- राष्ट्रीय मुक्त विद्यालय से प्रमाणित होंगी मंडला की आशा कार्यकर्ता, आशा व पर्यवेक्षक का हुआ प्रायोगिक परीक्षा और मौखिक साक्षात्कार मंडला (ईएमएस)। आदिवासी बाहुल्य मंडला जिले के ग्रामीण और शहरी अंचलों में स्वास्थ्य सेवाओं की जमीनी कमान संभालने वाली आशा कार्यकर्ताओं और पर्यवेक्षकों के कौशल को निखारने के लिए स्वास्थ्य विभाग ने एक महत्वपूर्ण पहल की है। राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान दिल्ली के माध्यम से मंडला जिले की चयनित आशा कार्यकर्ताओं के ज्ञान और कार्यक्षमता को परखने के लिए तीन चरणों वाली प्रमाणन परीक्षा आयोजित की गई। इस परीक्षा में जिले के आठ ब्लाकों से 152 आशा और पर्यवेक्षकों का चयन किया गया। जिसमें 149 ने परीक्षा में सहभागिता दर्ज की। जानकारी अनुसार इस प्रमाणन परीक्षा के दूसरे चरण के तहत जहां विगत दिवस उत्कृष्ट विद्यालय मंडला में लिखित परीक्षा संपन्न हुई थी, वहीं 28 मई को सर्टिफाइड आशा बनने के अंतिम व तीसरे चरण में कड़े मानकों के साथ प्रायोगिक परीक्षा और मौखिक साक्षात्कार लिया गया। इस परीक्षा के परिणाम आने के बाद सफल कार्यकर्ताओं को आधिकारिक प्रमाणपत्र मिलेगा, जिससे उनकी व्यावसायिक क्षमता को एक नई पहचान मिलेगी। डीसीएम हिमांशु सिंगौर ने बताया कि जिले में कार्यरत करीब 1271 आशाओं में से कठोर मानकों के आधार पर इस वर्ष 152 आशाओं व पर्यवेक्षकों को इस विशिष्ट परीक्षा के लिए नामांकित किया गया था। इस अंतिम चरण की परीक्षा में कुल 149 आशा कार्यकर्ता और पर्यवेक्षक शामिल हुईं, जबकि 3 परीक्षार्थी अनुपस्थित रहे। आठ ब्लॉक और एक अर्बन से शामिल हुई आशा, पर्यवेक्षक बताया गया कि आशा प्रमाणन परीक्षा में जिले के आठ विकासखंडों से आशा और पर्यवेक्षकों को चयनित किया गया था। जिसमें इस वर्ष 152 आशा और पर्यवेक्षकों का चयन तीन चरणों की परीक्षा के लिए किया गया। जिसमें 149 ही शामिल हुई। प्रायोगिक परीक्षा और मौखिक साक्षात्कार में विकासखंड नैनपुर से 22, बम्हनी से 21, नारायणगंज से 20, मंडला अर्बन से 20, बीजाडांडी से 19, घुघरी से 14, निवास से 13, मोहगांव से 12 और बिछिया से 08 परीक्षार्थी शामिल हुए। रटने पर नहीं, व्यावहारिक कौशल पर रहा विशेष ध्यान राज्य प्रशिक्षक एनएल पोल और जिला प्रशिक्षक शंकुनलता गौर ने बताया कि लिखित परीक्षा में अक्सर महिलाएं पढ़कर या रटकर पास हो जाती हैं, लेकिन इस बार प्रायोगिक परीक्षा में उनके व्यावहारिक कौशल को बारीकी से परखा गया। परीक्षा केंद्र पर प्रत्येक आशा कार्यकर्ता से फील्ड वर्क से जुड़े लाइव प्रैक्टिकल कराकर देखे गए, जिनमें मुख्य रूप से नवजात शिशु का सटीक वजन कैसे लिया जाता है। गर्भवती महिलाओं की प्राथमिक स्वास्थ्य जांच कैसे की जाती है। शिशु का तापमान कैसे करते है। उच्च जोखिम वाली गर्भवती महिलाओं, कुपोषित बच्चों और विकलांगता श्रेणी के मामलों की त्वरित पहचान कैसे करते है, मरीजों को तत्काल प्राथमिक उपचार देकर जल्द से जल्द अस्पताल पहुँचाना, जिससे किसी भी अनहोनी को रोका जा सके, ऐसे तमाम प्रक्रिया को मौके पर कराकर देखा गया। शहरी और ग्रामीण कार्यकर्ताओं का अंतर और उत्साह राज्य प्रशिक्षक निशा वारी और जिला प्रशिक्षक आलोक कोशिक ने बताया कि इस परीक्षा को लेकर कार्यकर्ताओं में भारी उत्साह था। मूल्यांकन के दौरान शहरी और ग्रामीण आशाओं के बीच का अंतर भी सामने आया। शहरों में बेरोजगारी के कारण अधिक पढ़ी-लिखी युवतियां इस सेवा से जुड़ रही हैं, जिससे उनकी प्रस्तुति आधुनिक दिखती है। वहीं ग्रामीण क्षेत्रों की आशा कार्यकर्ता व्यावहारिक रूप से अत्यधिक कुशल और मेहनती हैं, लेकिन कम पढ़ी-लिखी या संकोची स्वभाव की होने के कारण उन्हें लिखित परीक्षा में कुछ चुनौतियों का सामना करना पड़ा, जिसे उन्होंने अपने व्यावहारिक ज्ञान से पूरा किया। सफलता पर मिलेगा सर्टिफिकेट और पांच हजार की राशि प्रथम चरण में ऑनलाइन आंतरिक मूल्यांकन, द्वितीय चरण में बोर्ड पैटर्न पर लिखित परीक्षा और तृतीय चरण में प्रायोगिक परीक्षा की तीनों बाधाएं अब संपन्न हो चुकी हैं, जो भी आशा कार्यकर्ता इन तीनों चरणों में उत्तीर्ण होगी, उसे सर्टिफाइड आशा घोषित किया जाएगा। भविष्य में उनके काम को विशेष प्राथमिकता मिलेगी और सरकार की ओर से प्रोत्साहन के रूप में पांच हजार रूपए का इंसेंटिव भी दिया जाएगा। ईएमएस/मोहने/ 31 मई 2026