लेख
29-May-2026
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नेशनल स्टॉक एक्सचेंज की जो ताजा रिपोर्ट प्रकाशित हुई है। उसके अनुसार भारतीय शेयर बाजार में पिछले तीन माह में भारी उतार चढ़ाव के कारण निवेशकों के 13 लाख करोड रुपए शेयर बाजार में डूब गए हैं। चौथी तिमाही में निफ्टी 50 में 10 फीसदी से ज्यादा की गिरावट देखने को मिली है। भारतीय शेयर बाजार में जिस तरह की गिरावट निरंतर बनी हुई है। उसने भारत के संस्थागत निवेशक वित्तीय संस्थान बैंक और भारतीय जीवन बीमा निगम की चिंताऐं तेजी के साथ बढ़ती जा रही है। ईरान और अमेरिका के बीच जिस तरह से तनाव बना हुआ है। यह आगे और बढ़ता हुआ दिख रहा है। दुनिया के अधिकांश देशों में ऊर्जा संकट लगातार बढ़ रहा है। ऊर्जा संकट के कारण अर्थव्यवस्था में भारी उथल-पुथल देखने को मिल रही है। ऊर्जा संकट ने पूरी दुनिया में एक अलग तरह के आर्थिक संकट को जन्म दिया है। कच्चे तेल और गैस इत्यादि के बढ़ते दाम, उपलब्धता में लगातार कमी से शेयर बाजारों को बुरी तरह से प्रभावित किया है। विदेशी निवेशक भारत से अपना निवेश निकलकर भाग रहे हैं। 2026 एनएसई की जो रिपोर्ट प्रकाशित हुई है।उसके अनुसार सूचीबद्ध कंपनियों में घरेलू निवेशकों की कुल हिस्सेदारी बढ़ती जा रही है। विदेशी निवेशक लगातार कई वर्षों से मुनाफा वसूली कर रहे थे। भारत का पैसा मुनाफे के रूप में विदेशों में चला गया है। विदेशी निवेश लगातार निकलने के कारण वहीं विदेशी निवेशकों की हिस्सेदारी न्यूनतम स्तर पर आ गई है। लगातार गिरावट के कारण भारत में घरेलू निवेशकों का फंड घटकर 76. 5 लाख करोड रुपए रह गया है. पिछली तिमाही के आधार पर लगभग 13 फ़ीसदी की गिरावट आई है। रिपोर्ट के अनुसार विदेशी पोर्टफोलियो में निवेशकों ने 19.6 अरब डॉलर भारतीय शेयर बाजार से निकाल लिए हैं। सूचीबद्ध कंपनियों में विदेशी निवेशको की हिस्सेदारी घटकर 17 साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है। जो वर्तमान में चिंता का सबसे बड़ा कारण बन गया है। शेयर बाजार के साथ-साथ विदेशी मुद्रा का संकट भी भारत में बढ़ता चला जा रहा है। डॉलर के मुकाबले रुपए की कीमत लगातार गिर रही है। कच्चे तेल और गैस की कीमतें बढ़ने और डॉलर मुद्रा में भुगतान के कारण आर्थिक स्थिति में बड़ा दबाव देखने को मिल रहा है। चीन से आयात की तुलना में निर्यात बहुत कम है।युवान मुद्रा को लेकर भी लगातार भारतीय अर्थव्यवस्था संकट में फंसती चली जा रही है। आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है, डॉलर से ज्यादा खराब स्थिति युवान के कारण भारत की अर्थव्यवस्था को झेलना पड़ रही है। चीन से भारत का आयात निर्यात में अंतर बढ़ता चला जा रहा है। राजकोषीय घाटा लगातार बढ़ रहा है। भारतीय अर्थव्यवस्था दो पाटों के बीच में फंसकर रह गई है। डॉलर और युवान दोनों ही भारत के लिए चिंता का विषय बने हुए हैं। जिस तरह की स्थिति वर्तमान में बन रही है। उसने सभी अर्थशास्त्रियों को चिंता में डाल दिया है। डीजल और पेट्रोल की कीमतें चार बार बढ़ा दी गई हैं। इसका असर महंगाई पर पड़ रहा है। महंगा डीजल पेट्रोल महंगाई को बढ़ाने का काम कर रहा है। सरकार ने औद्योगिक कंपनियों के लिए डीजल का रेट बढ़ाकर 149 रुपए प्रति लीटर कर दिया है। औद्योगिक प्रतिष्ठानों को 54 रुपए प्रति लीटर ज्यादा भुगतान करना पड़ रहा है। इसका असर सभी उत्पाद पर पड़ रहा है। ऐसी स्थिति में आने वाले दिनों में अर्थव्यवस्था का संकट सभी के लिए घातक सिद्ध हो सकता है। शेयर बाजार और भारतीय अर्थव्यवस्था में जिस तरह की नकारात्मकता देखने को मिल रही है। उसको देखते हुए यही कहा जा सकता है। सरकार ने वास्तविकता को स्वीकार करते हुए यदि कठोर निर्णय नहीं लिए तो स्थिति बद से बदतर हो सकती है। केंद्र सरकार और रिजर्व बैंक को स्थितियों का मुकाबला करने के लिए जिस तरह के प्रयास करने चाहिए, उस तरह के प्रयास कहीं से भी होते हुए नही दिख रहे हैं। उल्टा सरकार वर्तमान स्थिति का मुकाबला आंख मूंदकर, भगवान भरोसे संकट के समय मुंह मोड़ रही है। उसके कारण स्थिति दिनों दिन खराब हो रही है। सरकार अभी भी यह मानकर चल रही है। कुछ दिनों के बाद स्थिति ठीक हो जाएगी। स्थिति ठीक होने के स्थान पर दिन प्रतिदिन खराब होती जा रही है।सरकार को गंभीरता से वर्तमान स्थिति पर विचार करना चाहिए। आम जनता और विपक्ष को वास्तविक स्थिति से अवगत कराते हुए, संकट का सामना किस तरह से करना है। इसके लिए सभी को विश्वास में लेना जरूरी है। ईएमएस / 29 मई 29