- गीता भवन में स्वामी भास्करानंद के सानिध्य में भागवत ज्ञान यज्ञ संपन्न, फूलों की होली के बीच महामंडलेश्वर का सम्मान इंदौर (ईएमएस)। धर्मयुक्त जीवन और सदाचार से ही सुमति का प्रवेश संभव है। भागवत वह अनुपम और विलक्षण ग्रंथ है जिस पर अनेक शोध ग्रंथ लिखे जा चुके हैं, इसके बावजूद आज तक कोई भी इस दिव्य और अनूठे ग्रंथ की थाह नहीं ले पाया है। भागवत श्रवण की सार्थकता यही होगी कि हम भगवान की अमृतवाणी से निकले इस ग्रंथ से नई पीढ़ी को भी संस्कारित बनाएं और स्वयं भी अपने जीवन को सँवारने के इन अनमोल रत्नों को आत्मसात करें। सात दिनों तक हम तो कथा में बैठ लिए, अब इस कथा को भी अपने अंदर बिठाने की जरूरत है। यह प्रेरक विचार वृंदावन के महामंडलेश्वर स्वामी भास्करानंद ने शनिवार को व्यक्त किए। वे गीता भवन सत्संग सभागृह में पुरुषोत्तम मास के उपलक्ष्य में कमलादेवी-बाबूलाल मंगल की पुण्य स्मृति में गत 24 मई से चल रहे श्रीमद भागवत ज्ञान यज्ञ के सातवें व अंतिम दिन कृष्ण-सुदामा मैत्री सहित विभिन्न प्रसंगों की व्याख्या कर रहे थे। :: भजनों पर झूमते श्रद्धालुओं पर हुई पुष्प वर्षा :: कथा के समापन प्रसंग पर राधा-कृष्ण के संग फूलों की होली का मनोहारी आयोजन किया गया। इस दौरान पहले भगवान राधा-कृष्ण पर फूलों की वर्षा की गई और बाद में सत्संग सभागृह में बैठे श्रद्धालुओं का भी पुष्प वर्षा कर आत्मीय अभिनंदन किया गया। इस अनूठे उत्सव के दौरान पूरा पंडाल भक्ति के रंग में डूबा नजर आया। अंतिम दिन कथा सुनने के लिए श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी, जिसके चलते कई श्रोताओं को सभागृह के बाहर तक बैठना पड़ा। समिति द्वारा बाहर भी एलईडी स्क्रीन लगाकर कथा श्रवण की सुचारू व्यवस्था की गई थी। :: महामंडलेश्वर और साध्वी का हुआ बहुमान :: कथा समापन पर महामंडलेश्वर स्वामी भास्करानंद एवं साध्वी कृष्णानंद का शॉल-श्रीफल भेंटकर भावभीना सम्मान किया गया। आयोजन समिति की ओर से प्रमुख संयोजक संजय-किरण मंगल, बिनोद-सुनीता अग्रवाल, अविरल मंगल, समाजसेवी प्रेमचंद गोयल, बालकिशन छाबछरिया, विष्णु बिंदल, राजेश चेलावत, किशोर चेलावत, अशोक ऐरन, राजेश कुंजीलाल गोयल, राजेश गर्ग और शिव जिंदल ने व्यवस्थाएं संभालीं। विद्वान वक्ताओं की अगवानी अवनि-अनंत अग्रवाल, विनीता-अक्षत अग्रवाल, दीपचंद गर्ग मोमबत्ती, गोविन्द-राजश्री मंगल, गोपाल मंगल, अजय आलूवाले और विनोद गोयल ने की। :: धन संग्रह छोड़ मोक्ष की ओर ध्यान दें :: स्वामी भास्करानंद ने आगे कहा कि लंका भी सोने की नगरी थी और द्वारका को भी भगवान ने स्वर्ण नगरी के रूप में स्थापित किया था, लेकिन दोनों ही कुछ समय पश्चात नष्ट हो गईं। हम जीवनभर धन संग्रह की होड़ में जुटे रहते हैं, लेकिन अपने अंतिम ठिकाने अर्थात मोक्ष की ओर हमारा कोई ध्यान नहीं रहता। भागवत मृत्यु को मोक्ष में बदलने की कथा है। एक कान से सुनकर दूसरे से बाहर निकाल देना श्रवण नहीं है, बल्कि उसके संदेशों को आत्मसात करना ही श्रवण की सार्थकता होगी। यदि यहाँ बैठे हजारों लोगों में से दस लोगों ने भी भागवत के संदेशों को सुनकर अपना जीवन संवार लिया, तो यही इस आयोजन की वास्तविक सफलता होगी। इसके लिए मन को संयमित और सतर्क रखने की जरूरत है। प्रकाश/30 मई 2026 संलग्न चित्र - इंदौर। गीता भवन सत्संग सभागृह में चल रहे भागवत ज्ञान यज्ञ में समापन प्रसंग पर फूलों की होली का उत्सव मनाते श्रद्धालु।