लेख
02-Jun-2026
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अगली पेशी अगले साल यह देश की अदालतों में होता रहा है लेकिन हाल ही मे सुप्रीम कोर्ट ने न्याय में देरी को रोकने और पारदर्शिता लाने के लिए सभी हाईकोर्ट्स को सख्त निर्देश जारी किए हैं। इसके तहत, सुनवाई के बाद सुरक्षित रखे गए सभी फैसले अधिकतम तीन महीने (90 दिन) के भीतर सुनाने अनिवार्य हैं। वहीं, जमानत से जुड़े मामलों में 24 घंटे के भीतर आदेश जारी करने के निर्देश दिए गए हैं। ऐसा पहली बार नहीं है पूर्व में भी पूर्व सीजेआई सरकार और सत्तारूढ़ पार्टी के चुनाव घोषणा पत्र और सत्तारूढ़ नेता समय समय पर देश की न्याय व्यवस्था में देरी की समस्या का समाधान खोजने का वायदा दावा और बयान करते रहे हैं लेकिन हर बार ढाक के वहीं तीन पात। न्याय मे देरी का सिलसिला नया नहीं है, लेकिन जब अदालतें बहस पूरी होने के बाद भी वर्षों तक फैसले सुरक्षित रखती हैं, तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं रह जाती, बल्कि न्याय के मूल सिद्धांत पर सवाल खड़ा करती है। यह वह कड़वी सच्चाई है कि अदालतों में करोड़ों मामले लंबित हैं और न्याय की उम्मीद लिए लोग तारीख पर तारीख काटते रहते हैं। कई मामलों में फैसला तब आता है, जब पीड़ित की उम्र, आर्थिक शक्ति और मानसिक ऊर्जा लगभग खत्म चुकी होती है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि देर से मिला न्याय क्या सचमुच न्याय कहलाया जा सकता है? इस मामले में सुप्रीम कोर्ट कई बार निचली अदालतों को सचेत कर चुका है। एक बार फिर से हाईकोटों में फैसलों में हो रही देरी पर सुप्रीम कोर्ट गंभीर चिंता जताते हुए स्पष्ट कहा है कि किसी भी मामले में फैसला सुरक्षित रखने के बाद उसे तीन महीने के भीतर सुनाया जाना चाहिए। यदि तीन महीने तक फैसला नहीं आता है, तो हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को वह मामला चीफ जस्टिस के सामने रखना होगा। यह निर्देश केवल प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि न्यायिक जवाबदेही की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। सुप्रीम कोर्ट इसी गंभीर स्थिति पर सख्त रुख अपनाते हुए जो दिशा-निर्देश जारी किए हैं, वे न्याय व्यवस्था में पारदर्शिता, जवाबदेही और समयबद्धता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हैं। अदालत ने साफ कहा है कि फैसला सुरक्षित रखने के बाद उसे अनिश्चितकाल तक लंबित नहीं रखा जा सकता। न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि समय पर दिखना भी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश कि कोई भी फैसला रिजर्व होने के तीन महीने के भीतर सुनाया जाना चाहिए, न्यायिक प्रक्रिया को अनुशासित करने वाला कदम है। यदि तीन महीने के भीतर फैसला नहीं सुनाया जाता, तो संबंधित हाईकोर्ट का रजिस्ट्रार जनरल मामला मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखेगा। मुख्य न्यायाधीश अधिकतम दो सप्ताह का अतिरिक्त समय दे सकते हैं। इसके बाद भी फैसला न आए तो मामला दूसरी बेंच को स्थानांतरित किया जा सकेगा। यह व्यवस्था इसलिए आवश्यक है, है, क्योंकि किसी भी मुकदमे में फैसला सुरक्षित होने का अर्थ यह नहीं कि पक्षकारों की प्रतीक्षा अनंत हो जाए। सबसे गंभीर पहलू उन मामलों का है, जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े हैं। जमानत, अग्रिम जमानत, सजा पर रोक या जेल में बंद विचाराधीन कैदियों से जुड़े मामलों में देरी का अर्थ सीधे-सीधे व्यक्ति की स्वतंत्रता पर चोट है। संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है। यदि किसी व्यक्ति की जमानत याचिका पर बहस पूरी हो चुकी हो और आदेश महीनों तक सुरक्षित रखा जाए, जाए, तो यह केवल तकनीकी देरी नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकारों का हनन है। सुप्रीम कोर्ट ने इसी कारण कहा है कि जमानत से जुड़े मामलों में आदेश उसी दिन सुनाया जाना चाहिए और यदि सुरक्षित रखा जाए तो अगले दिन अवश्य जारी किया जाए। जमानत आदेशों को जेल प्रशासन तक तुरंत पहुंचाने का निर्देश भी बेहद महत्वपूर्ण है। कई बार अदालत से राहत मिलने के बाद भी कागजी प्रक्रिया में देरी के कारण आरोपी या दोषी जेल में ही रह जाता है। यह स्थिति न्याय की आत्मा के विरुद्ध है। यदि अदालत ने रिहाई का आदेश दिया है, तो जेल प्रशासन तक सूचना तुरंत पहुंचनी चाहिए और संबंधित व्यक्ति को उसी दिन या अधिकतम अगले दिन रिहा किया जाना चाहिए, बशर्ते वह किसी अन्य मामले में वांछित न हो या जमानत की शर्तें पूरी करता हो। यह व्यवस्था न्याय को कागज से जमीन तक पहुंचाने की दिशा में जरूरी सुधार है। सुप्रीम कोर्ट ने केवल फैसला सुनाने की समय सीमा तय नहीं की, बल्कि विस्तृत आदेश अपलोड करने को भी अनिवार्य किया है। अदालत ने कहा है कि ऑपरेटिव पार्ट यानी मुख्य आदेश सुनाने के 15 दिनों के भीतर पूरा फैसला, कारणों सहित, वेबसाइट पर अपलोड होना चाहिए। यदि 15 दिन में विस्तृत फैसला अपलोड नहीं होता, तो पक्षकार आवेदन दे सकते हैं। यदि 30 दिन तक भी आदेश अपलोड न हो, तो पक्षकार मामले को वापस लेने या दूसरी बेंच में सुनवाई के लिए आवेदन कर सकेंगे। इससे न्यायिक आदेशों में पारदर्शिता बढ़ेगी और पक्षकारों को यह समझने का अवसर मिलेगा कि अदालत ने किस आधार पर फैसला दिया। एक अन्य महत्वपूर्ण निर्देश यह है कि बहस पूरी होने और फैसला सुरक्षित रखे जाने की तारीख हाईकोर्ट की वेबसाइट पर प्रदर्शित की जाए। यह छोटी सी व्यवस्था दिखने में तकनीकी लग सकती है, लेकिन इसका प्रभाव बड़ा होगा। इससे पक्षकारों, वकीलों और आम जनता को पता रहेगा कि किस मामले में फैसला कब से सुरक्षित है। जब यह जानकारी सार्वजनिक होगी, तो अनावश्यक देरी पर स्वाभाविक निगरानी बनेगी। झारखंड हाईकोर्ट से जुड़े मामले ने इस समस्या की गंभीरता को उजागर किया। याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि उनकी आपराधिक अपीलों पर अंतिम बहस सुनने के बाद दो-तीन वर्षों तक फैसला सुरक्षित रखा गया, लेकिन सुनाया नहीं गया। यह स्थिति किसी भी लोकतांत्रिक न्याय व्यवस्था के लिए चिंताजनक है। अगर किसी दोपी या आरोपी की अपील पर बहस पूरी हो चुकी है और फैसला वर्षों तक सुरक्षित है, तो वह व्यक्ति कानूनी अनिश्चितता में जीने को मजबूर होता है। न्याय की प्रतीक्षा स्वयं एक सजा बन जाती है। देश में करोड़ों मामले लंबित हैं। सुप्रीम कोर्ट में भी हजारों मामले पेंडिंग हैं और हाईकोर्टों तथा निचली अदालतों में लंबित मामलों की संख्या करोड़ों में है। ऐसे में यह आवश्यक है कि जहां सुनवाई पूरी हो चुकी है, वहां फैसला समय पर आए। न्यायिक विलंब से केवल पक्षकार परेशान नहीं होता, बल्कि समाज में कानून के प्रति भरोसा भी कमजोर होता है। जब लोग देखते हैं कि वर्षों तक फैसला नहीं आता, तो उनके मन में न्याय व्यवस्था को लेकर निराशा बढ़ती है। यह स्वस्थ समाज के लिए अच्छा संकेत नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्ति का उपयोग करते हुए ये निर्देश दिए हैं। अनुच्छेद 142 का उद्देश्य ही पूर्ण न्याय सुनिश्चित करना है। अब आवश्यकता है कि सभी अदालतें इन दिशा-निर्देशों को केवल औपचारिक आदेश न मानें, बल्कि न्यायिक नैतिकता का हिस्सा बनाएं। समय पर फैसला देना न्यायाधीश की जिम्मेदारी है है और समय पर कारण बताना न्यायिक पारदर्शिता की शर्त। न्याय में देरी केवल प्रक्रिया की कमजोरी नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों पर असर डालने वाली समस्या है। सुप्रीम कोर्ट का यह कदम स्वागत योग्य है। यदि इसे सही ढंग से लागू किया गया, तो न्याय व्यवस्था में जनता का भरोसा बढ़ेगा और यह संदेश जाएगा कि अदालतों में केवल सुनवाई ही नहीं, समय पर निर्णय भी सुनिश्चित होगा। खासकर ऐसे समय में जब पूर्व हाइकोर्ट जज यशवंत सिन्हा पर कार्यवाही में सुप्रीम कोर्ट से लेकर कानून और सरकार भी किंकर्तव्यविमूढ़ बनी रहती हैं और न्यायपालिका की साख को गंभीर आघात लगता है इतना ही नहीं जब निठारी कांड जैसे दर्जनों बच्चों की सीरियल मर्डर के मामलों में आरोपी सबूत के अभाव में रिहा हो जातें हैं और जब सजायाफ्ता रसूखदार धर्मगुरु राम रहीम आए दिन पैरोल पर बाहर आने जाने की छूट पाते हैं जब हजारों करोड़ का घोटाला कर रसूखदार राजनीतिक लोग जेल से जमानत पर रिहा कर दिया जाते हैं तब कानून की साख को धक्का लगना स्वाभाविक है ऐसे में कानून और अदालतें सिर्फ आम आदमी पर शिकंजा कसने के लिए प्रभावी नजर आती है और सत्ता व राजनीतिक ताकतवर सफेदपोश लोगों के लिए स्पेशल लीगल ट्रीटमेंट दृष्टि गोचर होता है। समय की मांग है कि न्यायपालिका बिना राजनीतिक हस्तक्षेप के निष्पक्ष व समयबद्ध काम करें तभी आम आदमी को न्याय पालिका पर भरोसा बनेगा और समस्या का समाधान होगा। ईएमएस/02 जून2026 (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं पिछले 38 वर्ष से लेखन और पत्रकारिता से जुड़े हैं)