बचपन को जीवन का सबसे सुंदर और निष्कलुष समय माना जाता है। यह वह आयु होती है जब बच्चे खिलौनों से खेलते हैं। आंगन में दौड़ते हैं। मित्रों के साथ क्रीड़ा करते हैं। हंसते हैं। सीखते हैं और सपनों की रंगीन दुनिया में खोए रहते हैं। आठ वर्ष की आयु तो विशेष रूप से मासूमियत और खेलकूद की उम्र मानी जाती है। इस आयु में किसी बच्चे से यह अपेक्षा नहीं की जाती कि वह जीवन की कठिन चुनौतियों का सामना करेगा या कोई ऐसा कार्य करेगा जिसे बड़े बड़े लोग भी करने से पहले कई बार सोचते हैं। लेकिन पालनपुर की नन्ही बालिका निक्षा बारोट ने अपनी असाधारण इच्छाशक्ति और अद्भुत साहस से इस धारणा को बदल दिया है। सिर्फ आठ वर्ष की आयु में निक्षा बारोट ने माउंट एवरेस्ट बेस कैंप तक पहुंचकर ऐसा कीर्तिमान स्थापित किया है जिस पर पूरे देश को गर्व है। यह उपलब्धि केवल एक ट्रैकिंग यात्रा नहीं है बल्कि यह दृढ़ संकल्प आत्मविश्वास साहस और अनुशासन की ऐसी कहानी है जो हर आयु वर्ग के लोगों को प्रेरित करती है। जिस उम्र में बच्चे अपने घर के आंगन और विद्यालय के खेल मैदान तक सीमित रहते हैं उस उम्र में निक्षा ने हिमालय की कठिन व दुर्गम राहों पर चलकर दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत श्रृंखला के चरणों तक पहुंचने का गौरव प्राप्त किया है। निक्षा ने सात दिनों की कठिन यात्रा में लगभग एक सौ तीस किलोमीटर का सफर तय किया। यह दूरी किसी भी व्यक्ति के लिए चुनौतीपूर्ण मानी जाती है। उस पर हिमालय का कठिन भूभाग बर्फीली हवाएं ऊंचाई पर कम होती ऑक्सीजन और लगातार बदलता मौसम यात्रा को और भी कठिन बना देते हैं। लेकिन इस नन्ही बालिका ने किसी भी चुनौती के सामने हार नहीं मानी। उसने अपने छोटे छोटे कदमों से उन रास्तों को पार किया जहां पहुंचना अनेक वयस्कों के लिए भी कठिन माना जाता है। काठमांडू से लुकला तक की यात्रा के बाद शुरू हुआ यह अभियान नामचे बाजार तेंगबोचे डिंगबोचे लोबुचे और गोरक्षेप जैसे कठिन पड़ावों से होकर गुजरा। हर पड़ाव अपने भीतर नई चुनौतियां समेटे हुए था। कहीं तीखी चढ़ाई थी तो कहीं बर्फ से ढके रास्ते। कहीं तेज ठंडी हवाएं थीं तो कहीं सांस लेने में कठिनाई पैदा करने वाली ऊंचाई। लेकिन निक्षा ने अद्भुत धैर्य और आत्मविश्वास का परिचय देते हुए हर बाधा को पार किया और आखिरकार सत्रह हजार पांच सौ अट्ठानवे फीट की ऊंचाई पर स्थित एवरेस्ट बेस कैंप तक पहुंच गई। निक्षा की यह उपलब्धि इसलिए भी विशेष है क्योंकि इसमें केवल शारीरिक क्षमता ही नहीं बल्कि मानसिक दृढ़ता की भी आवश्यकता होती है। पर्वतों की कठिन राहों पर चलते समय कई बार थकान निराशा और कठिन परिस्थितियां मनोबल को कमजोर कर देती हैं। लेकिन निक्षा ने यह सिद्ध कर दिया कि मजबूत इरादों के सामने कोई भी कठिनाई बड़ी नहीं होती। उसकी सफलता यह संदेश देती है कि सपनों की कोई आयु नहीं होती और जो लोग अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित रहते हैं वे अवश्य सफलता प्राप्त करते हैं। सबसे प्रेरणादायक बात यह है कि एवरेस्ट बेस कैंप पहुंचने के बाद निक्षा ने केवल अपनी सफलता का उत्सव नहीं मनाया बल्कि योग करके और राष्ट्रगान गाकर भारतीय संस्कृति तथा देशभक्ति का परिचय दिया। इतनी कम उम्र में अपने देश के प्रति सम्मान और गर्व की भावना वास्तव में प्रशंसनीय है। यह दृश्य हर भारतीय के हृदय को गर्व से भर देने वाला है। निक्षा केवल साहसी बालिका ही नहीं बल्कि प्रकृति प्रेमी और जागरूक नागरिक भी है। उसने अपनी इस यात्रा के दौरान पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया। सेव नेचर सेव हिमालयाज एवरी चाइल्ड शुड प्लांट ए ट्री और फिट इंडिया ग्रीन इंडिया जैसे संदेशों के माध्यम से उसने पूरी दुनिया का ध्यान पर्यावरण की ओर आकर्षित करने का प्रयास किया। आज जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय संकट जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है तब एक आठ वर्षीय बच्ची द्वारा दिया गया यह संदेश अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रेरणादायक बन जाता है। यह जानकर और भी आश्चर्य होता है कि निक्षा का साहसिक सफर केवल एवरेस्ट बेस कैंप तक सीमित नहीं है। छह वर्ष की आयु में उसने केदारकांठा ट्रेक पूरा कर अपनी क्षमता का परिचय दे दिया था। इसके अलावा अरुणाचल प्रदेश से गुजरात तक हजारों किलोमीटर लंबी साइकिल यात्रा में भाग लेकर उसने पौधरोपण और पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी फैलाया। इतनी कम उम्र में ऐसे कार्य करना असाधारण उपलब्धि है और यह दर्शाता है कि निक्षा में नेतृत्व क्षमता तथा सामाजिक चेतना दोनों मौजूद हैं। निक्षा बारोट आज केवल पालनपुर या बनासकांठा की पहचान नहीं हैं बल्कि वह पूरे देश की प्रेरणा बन चुकी हैं। उनकी सफलता उन सभी बच्चों को संदेश देती है कि यदि मन में आत्मविश्वास हो और परिवार का सहयोग मिले तो कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं रहता। यह उपलब्धि उन अभिभावकों के लिए भी प्रेरणा है जो अपने बच्चों के भीतर छिपी प्रतिभाओं को पहचानकर उन्हें आगे बढ़ने का अवसर देते हैं। आज जब आधुनिक जीवनशैली बच्चों को मोबाइल और डिजिटल दुनिया तक सीमित कर रही है तब निक्षा जैसे बच्चे नई पीढ़ी के लिए आशा की किरण हैं। उन्होंने दिखाया है कि प्रकृति के बीच रहकर कठिन परिश्रम करके और बड़े सपने देखकर जीवन में असाधारण उपलब्धियां प्राप्त की जा सकती हैं। उनकी कहानी बच्चों को केवल साहसी बनने की प्रेरणा नहीं देती बल्कि उन्हें अनुशासन पर्यावरण प्रेम देशभक्ति और आत्मविश्वास का पाठ भी पढ़ाती है। आठ वर्ष की आयु वास्तव में खेलने और आंगन में क्रीड़ा करने की उम्र होती है। ऐसे समय में एवरेस्ट बेस कैंप जैसी कठिन यात्रा पूरी करना सामान्य उपलब्धि नहीं बल्कि अद्भुत साहस का उदाहरण है। निक्षा बारोट ने यह सिद्ध कर दिया है कि हौसलों की उड़ान उम्र की सीमाओं में कैद नहीं होती। उनका यह साहसिक कदम आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा। निक्षा बारोट भारत की उन गौरवशाली बेटियों में शामिल हो चुकी हैं जिन्होंने अपने साहस और संकल्प से समाज को नई दिशा दिखाई है। उनकी यह उपलब्धि केवल एक व्यक्तिगत सफलता नहीं बल्कि पूरे देश के लिए गर्व का विषय है। हर भारतीय को इस नन्ही वीर बालिका पर गर्व है जिसने हिमालय की ऊंचाइयों तक पहुंचकर यह संदेश दिया है कि दृढ़ निश्चय और अथक प्रयास से कोई भी शिखर दूर नहीं रहता। निक्षा की यह सफलता आने वाले वर्षों तक बच्चों और युवाओं को प्रेरित करती रहेगी और उनका नाम साहस और उपलब्धि की मिसाल के रूप में याद किया जाएगा। (वरिष्ठ पत्रकार साहित्यकार-स्तम्भकार) (यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है) .../ 2 जून /2026