पश्चिम एशिया एक बार फिर वैश्विक राजनीति के केंद्र में है। अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच जारी तनाव ने पूरे क्षेत्र को अस्थिर बना दिया है। हाल के दिनों में ईरान द्वारा अमेरिकी MQ-1 ड्रोन को मार गिराने का दावा, होर्मुज स्ट्रेट के आसपास बढ़ती सैन्य गतिविधियां, लेबनान में संघर्ष और परमाणु समझौते को लेकर चल रही कूटनीतिक खींचतान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यह केवल दो देशों के बीच का विवाद नहीं बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन का मामला बन चुका है। इसी बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का यह दावा कि ईरान परमाणु हथियार न बनाने और न खरीदने पर सहमत हो गया है, अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक नई बहस को जन्म देता है। पहली नजर में ऐसा लग सकता है कि अमेरिका का दबाव काम कर रहा है और ईरान पीछे हट रहा है, लेकिन वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल है। ईरान ने यदि परमाणु हथियारों के निर्माण से दूरी बनाने की बात स्वीकार भी की है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि उसकी सामरिक या सैन्य शक्ति कमजोर हो गई है। पिछले दो दशकों में ईरान ने अपनी रक्षा नीति को इस प्रकार विकसित किया है कि वह बिना परमाणु हथियारों के भी क्षेत्रीय स्तर पर एक प्रभावशाली शक्ति बना रहे। ईरान की सबसे बड़ी ताकत उसकी मिसाइल क्षमता है। उसके पास हजारों किलोमीटर तक मार करने वाली बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलें हैं, जो पश्चिम एशिया में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों और इजराइल जैसे देशों के लिए लगातार चुनौती बनी हुई हैं। इसके अलावा ड्रोन तकनीक के क्षेत्र में भी ईरान ने उल्लेखनीय प्रगति की है। रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान ईरानी ड्रोन की चर्चा पूरी दुनिया में हुई थी। आज ईरान कम लागत में बड़ी संख्या में ऐसे ड्रोन तैयार करने में सक्षम है जो युद्ध के मैदान में प्रभावी भूमिका निभा सकते हैं। ईरान की एक और बड़ी ताकत उसके क्षेत्रीय सहयोगी समूह हैं। लेबनान में हिजबुल्लाह, यमन में हूती संगठन, इराक और सीरिया में सक्रिय कई सशस्त्र समूह ईरान के प्रभाव क्षेत्र का हिस्सा माने जाते हैं। यही कारण है कि अमेरिका और इजराइल के लिए ईरान के साथ किसी भी संभावित संघर्ष का अर्थ केवल एक देश से युद्ध नहीं बल्कि पूरे क्षेत्र में कई मोर्चों पर संघर्ष हो सकता है। यही वजह है कि अमेरिका की सैन्य शक्ति अत्यधिक मजबूत होने के बावजूद वह प्रत्यक्ष युद्ध को लेकर सावधानी बरतता दिखाई देता है। अमेरिका ने लंबे समय से ईरान पर आर्थिक प्रतिबंधों, राजनीतिक दबाव और सैन्य चेतावनियों की नीति अपनाई है। उसका उद्देश्य ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना और क्षेत्र में उसके प्रभाव को सीमित करना रहा है। लेकिन बीते वर्षों के अनुभव बताते हैं कि केवल दबाव की नीति से अमेरिका अपने सभी लक्ष्य हासिल नहीं कर पाया है। प्रतिबंधों के बावजूद ईरान ने अपनी सैन्य क्षमताओं को विकसित किया और क्षेत्रीय राजनीति में अपनी मौजूदगी बनाए रखी। डोनाल्ड ट्रम्प के हालिया बयान भी इसी द्वंद्व को दर्शाते हैं। एक तरफ वे कहते हैं कि अमेरिका अपनी शर्तें मनवा रहा है और दूसरी तरफ यह भी कहते हैं कि उन्हें समझौते की कोई जल्दी नहीं है। यह बयान बताता है कि वाशिंगटन अभी भी दबाव और कूटनीति दोनों रास्तों को साथ लेकर चलना चाहता है। यदि अमेरिका पूरी तरह आश्वस्त होता कि वह सैन्य कार्रवाई के जरिए अपने लक्ष्य हासिल कर सकता है, तो शायद वह समझौते की भाषा पर इतना जोर नहीं देता। कई विश्लेषकों का मानना है कि वर्तमान परिस्थितियों में अमेरिका भी कुछ हद तक बैकफुट पर दिखाई दे रहा है। इसका कारण केवल ईरान की सैन्य शक्ति नहीं बल्कि वैश्विक परिस्थितियां भी हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध, चीन के साथ बढ़ती प्रतिस्पर्धा, वैश्विक आर्थिक चुनौतियां और ऊर्जा बाजार की अनिश्चितता अमेरिका को एक और बड़े युद्ध से बचने के लिए प्रेरित करती हैं। पश्चिम एशिया में किसी व्यापक संघर्ष का सीधा असर तेल की कीमतों, वैश्विक व्यापार और विश्व अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। होर्मुज स्ट्रेट इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। दुनिया के कुल समुद्री तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी जलमार्ग से होकर गुजरता है। यदि यहां किसी कारणवश आवाजाही प्रभावित होती है तो वैश्विक ऊर्जा बाजार में भारी उथल-पुथल मच सकती है। यही कारण है कि अमेरिका और उसके सहयोगी देश इस क्षेत्र को खुला और सुरक्षित रखना चाहते हैं, जबकि ईरान इसे अपने सामरिक प्रभाव के एक महत्वपूर्ण साधन के रूप में देखता है। हाल के घटनाक्रम यह भी दिखाते हैं कि ईरान केवल सैन्य शक्ति के भरोसे नहीं चल रहा बल्कि वह कूटनीतिक स्तर पर भी सक्रिय है। ईरानी नेतृत्व लगातार यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि वह अपने राष्ट्रीय हितों से समझौता नहीं करेगा। संसद के स्पीकर और अन्य वरिष्ठ नेताओं के बयान इसी रणनीति का हिस्सा माने जा रहे हैं। वे स्पष्ट कर रहे हैं कि किसी भी समझौते को तभी स्वीकार किया जाएगा जब उसमें ईरानी जनता के अधिकारों और देश की संप्रभुता का सम्मान किया जाए। दूसरी ओर इजराइल की चिंता मुख्य रूप से सुरक्षा से जुड़ी है। इजराइल लंबे समय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम और उसके क्षेत्रीय प्रभाव को अपने लिए खतरा मानता रहा है। इसलिए वह अमेरिका पर लगातार दबाव बनाता है कि ईरान के खिलाफ सख्त रुख अपनाया जाए। लेबनान और अन्य क्षेत्रों में जारी सैन्य गतिविधियां इसी व्यापक रणनीतिक संघर्ष का हिस्सा हैं। वर्तमान स्थिति में यह कहना कठिन है कि अमेरिका और ईरान के बीच अंतिम समझौता कब और किस रूप में होगा। हालांकि इतना स्पष्ट है कि दोनों पक्ष प्रत्यक्ष युद्ध की कीमत को समझते हैं। यही कारण है कि कड़ी बयानबाजी और सैन्य तैयारियों के बावजूद बातचीत के रास्ते पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं। ट्रम्प का यह कहना कि समझौता होने पर कई लोगों की जान बच सकती है, इस बात का संकेत है कि कूटनीति अभी भी सबसे महत्वपूर्ण विकल्प बनी हुई है। कुल मिलाकर ईरान का परमाणु हथियार न बनाने पर सहमत होना एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम जरूर है, लेकिन इसे उसकी कमजोरी के रूप में नहीं देखा जा सकता। ईरान आज भी पश्चिम एशिया की सबसे प्रभावशाली सैन्य और राजनीतिक शक्तियों में से एक है। उसकी मिसाइल क्षमता, ड्रोन तकनीक, क्षेत्रीय नेटवर्क और भौगोलिक स्थिति उसे विशेष सामरिक महत्व प्रदान करती है। वहीं अमेरिका अपनी वैश्विक शक्ति और सैन्य क्षमता के बावजूद इस तथ्य को समझता है कि ईरान के साथ किसी बड़े संघर्ष के परिणाम केवल युद्धक्षेत्र तक सीमित नहीं रहेंगे बल्कि पूरी दुनिया पर उनका प्रभाव पड़ेगा। इसीलिए वर्तमान परिस्थितियां यह संकेत देती हैं कि शक्ति प्रदर्शन और कूटनीति दोनों साथ-साथ चलेंगे। अमेरिका दबाव बनाए रखेगा, ईरान अपनी ताकत का प्रदर्शन करता रहेगा और दोनों पक्ष अपने-अपने हितों को सुरक्षित रखते हुए बेहतर सौदे की तलाश करेंगे। पश्चिम एशिया का भविष्य इसी संतुलन पर निर्भर करेगा कि टकराव कितना बढ़ता है और संवाद के रास्ते कितने खुले रहते हैं। (वरिष्ठ पत्रकार साहित्यकार-स्तम्भकार) (यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है) .../ 2 जून /2026