हमें आजादी हासिल किए करीब आठ दशक होने को आए, किंतु आज भी हमारे सामने यही सवाल दीर्घाकार में खड़ा है कि क्या हम वास्तव में स्वतंत्र है या अंग्रेजों ने जिन्के हाथों में सत्ता सौंपी उनमें कुछ कमी है, यह सब मैं अपने दिल की नही देश के दिल की बात कह रहा हूं, क्योंकि जिनको यह सब कहना चाहिए वे तो अपने ‘मन की बात’ उजागर करने में व्यस्त है? मैंने भी अन्य बुजुर्ग भारतीयों की तरह अंग्रेजों का राज देखा है, मैंने कई बार अंग्रेजों के राज से आज के राज की तुलना करने की भी कौशिशें की, किंतु मुझे अस्सी साल पहले आज की स्थिति-परिस्थिति में कोई विशेष अंतर नजर नही आया, पहले विदेशी शासक थे और अब उसी मानसिकता वाले हमारे कथित अपने देसी शासक, दोनों ही शासकों की शासन कार्यप्रणाली में कोई विशेष अंतर मुझे नजरर नही आ पाया। अंतर सिर्फ इतना जरूर है कि हम पहले हमारे विदेशी शासकों के खिलाफ आवाज उठाते थे और अब मजबूरी में मौन साधना पड़ता है। आज मैं ये विचार अपने ही दिल-दिमाग से प्रस्तुत नही कर रहा हूॅ बल्कि करीब तीन सप्ताह पूर्व जनता के विभिन्न वर्गों से हुई चर्चा के बाद बयान कर रहा हूॅ, अब तो एक ही पुरातन कहावत दोहराने का मन करता है कि- ‘‘अपना ही सिक्का खोटा है तो किसे दोष दे’’ और अब वह सिक्का चलन से बाहर के मार्ग की ओर अग्रसर है, अर्थात् आज हम हमारे अपने भविष्य के बारे में कुछ भी कहने की स्थिति में नही है सिर्फ और सिर्फ राजनैतिक स्वेच्छाचारिता ही हर कही हावी है और उसी के साए में लोग अपना जीवन यापन करने को मजबूर है, आशा है कि किरण इस घटाटोप अंधकार में कहीं भी नजर नही आ रही है, मतलब यह कि अब ‘‘मजबूरी का नाम महात्मा गांधी नही बल्कि राजनीतिक भ्रष्टाचार और स्वेच्छाचारिता हो गया है’’, अब फिलहाल यह कहना तो मुश्किल है कि जनता के ‘‘सब्र का यह परीक्षा काल’’ कब तक चलेगा? लेकिन यह तय है कि सब्र का यह बांध कभी भी टूट सकता है, फिर देश व मौजूदा राजनीतिक धुरंधरों का क्या हश्र होगा? यह भी फिलहाल कहना मुश्किल है, क्योंकि पिछले आठ दशकों में हमारे राजनेता सब्र के इस बांध का कई बार परीक्षण कर देख चुके है, आज स्थिति यह है कि देश की जनता को उनकी अपनी पारिवारिक समस्याओं में मंहगाई तथा अन्य माध्यमों से इतना उलझा दिया गया है कि देशवासियों को अपने आस-पास देखने की फुर्सत नही मिला पा रही है, लेकिन यह दुरावस्था अधिक दिन चलने वाली नही है, क्योंकि देश की भविष्य युवा पीढ़ी अब काफी ‘समझदार’ होने लगी है। ....और देश को अब नए ‘चन्द्रोदय’ का बेसब्री से इंतजार है। इसके बाद ही सवा सौ से अधिक तीखे संशोधनों को तीरों से घायल संविधान को भी थोड़ी राहत मिल सकेगी और हमारा प्रजातंत्र भी ‘‘आईसीयू’’ से बाहर आ सकेगा। (यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है) .../ 1 जून /2026