लेख
02-Jun-2026
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- जीएसटी का भार बढ़ा रहा है महंगाई 1 जुलाई 2017 को भारत में वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू किया गया था। जीएसटी को स्वतंत्र भारत के सबसे बड़े कर सुधारों में माना गया। सरकार ने इसे “वन नेशन, वन टैक्स” की अवधारणा के रूप में प्रस्तुत किया। जिसका उद्देश्य विभिन्न अप्रत्यक्ष करों को समाप्त कर पूरे देश में एक समान कर व्यवस्था स्थापित करना था। प्रारंभिक दौर में इसे व्यापार को सरल बनाने और कर चोरी रोकने की दिशा में बड़ा कदम बताया गया था। जो अपेक्षा की गई थी, जीएसटी के कारण जो सुधार होने थे। टैक्स चोरी रुकनी थी, वह रुक नहीं पाई। पिछले आठ वर्षों में जीएसटी का दायरा लगातार बढ़ता गया। इसके साथ ही गरीब एवं मध्यम वर्ग के नागरिकों पर अप्रत्यक्ष करों का बोझ भी बढ़ता चला गया । जीएसटी लागू होने के समय आवश्यक वस्तुओं को कर मुक्त या न्यूनतम कर दायरे में रखा गया था। जब कानून लागू हुआ उस समय विभिन्न वस्तुओं और सेवाओं को 5%, 12%, 18% और 28% के स्लैब में रखा गया था। बाद के वर्षों में कई वस्तुओं और सेवाओं को नए सिरे से जीएसटी के दायरे में शामिल किया गया। पैक्ड खाद्यान्न, होटल सेवाएँ, ऑनलाइन सेवाएँ, डिजिटल प्लेटफॉर्म, बीमा सेवाएँ, बैंकिंग सेवाएँ, परिवहन, खाद्य पदार्थों की निर्माण सामग्री तथा अनेक उपभोक्ता वस्तुओं पर समय-समय पर कर संरचना में बदलाव किए गए। जिसके कारण कर संग्रह का आधार लगातार बड़ा होता गया। इसका भार गरीब और मध्यम वर्ग पर बढ़ता चला गया। सरकार का तर्क है, जीएसटी कर प्रणाली को पारदर्शी बनाया गया है। कर चोरी पर नियंत्रण लगा है। पिछले वर्षों में कर चोरी के बड़े-बड़े मामले सामने आए हैं। कारपोरेट जगत नियम और कानून का दुरुपयोग कर सबसे ज्यादा कर चोरी कर रहा है। यह बात भी कई मामलों में प्रमाणित हो चुकी है। डिजिटल रिटर्न, ई-वे बिल ऑन लाइन निगरानी तथा जीएसटी के दायरे में लगातार वस्तुओं और सेवाओं को शामिल करने के कारण करों मे उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। यही कारण है, जीएसटी के कर संग्रह में लगातार रिकॉर्ड वृद्धि हो रही है। बिजली बिल रेलवे टिकट बैंकिंग सेवाओं सब में आम आदमी को जीएसटी चुकाना पड़ रही है। वर्षवार जीएसटी संग्रह (अनुमानित) वित्तीय वर्ष| जीएसटी संग्रह 2017-18 (9 माह)| ₹7.40 लाख करोड़ 2018-19| ₹11.77 लाख करोड़ 2019-20| ₹12.22 लाख करोड़ 2020-21| ₹11.36 लाख करोड़ 2021-22| ₹14.83 लाख करोड़ 2022-23| ₹18.07 लाख करोड़ 2023-24| ₹20.18 लाख करोड़ 2024-25| ₹22.08 लाख करोड़ (इसकी वर्षवार तालिका बनाएं ) इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि जीएसटी कर संग्रह 2021 के बाद तेज गति से बढ़ा है। पाँच वर्षों में लगभग दोगुना हो गया है। पिछले 8 वर्षों में यह तीन गुना हुआ है। जीएसटी संग्रह बढ़ने से केंद्र और राज्य सरकारों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। सरकारें इसे आर्थिक गतिविधियों में वृद्धि,बेहतर मानती हैँ।इसके बाद भी केंद्र एवं राज्य सरकारें बड़े पैमाने पर कर्ज ले रही है आम जनता पर लगातार कर का बोझ बढ़ता ही चला जा रहा है। करों के कारण महंगाई भी निरंतर बढ़ रही है। जीएसटी मे पंजीकृत करदाताओं की संख्या 65 लाख से बढ़कर 1.5 करोड़ से अधिक हो चुकी है। जीएसटी के नियमों में लगातार बदलाव होने से छोटे एवं मध्यम कारोबारी लघु एवं मध्यम उद्योग के लोग परेशान हुए हैं। उनके ऊपर आर्थिक भार पड़ा है। बड़ी संख्या में कारोबार और लघु उद्योग बंद हुए हैं। जिसका असर अब महंगाई और बेरोजगारी के रूप में देखने को मिल रहा है। इसका दूसरा पक्ष है। जीएसटी एक अप्रत्यक्ष कर है। जिसका प्रभाव अंततः हर वर्ग के उपभोक्ता पर पड़ता है। गरीब और अमीर दोनों जब कोई वस्तु या सेवा लेते हैं। उन्हें समान दर से कर देना पड़ता है। शिक्षा एवं चिकित्सा के क्षेत्र में भी जीएसटी लागू है। आलोचकों का मानना है कि जीएसटी का बढ़ता दायरा आम नागरिक को आर्थिक संकट में डाल रहा है। पेट्रोलियम उत्पाद पूरी तरह से जीएसटी के दायरे में नहीं हैं।परिवहन, निर्माण, खाद्य प्रसंस्करण, शिक्षा चिकित्सा बिजली बिल और रेल किराए जैसी अति आवश्यक सेवाओं पर भी आम जनता को टैक्स देना पड़ रहा है।करों का प्रभाव अंततः गरीब एवं मध्यम वर्ग के उपभोक्ताओं में पड है। जिनकी आय सीमित है लेकिन टैक्स के बोझ और महंगाई के कारण उनका दैनिक जीवन बुरी तरह से संकट में आया है। विशेषज्ञों का मानना है, जीएसटी कर संग्रह से केंद्र एवं राज्य सरकारों के राजस्व में भारी वृद्धि हुई है। राज्य सरकारों की अर्थव्यवस्था मजबूत हुई है। इसके बाद भी सरकारों के ऊपर जो कर्ज बढ़ रहा है बजट का एक बड़ा हिस्सा ब्याज के रूप में सरकारों को चुकाना पड़ रहा है सरकारी खजाने से जो लाभ निम्न और मध्यम वर्ग को मिलना चाहिए था वह नहीं मिल रहा है जिसके कारण अब केंद्र और राज्य सरकारों के खिलाफ जनता की नाराजी देखने को मिल रही है। वर्तमान में जिस तरह से महंगाई और बेरोजगारी बढ़ रही है।आय स्थिर होकर रह गई है। पिछले 5 वर्षों में जीएसटी का दायरा बढ़ाकर निम्न और मध्यम वर्ग पर करों का बोझ डाला गया है। इसे कम करने की जरूरत महसूस की जा रही है। आवश्यक है, कर संरचना सरल, संतुलित और जनहितकारी बनाने के लिए इसमें सुधार हो। कर संग्रह बढ़ता रहे, जनता को उसके अनुपात में बेहतर स्वास्थ्य, शिक्षा, आधारभूत संरचना तथा सार्वजनिक सेवाएँ प्राप्त हों। तभी कर व्यवस्था के प्रति आम जनता का विश्वास मजबूत होगा। दुर्भाग्य का विषय है कि पिछले वर्षों में स्वास्थ्य शिक्षा सड़क पानी और बिजली की स्थिति दिन प्रतिदिन खराब होती जा रही है। आम जनता पर शुल्क और पेनल्टी के नाम पर लगातार आर्थिक बोझ बढ़ाया जा रहा है। इससे जनता में नाराजी सतत बढ़ रही है। वर्तमान में जीएसटी भारतीय अर्थव्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण राजस्व व्यवस्था है। इसके सामने सबसे बड़ी चुनौती है, बढ़ते राजस्व और आम नागरिक पर पड़ने वाले कर भार के बीच सही संतुलन कैसे बनाया जाए? आने वाले वर्षों में भारत की कर नीति और आर्थिक नीतियों को प्रभावित करेगा। वर्तमान में जिस तरह से महंगाई बेरोजगारी और आय नहीं बढ़ने की दशा में आम जनजीवन सबसे कठिनाई के दौर से गुजर रहा है यदि इस स्थिति में भी सरकार ने अपनी नीतियों को नहीं बदला कर संग्रह की दरें कम नहीं की तो इसका असर गरीब एवं मध्यम वर्ग पर बड़े पैमाने पर पडना तय है। ईएमएस / 02 जून 26