अलीगढ़ (ईएमएस)। एएमयू ने अपने प्रतिष्ठित पूर्व छात्र, महान उर्दू शायर, शिक्षाविद और पद्मश्री सम्मानित डॉ. बशीर बद्र के निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया है। डॉ. बद्र का गत 28 मई 2026 को भोपाल में लंबी बीमारी के बाद 91 वर्ष की आयु में निधन हो गया था। आधुनिक उर्दू शायरी की सबसे प्रभावशाली आवाजों में शुमार डॉ. बशीर बद्र अपने पीछे एक ऐसी साहित्यिक विरासत छोड़ गए हैं जिसने पीढ़ियों और भौगोलिक सीमाओं से परे करोड़ों लोगों के दिलों को छुआ। अपनी सरल लेकिन अत्यंत प्रभावशाली गजलों के लिए प्रसिद्ध डॉ. बद्र ने रोजमर्रा की भावनाओं और बोलचाल की भाषा को उर्दू शायरी का हिस्सा बनाकर उसे आम पाठकों तक पहुँचाया। उनके मशहूर शेर, “लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में” तथा “उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए” उपमहाद्वीप की सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा बन चुके हैं। सन् 1935 में अयोध्या में जन्मे डॉ. बशीर बद्र का एएमयू से आजीवन गहरा संबंध रहा। उन्होंने विश्वविद्यालय से एमए और पीएचडी की डिग्रियाँ प्राप्त कीं तथा बाद में उर्दू विभाग में व्याख्याता के रूप में सेवाएँ भी दीं। इसके पश्चात वे मेरठ कॉलेज चले गए। यह उनके असाधारण साहित्यिक कौशल का प्रमाण था कि छात्र जीवन में ही उनकी शायरी एएमयू के स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में शामिल कर ली गई थी। उनके निधन पर शोक व्यक्त करते हुए एएमयू परिवार को उनका एक और प्रसिद्ध शेर याद आ रहा है- “कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी, यूँ कोई बेवफा नहीं होता।” उनके निधन के साथ उर्दू साहित्य का एक युग समाप्त हो गया, किंतु उनके शब्द आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणा और प्रकाश का स्रोत बने रहेंगे। एएमयू बिरादरी ने उनके निधन पर गहरा दुःख व्यक्त करते हुए दिवंगत आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की है। ईएमएस/धर्मेन्द्र राघव/ 30 मई 2026