-अस्पताल की लापरवाही पर पर्दा, बेकसूर डॉक्टर बना बलि का बकरा! -राजनीतिक पहुंच के आगे नियम बेबस? -कौन है असली जिम्मेदार? जांच के घेरे में पूरा सिस्टम -मरीज कोमा में, जिम्मेदार बाहर, किसके संरक्षण में चल रहा अस्पताल? बालाघाट (ईएमएस)। सरदार पटेल मल्टीस्पेशलिटी अस्पताल से जुड़ा मामला अब सिर्फ चिकित्सकीय लापरवाही तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसमें सत्ता, संरक्षण और जिम्मेदारी से बचने के गंभीर आरोप भी जुड़ते नजर आ रहे हैं। जांच में लापरवाही सामने आने के बावजूद अस्पताल प्रबंधन पर कार्रवाई न होना कई सवाल खड़े कर रहा है। अस्पताल की लापरवाही पर पर्दा डालकर बेकसूर डॉक्टर को बलि का बकरा बना दिया गया है। राजनीतिक पहुंच के आगे नियम-कानून-कायदे पूरी तरह से बेबस नजर आ रहे हैं। मरीज कोमा में है, लेकिन असली जिम्मेदार अभी तक बाहर है। अब पूरा सिस्टम जांच के घेरे में है। सरदार पटेल मल्टीस्पेशलिटी अस्पताल का विवाद अब नया मोड़ लेता दिखाई दे रहा है। एक ओर जहां अस्पताल की लापरवाही से युवक विवेक तिरपुड़े जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रहा है, वहीं दूसरी ओर पूरे मामले में जिम्मेदारी तय करने के बजाय एक होम्योपैथिक डॉक्टर को बलि का बकरा बनाए जाने के आरोप सामने आ रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक, अस्पताल का ऑन रिकॉर्ड संचालक वीरेश्वर सिंह है, लेकिन अस्पताल के लेटर पैड में बीएचएमएस डॉक्टर हितेश कावड़े को संचालक और प्रबंधक दर्शाया गया। इसी आधार पर पुलिस ने डॉ. कावड़े के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली, जबकि असली जिम्मेदारी तय करने में सवाल उठ रहे हैं। सरदार पटेल मल्टीस्पेशलिटी अस्पताल का यह मामला अब सिर्फ एक मेडिकल लापरवाही नहीं, बल्कि सिस्टम की पारदर्शिता और जवाबदेही की परीक्षा बन चुका है। अब देखना होगा कि जांच सच्चाई तक पहुंचती है या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा। नियमों को ताक पर रखकर इलाज? जानकारी के अनुसार, शासन के स्पष्ट नियम हैं कि होम्योपैथिक चिकित्सक एलोपैथिक पद्धति से इलाज नहीं कर सकता। इसके बावजूद अस्पताल में बीएचएमएस डॉक्टर द्वारा एलोपैथिक उपचार किए जाने की बात सामने आई है। यह न केवल नियमों का उल्लंघन है, बल्कि मरीजों की जान से खिलवाड़ भी माना जा रहा है। स्वास्थ्य विभाग की जांच में एनेस्थीसिया से जुड़े चिकित्सकों के साथ डॉ. कावड़े का नाम भी सामने आया, लेकिन सवाल यह है कि क्या वह केवल प्रबंधन से जुड़े थे या वास्तव में उपचार में भी सक्रिय भूमिका निभा रहे थे? अस्पताल पर कार्रवाई क्यों नहीं? सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब जांच में अस्पताल की लापरवाही सामने आ चुकी है, तो अब तक उसका पंजीयन निरस्त क्यों नहीं किया गया? क्या प्रभावशाली लोगों की पहुंच के कारण कार्रवाई दबाई जा रही है? स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि सरदार पटेल विश्वविद्यालय के कुलाधिपति दिवाकर सिंह के प्रदेश के अनेक मंत्रियों से काफी करीबी संबंध है। जिसके कारण उन्हें पूरी तरह से संरक्षण प्राप्त है। राजनीतिक संरक्षण के चलते ही मुख्य संचालक के खिलाफ मामला दर्ज नहीं हुआ, जबकि एक जूनियर डॉक्टर को सामने कर दिया गया। डॉ मनोज पांडे को बालाघाट लाने की तैयारी? मामले में एक और बड़ा पहलू सामने आया है। चर्चा है कि पूर्व मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. मनोज पांडे को दोबारा बालाघाट लाने की तैयारी की जा रही है। सरदार पटेल विश्वविद्यालय के कुलाधिपति दिवाकर सिंह अपने राजनीतिक पहुंच के दम पर अब पुन: डॉ मनोज पांडे को बालाघाट लाना चाहते हैं। डॉ मनोज पांडे वर्तमान समय में डिंडौरी जिले में पदस्थ है। दरअसल, डॉ मनोज पांडे और दिवाकर सिंह के आपस में काफी करीबी संबंध है। अनेक सामाजिक और पारिवारिक कार्यक्रमों में डॉ मनोज पांडे, दिवाकर सिंह, वीरेश्वर सिंह को एक साथ देखा गया है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि दिवाकर सिंह और डॉ मनोज पांडे के बीच कितना याराना है। डॉ. मनोज पांडेय लगभग तीन वर्षों तक बालाघाट में मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी के पद पर पदस्थ रहे। डॉ. मनोज पांडेय के कार्यकाल में सरदार पटेल मल्टी स्पेशलिस्ट हॉस्पिटल एवं नर्सिंग कॉलेज को विभिन्न प्रकार की एनओसी, अनुमति एवं मान्यताएं जारी की गई थीं। आरोप है कि इन अनुमतियों एवं मान्यताओं को जारी करने में नियमों और निर्धारित मानकों की कथित रूप से अनदेखी की गई। इसी कारण दिवाकर सिंह द्वारा डॉ मनोज पांडे को बालाघाट लाने का प्रयास कर रहे हैं। ताकि अस्पताल से जुड़े सभी नियम विरुद्ध कार्यों में पर्दा डाला जा सकें। जांच पर असर की आशंका स्थानीय लोगों और जानकारों का मानना है कि यदि डॉ मनोज पांडे बतौर सीएमएचओ बालाघाट में पदस्थ होते हैं तो सरदार पटेल मल्टीस्पेशलिटी अस्पताल और नर्सिंग कॉलेज से जुड़ी जांच प्रभावित हो सकती है। इससे पूरे मामले की निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो सकते हैं। सवाल जो जवाब मांगते हैं जब लापरवाही साबित हो चुकी, तो अस्पताल पर कार्रवाई क्यों नहीं? असली संचालक के बजाय दूसरे को आरोपी क्यों बनाया गया? क्या नियमों का उल्लंघन जानबूझकर नजरअंदाज किया गया? क्या राजनीतिक दबाव जांच को प्रभावित कर रहा है?