प्रजेंटेशन भी दिया। डॉ. पीयूष कांत पांडेय ने कहा कि पहाड़ों और नदियों के लिए कानून बनना ही चाहिए। आपको पता होना चाहिए कि अगर पहाड़ न हों तो जल भी नहीं होगा। उन्होंने हिमालय को नया पहाड़ बताया और यह भी कहा कि हिमालय से 60 गुना पुराने पहाड़ आज भी भारत में हैं। वरिष्ठ पत्रकार विवेक कुमार तिवारी ने कहा कि शोध और रिपोर्ट बताते हैं कि अब सारंडा के जंगलों में मिलने वाले साल के पेड़ भी खतरे में हैं। सारंडा के अंदर जबरदस्त माइनिंग कर उसे खोखला कर दिया गया। वहां तो अब पेड़ सूख भी रहे हैं। उन्होंने सवाल किया कि कानून के बन जाने भर से नदियां और पहाड़ कैसे बच सकेंगी? सम्मेलन के दौरान राजेंद्र सिंह ने कहा-जब मैंने अपनी टीम से कहा कि जमशेदपुर में नदी पर्वत कानून को लेकर सम्मेलन में जा रहा हूं तो लोगों ने कहा कि पगला गये हैं क्या। जमशेदपुर क्यों जा रहे हैं। मैंने उन्हें जवाब दिया कि पूरे देश में सिर्फ सरयू राय ही एकमात्र ऐसे विधायक हैं जिन्हें सत्ता से मोह नहीं है। वह न मंत्री बनना चाहते हैं, न पॉवर दिखाना चाहते हैं। वह इकलौते ऐसे विधायक हैं जो भ्रष्टाचार, पर्यावरण के मुद्दे पर सीधे सीधे लोगों से भिड़ जाते हैं। इतने बड़े आंदोलन को चलाने के लिए सत्तासुख चाहने वाले नहीं, सत्ताविमुख इंसान की जरूरत है। सरयू राय मेरे पांच दशक पुराने मित्र हैं। सम्मेलन में पूर्व मंत्री और कई पुस्तकों के लेखक सरयू राय की नई पुस्तक चेंजिंग फेस ऑफ सारंडा का विमोचन किया गया।यह पुस्तक अंग्रेजी में है। इसमें सारंडा में आए परिवर्तन के बारे में जानकारी दी गई है। इसके अलावा स्मारिका का भी विमोचन किया गया। स्मारिका के संपादक अंशुल शरण हैं। वहीं प्रसेनजीत सरकार, शिवम ठाकुर और आकाश जायसवाल द्वारा खरकई नदी पर लिखी गई पुस्तक का अतितियों ने विमोचन किया। (यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है) .../ 25 मई /2026