लेख
29-May-2026
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पिछले कुछ दिनों से मेरे कई पाठक दोस्त मुझे कह रहे थे कि आपने अभी तक ‘‘कॉकरोच’’ (जो बिल से बाहर निकल गया हैं’’) पर लेख नहीं लिखा? जो इस समय देश में ही नहीं विदेशों में भी बहुचर्चित (hot) व छाया हुआ है। ऐसा नहीं कि मैंने इस पर लेख लिखने का सोचा नहीं। परन्तु जब भी लेख लिखने की सोचता था, तो मुझे यह लगा कि इस पर लिखना उसी ‘‘कॉकरोच’’ को जनता के बीच में और अधिक प्रकाश में लाना होगा, जिसका मूल चरित्र ही अंधेरे में रहना है, जो ‘‘अंधकार से प्रकाश’’ में नहीं आना चाहता है। इसलिए पहले कॉकरोच का मूल चरित्र क्या है, उसको जान लें। ‘‘ *कॉकरोच एक कीट * ’’। ‘‘जैविक प्राणी’’ के रूप में ‘‘कॉकरोच’’ को हिंदी में ‘‘तिलचट्टा’’ कहा जाता है। यह पृथ्वी पर डायनासोर के समय (लगभग 35 करोड़ साल पुराना) से मौजूद एक कीट है। विपरीत परिस्थिति में भी जीवित रहने की उसकी क्षमता अद्भुत मानी जाती है। यह बिना सिर के कई दिनों तक और 40 मिनट तक सांस रोक कर पानी में जिंदा रह सकता है। अंधेरे और गंदगी का प्रतीक यह नमी वाली और गंदी जगहों (जैसे नालियों और कचरे) में छुपकर रहता है। यह ‘‘रात’’ में सक्रिय होता है, खाना खराब करता है, और बैक्टीरिया फैलाकर बीमारियां व बदबू लाता है। ‘‘ राजनीतिक/सामाजिक संदर्भ ’’। आज ‘‘कॉकरोच’’ शब्द का इस्तेमाल राजनैतिक व्यंग और आलोचना के लिए किया जा रहा है। रूपक (Metaphor) में कॉकरोच उसे कहा जाता है, जो ‘‘अंधेरे में वार करता है’’, बनी-बनाई व्यवस्था को नुकसान पहुँचाता है, सड़न से पनपता है और समाज में गंदगी (नकारात्मकता या दुर्भावना) फैलाता है। ‘‘कॉकरोच जनता पार्टी’’ की चर्चा हाल ही में सोशल मीडिया (खासकर इंस्टाग्राम) पर ‘‘कॉकरोच जनता पार्टी’’ नाम से एक अभियान/पेज वायरल हुआ है। यह राजनीतिक दलों पर व्यंग्य, पॉलिटिकल नैरेटिव, और ‘‘मीम्स’’ के रूप में काफी चर्चा बटोर रहा है, जो सदैव नकारात्मक प्रतीक के रूप में देखा जाता है। यंग की *व्यंग्य राजनीति? अथवा राजनीति का व्यंग्य* कहा जाता हैजब शब्द या संवाद कमजोर पड़ जाते हैं, तब व्यंग जन्म लेता है। भारतीय राजनीति में प्रतीकों, उपमाओं और व्यंग्यों का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। कभी “चायवाला”, गद्दार, गोदी मीडिया कभी “पप्पू”, कभी “आंदोलनजीवी”, परजीवी, तो कभी देशद्रोही, पाकिस्तानी,“” — राजनीतिक विमर्श में शब्द अब विचारधारात्मक हथियार बन चुके हैं। यह एक राजनीतिक शब्दावली व भाषा का पतन भी दिखलाता है। इसी क्रम में इन दिनों सोशल मीडिया पर उभरा नाम — “कॉकरोच जनता पार्टी” — अचानक राष्ट्रीय बहस एवं अंतर्राष्ट्रीय चर्चा का हिस्सा बन गया है। पहली नजर में यह केवल एक व्यंग्यात्मक सोशल मीडिया अभियान प्रतीत होता है, लेकिन यदि गहराई से देखें तो यह व्यवस्था से निराश युवा मन की बेचैनी, कटाक्ष और मौन प्रतिरोध का प्रतीक बनता दिखाई देता है। कुमार विश्वास का तंज। ‘‘कॉकरोच जनता पार्टी’’ पर ‘‘विश्वास’’ ने अविश्वसनीय रूप से तंज कसते हुए व्यंग्यात्मक टिप्पणी की है। कुमार ने ‘‘सुकुमार’’ टिप्पणी न करते हुए ‘‘अविश्वास’’ की खाई को और बढ़ा दिया। देहरादून में एक कार्यक्रम में पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा बचपन में उनकी मां ने बताया था कि ‘‘यह बनी-बनाई सुंदर चीजों और व्यवस्थाओं को नष्ट करता है’’। उन्होंने आगे कहा ‘‘अगर कॉकरोच बने है, तो ‘‘हिट’’ भी बने हैं। कई ‘‘हिट’’ का कार्य कर रहे है। बंगाल या दिल्ली की तरह उनका इलाज हो जायेगा। यहां यह उल्लेखनीय है कि ‘‘हिट’’ कॉकरोच कीटनाशक का नाम है। वैसे विश्वास मीडिया में ‘‘हिट’’ होने के लिए इस तरह की टिप्पणी करते रहते हैं। ‘‘केजेपी की स्थापना*। उच्चतम न्यायालय की तल्ख टिप्पणी से निकली कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी, शाब्दिक अर्थ ‘‘कॉकरोच जन दल’’) एक भारतीय ‘‘व्यंग्यात्मक’’ स्टेटिकल, राजनैतिक आंदोलन है। इसकी स्थापना 16 मई 2026 को महाराष्ट्र के संभाजी नगर के मूल निवासी 30 वर्षीय अभिजीत दिपके, जो एक राजनीतिक संचार रणनीतिकार हैं, द्वारा सोशल मीडिया ‘‘इंस्टाग्राम’’ पर की गई थी। वे पहले आम आदमी पार्टी की सोशल मीडिया टीम के साथ काम कर चुके हैं। वर्तमान में वे अमेरिका के बोस्टेन में रह रहे हैं, जहां उन्होंने जनसंपर्क में मास्टर डिग्री पूरी की है। वर्तमान में केजेपी पार्टी के 3 करोड़ अनुयायी सोशल मीडिया पर हैं। सरकार की सुरक्षा एजेंसी ने इन्हें देश की सुरक्षा के लिए खतरा बताया है। इसलिए केजेपी के इंस्टाग्राम पर प्रतिबंध लगा दिया। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर भी प्रतिबंध के साथ वेबसाइट को भी ब्लॉक कर दिया गया है। इन सब प्रतिबंधों को दिल्ली उच्च न्यायालय में संस्थापक अभिजीत दिपके ने चुनौती दी है। उच्चतम न्यायालय में सीजेपी के विरुद्ध याचिका। याचिकाकर्ता एडवोकेट राजा चौधरी ने उच्चतम न्यायालय के समक्ष ‘‘सीजेपी’’ पार्टी के विरुद्ध इस आधार पर याचिका दायर की, कि इससे न्यायिक कार्यवाही को वायरल स्पेक्टेकल (तमाशा) में बदल दिया, जो न्यायालय की संस्थागत छवि को नुकसान पहुंचाता है। साथ ही कानून की फर्जी डिग्री के विरूद्ध सीबीआई जांच की मांग की गई। मुख्य न्यायाधीश न्यायाधिपति सूर्यकांत ने याचिका पर तुरंत सुनवाई से इनकार करते हुए वकील को कहा ‘‘इतना भावुक मत होइए’’, ‘‘इसे इतना संवेदनशील रूप से न लीजिए’’। यह लोकतंत्र का नया चेहरा है? जहां राजनीतिक दलों से निराश युवा अब पारंपरिक आंदोलन की बजाए “मीम”, “ट्रोल”, “व्यंग्य” और “डिजिटल प्रतीकों” के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहा है। यह स्थिति सत्ता व विपक्ष दोनों के लिए चिंतन का विषय है। ‘ ‘काॅकरोच बनाम सत्तारूढ़ भाजपा’’। जो लोग सत्ताधारी पार्टी के खिलाफ ‘‘कॉकरोच’’ को एक खतरा बता रहे हैं, वे वास्तव में गलत आकलन कर रहे हैं। जनता का ‘‘कॉकरोच’’ बना रहना सत्ताधारी पार्टी भाजपा के हित में ही है। याद कीजिए! यूपीए सरकार में जो पेट्रोल 70 रुपये के पास और गैस सिलेंडर रू. 400 के आस-पास होते थे, तो बैलगाड़ी से जाकर और सिलेंडर को रोड पर ले जाकर प्रदर्शन कर विरोध किया जाता था। तब वह जनता जिसे आज ‘‘कॉकरोच’’ कहा जा रहा है, ‘‘बिल’’ से बाहर आ गई थी और अंततः सरकार 2014 में पलट गई थी। आज वही जनता 110 रुपए लीटर पेट्रोल रू.1000 गैस सिलेंडर रू.3000 कमर्शियल सिलेंडर पर बिल के अंदर छुपी हुई है। रोड़ पर न कोई बैलगाड़ी दिख रही है, न कोई सिलेंडर दिख रहा है। जनता नाराज है, लेकिन मुखर नहीं। बल्कि जनता चुपचाप लाइन लगाकर पेट्रोल और सिलेंडर ले रही है। शायद वह अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों को जानकर मजबूर है। कृपया जनता को कॉकरोच बने रहने दीजिए! सरकार आराम से चलती रहेगी। आप क्यों इतने उतावले हो रहे हैं? ‘‘कॉकरोच बनने से रोकने के लिए’’? मैं हमेशा कहता हूं हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। इस प्रकार कॉकरोच के भी दो पहलू है। लाभ और हानि। आधा गिलास भरा है या खाली यह आपकी सोच पर निर्भर करता है। जिस परिस्थिति में आप रहते हैं, जिस विचारों से आप गुंथे रहते हैं, उस सोच के अनुसार आप कॉकरोच को लाभप्रद या हानि सूचक निर्धारित कर सकते हैं। आंदोलन जीवी, परजीवी एवं कॉकरोच । 2021 में प्रधानमंत्री मोदी ने देश के किसान आंदोलनकारियों को आंदोलन जीवी व ‘‘परजीवी’’ कहा था। मई 2026 में मुख्य न्यायाधीश ने कुछ बेरोजगार युवाओं फर्जी डिग्री वालों को कॉकरोच व परजीवी की संज्ञा दी। आज बेरोजगारी से परेशान व्यवस्था से असंतुष्ट, युवा को ‘‘काॅकरोच’’ कहा जा रहा है। लेकिन आप यह भूल जाते है कि कॉकरोच ‘‘परजीवी’’ नहीं होता है, बल्कि ‘‘सफाई वर्ग’’ की भूमिका निभाता है। परिस्थितियों में बदलाव। कभी जानवरों की तुलना इंसान से की जाने वाली समय की तुलना में आज इंसान की तुलना ‘‘कीटों’’ से की जा रही है। शायद इसलिए कि इंसान इसी श्रेणी की दिशा की ओर अग्रेषित हो रहा है? जानवरों से तुलना सदियों से आम रही है। सकारात्मक शेर (बहादुर), गिद्ध (चालाक), लोमड़ी (चतुर), बैल (मेहनती)। नकारात्मक साँप (धोखेबाज), कुत्ता, गधा, सूअर आदि। साहित्य, राजनीति और इतिहास में इंसानों को जानवरों से जोड़कर उनकी प्रकृति समझाई जाती थी। ‘‘अरस्तू’’ ने इंसान को “राजनीतिक प्राणी” कहा था, जो सकारात्मक था। निष्कर्ष। ऐसा पहली बात प्रतीत होता है कि जनता स्वयं अपने लिए व्यंगात्मक पहचान स्वीकार करने लगी है, जो लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय भी है और चेतावनी भी। स्पष्ट है, युवा वर्ग निराशा और दिशाहीन दिशा की ओर जा रहा है, जिसे इस गर्त से निकालने की आवश्यकता वर्तमान नेतृत्व की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। उम्मीद है, भविष्य में स्थितियां सुधरेंगी। (लेखक, कर सलाहकार एवं पूर्व अध्यक्ष, बैतूल सुधार न्यास हैं) ईएमएस/29/05/2026