लेख
29-May-2026
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- हिंदी पत्रकारिता दिवस पर विशेष लेख उत्तराखंड में हाल ही में हेम भट्ट नामक वरिष्ठ पत्रकार को पुलिस ने रात में 4 बजे घर में पत्नी व बच्चों के सामने बेइज्जत कर उठा लिया और घसीटते हुए उन्हें थाने ले गए।उनका कसूर सिर्फ इतना था कि उन्होंने सरकार के विरुद्ध जहर उगल रहे सत्ता से ही जुड़े एक विधायक का इंटरव्यू किया था,हालांकि पुलिस का कहना है कि उन्हें किसी अपराधी के द्वारा उनका नाम लेने पर उठाया गया।बाद में शायद सरकार को अपनी गलती का एहसास हुआ तो मुख्यमंत्री स्वयं पीड़ित परिवार से मिलने उनके घर गए।इसी तरह उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में एक डिजिटल चैनल से जुड़े पत्रकार प्रद्युमन कौशिक के खिलाफ पुलिस द्वारा दर्ज मुकदमे के विरोध में पत्रकारों ने एकजुट होकर आवाज बुलंद की है। प्रद्युमन कौशिक के खिलाफ दर्ज मुकदमें को कथित तौर पर फर्जी और मनगढ़ंत बताया गया है, जिसका उद्देश्य पत्रकारिता की आवाज को दबाना है। इस घटना से गुस्साए पत्रकारों ने आरोप लगाया कि यदि इस तरह निष्पक्ष पत्रकारिता करने वालों पर दबाव बनाने के लिए मुकदमे दर्ज किए जाएंगे तो यह लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए गंभीर खतरा होगा।पत्रकारों के उत्पीड़न की घटनाओं में शारीरिक हमले, धमकियां, फर्जी आपराधिक मुकदमे , गैरकानूनी गिरफ्तारियां और महिला पत्रकारों के खिलाफ ऑनलाइन दुर्व्यवहार आदि शामिल हैं। पत्रकारों द्वारा सच उजागर करने, भ्रष्टाचार और व्यवस्थागत खामियों को सामने लाने वाले पत्रकारों को अक्सर निशाना बनाया जा रहा है।उत्तर प्रदेश के कानपुर क्षेत्र में, जब पत्रकारों ने सरकारी स्कूलों की बदहाल स्थिति को कैमरे में कैद करने का प्रयास किया, तो उन्हें स्थानीय अधिकारियों द्वारा बंधक बना लिया और उनके साथ जमकर दुर्व्यवहार किया।ऐसे में पत्रकार व पत्रकारिता कैसे निष्पक्ष व सुरक्षित रहे,यह आज हमें सोचना होगा।हम गणेश शंकर विद्यार्थी को अपना आदर्श मानते है।कुछ लोग महर्षि नारद को प्रथम पत्रकार बताकर उन जैसा देवत्व पत्रकारों में लाने की बात करते है,लेकिन सच यह है कि आज न पत्रकार सुरक्षित है और न ही पत्रकारिता।पुलिस थानों के काले सच को उजागर करने पर उत्तर प्रदेश के मेरठ में एक महिला पुलिस अधिकारी ने तो सीधा फरमान जारी कर दिया था कि जो पत्रकार थाने की वीडियोग्राफी करे उसके विरुद्ध मुकदमा दर्ज किया जाए।वह तो भला हो हाई कोर्ट का ,जिसने पुलिस थाने की सीसीटीवी फुटेज आमजन के द्वारा मांगने को एक अधिकार की संज्ञा दी।आज सच यही है कि जो पत्रकार शासन,प्रशासन के पक्ष में है वही सुरक्षित है और जिसने जरा भी खिलाफ लिखा तो फिर उसकी खैर नही।ऐसे में पत्रकारिता कैसे बचें,यह भी हम सबको मिलकर सोचना होगा।सरकार की उपेक्षा और घटती पठनीयता से इतिहास बनती हिंदी पत्रकारिता को बचाने के लिए आज विचार करने की आवश्यकता है। हमे सोचना चाहिए कि वास्तव में सुबह का अखबार कैसा हो? समाचार चैनलों पर क्या परोसा जाए? क्या नकारात्मक समाचारों से परहेज कर सकारात्मक समाचारों की पत्रकारिता संभव है ?क्या हम धार्मिक समाचारों को समाचार पत्रों में स्थान देकर पाठको को चारित्रिक रूप से सम्रद्ध बना सकते है? व्यक्तिगत एवं राष्टृीय उन्नति के लिए उज्जवल चरित्र व सांस्कृतिक निर्माण के सहारे सकारात्मक समाचारों को प्राथमिकता देकर मीडिया सामग्री में व्यापक बदलाव लाने का काम कर सकते है?। विकास व चरित्र निर्माण से सम्बन्धितसमाचारों,स्वच्छता,संस्कृति,नैतिकता और आध्यात्मिक मूल्य जैसे मुददों का समावेश कर स्वस्थ पत्रकारिता का लक्ष्य निर्धारित करने की भी पहल की जा सकती है,यदि हां तो तभी पत्रकारिता में गिरते मूल्यों को बचाने में हम सफर हो सकते है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार और स्वतंत्रता सेनानी परिवार कल्याण महापरिषद के राष्ट्रीय प्रवक्ता है) ईएमएस / 29 मई 26