भारतीय रिजर्व बैंक की हालिया रिपोर्ट और देश की आर्थिक स्थिति से जुड़े विभिन्न संकेतक यह सवाल खड़ा कर रहे हैं। आखिर भारत की अर्थव्यवस्था किस दिशा में जा रही है? पिछले कुछ वर्षों में सरकार और उसके समर्थकों द्वारा भारत को दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था बताया जा रहा था। रिजर्व बैंक की रिपोर्ट में दिखाई देने वाली वास्तविकताएं एक अलग कहानी कह रही हैं। भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए विदेशों पर निर्भर होता जा रहा है। एक समय देश अपनी जरूरत का लगभग 18 प्रतिशत कच्चा तेल और गैस स्वयं उत्पादित कर लेता था। शेष 82 प्रतिशत आयात करना पड़ता था। अब आयात पर निर्भरता और बढ़ गई है। कच्चे तेल, गैस, उर्वरक और अन्य पेट्रोलियम उत्पादों के आयात पर भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा खर्च हो रही है। इसके साथ ही इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, औद्योगिक सामान और अनेक उपभोक्ता वस्तुओं के लिए भारत की विदेशों पर निर्भरता बढ़ती जा रही है। आयात और निर्यात के बीच बढ़ता असंतुलन चिंता का विषय है। यदि किसी देश का आयात लगातार निर्यात से अधिक रहेगा तो अंततः विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ना स्वाभाविक है। भारत का व्यापार घाटा साल दर साल लगातार बढ़ रहा है। विदेशी मुद्रा अर्जित करने में वृद्धि दिखाई नहीं दे रही। जिस गति से आयात बढ़ा है, उस अनुपात में निर्यात नहीं बढ़ पाया है। इसका सीधा असर रुपये की मजबूती पर पड़ रहा है। डॉलर और युआन जैसी मुद्राओं के मुकाबले रुपया लगातार गिर रहा है। जिसके कारण आयातित वस्तुओं की कीमत बढ़ रही है। पिछले वर्षों में सरकार ने मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत जैसे अभियान चलाए, आलोचकों का मानना है, इन अभियानों का प्रभाव औद्योगिक उत्पादन और रोजगार सृजन के रूप में कहीं पर दिखाई भी दिए तो वो भी बहुत नीचे स्तर पर हैं। भारत में उत्पादन बढ़ाने के बजाय आयात आधारित उपभोग अर्थव्यवस्था को सरकारी नीतियों से बढ़ावा मिला है। अर्थव्यवस्था को लेकर चिंता का एक दूसरा कारण देश में बढ़ता कर्ज है। केंद्र और राज्य सरकारें लगातार उधार लेकर खर्च बढ़ा रही हैं। निजी क्षेत्र और आम नागरिकों के ऊपर कर्ज बढ़ रहा है। गोल्ड लोन, व्यक्तिगत ऋण और क्रेडिट कार्ड आधारित उधारी में तेजी से वृद्धि हुई है। जब किसी अर्थव्यवस्था में विकास का आधार उत्पादन और आय की बजाय कर्ज बनने लगे, तो यह स्थिति लंबे समय तक टिकाऊ नहीं मानी जाती। जब खर्च करने के लिये पैसे नहीं होंगे, तो आर्थिक विकास कैसे संभव है। नोटबंदी, जीएसटी और कोरोना महामारी के प्रभावों पर भी गंभीर चर्चा आवश्यक है। इन तीनों घटनाओं ने छोटे और मध्यम उद्योगों को गहरा झटका दिया। असंगठित क्षेत्र, जो भारत में रोजगार का सबसे बड़ा स्रोत था, आज भी वह उबर नहीं पाया है। बेरोजगारी और महंगाई ने आम परिवारों की आर्थिक स्थिति को कमजोर किया है। लोगों की आय कई वर्षों से सीमित है। आय की तुलना में अधिक तेजी से जीवन-यापन का खर्च बढ़ रहा है। शेयर बाजार को लंबे समय तक भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती का प्रतीक बताया जाता रहा। पिछले कुछ महीनों में विदेशी निवेशकों द्वारा भारी मात्रा में पूंजी निकासी की जा रही हैं। यदि विदेशी निवेश कम होता है, घरेलू उत्पादन नहीं बढ़ता, तो आर्थिक विकास की रफ्तार पर इसका असर पड़ना स्वाभाविक है। दूसरी ओर एशिया के कई शेयर बाजार अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन करते दिखाई दे रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों ने भी भारत की चुनौतियां बढ़ा दी हैं। पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव डाल रही है। ऊर्जा आयात महंगा होता है, तो उसका असर परिवहन, कृषि, उद्योग सहित सभी क्षेत्रों में पड़ता है। अंततः इसका भार आम नागरिक की जेब पर पड़ता है। वर्तमान स्थिति की तुलना 1991 के आर्थिक संकट से होने लगी है। भारत के पास उस समय की तुलना में वर्तमान में कहीं अधिक बड़ा विदेशी मुद्रा भंडार, मजबूत बैंकिंग व्यवस्था और विकसित वित्तीय बाजार मौजूद हैं। यह आशंका इस लिये व्यक्त की जा रही है, उस समय की तुलना में कर्ज और ब्याज का बोझ ज्यादा है। बढ़ता व्यापार घाटा, रोजगार संकट, महंगाई, सार्वजनिक ऋण और आयात पर बढ़ती निर्भरता ऐसे संकेत हैं, जिन्हें सरकार के लिये गंभीरता से स्वीकार करने की आवश्यकता है। सरकार, वित्त मंत्रालय और रिजर्व बैंक के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती राजनीतिक लोकप्रियता नहीं, बल्कि आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करने की है। महंगाई पर नियंत्रण, रोजगार सृजन, विनिर्माण क्षेत्र को मजबूत करना, निर्यात बढ़ाना, आयात निर्भरता कम करना और वित्तीय अनुशासन स्थापित करना समय की मांग है। कुछ निर्णय अलोकप्रिय हो सकते हैं, लेकिन अर्थ व्यवस्था को देखते हुए कठोर निर्णय लेने से सरकार बचेगी, तो आने वाले वर्षों में कहीं बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है। अर्थव्यवस्था केवल प्रचार और आंकड़ों के सहारे नहीं चलती है। अंततः उत्पादन, रोजगार, निवेश, निर्यात और नागरिकों की क्रय शक्ति ही किसी देश की वास्तविक आर्थिक ताकत का निर्धारण करती है। इसलिए समय रहते चेतावनी के इन संकेतों को समझना, समय रहते सुधारात्मक कदम उठाना सरकार और आम जनता के हित में होगा। ईएमएस / 03 जून 26