आज के समय में जब समाज में स्वार्थ और प्रतिस्पर्धा की चर्चा अधिक सुनाई देती है तब भी कुछ ऐसे लोग हैं जो अपने कर्मों से यह सिद्ध कर देते हैं कि मानवता आज भी जीवित है। दया करुणा संवेदना और परोपकार जैसे गुण केवल पुस्तकों के शब्द नहीं हैं बल्कि कुछ व्यक्तित्व इन्हें अपने जीवन में उतारकर दूसरों के लिए प्रेरणा बन जाते हैं। ऐसे ही व्यक्तित्व की धनी हैं डॉ. अंजू श्रीवास्तव जिन्होंने अपने जीवन के अमूल्य वर्षों को आर्थिक रूप से कमजोर बेटियों के भविष्य को संवारने में समर्पित कर दिया। उन्होंने केवल शिक्षा का महत्व नहीं समझाया बल्कि स्वयं आगे बढ़कर उन छात्राओं का हाथ थामा जिनके सपने आर्थिक अभावों के कारण टूटने की कगार पर थे। यही कारण है कि आज सैकड़ों परिवार उन्हें केवल एक शिक्षिका नहीं बल्कि एक ममतामयी संरक्षक एक मार्गदर्शक और एक सच्ची शिक्षापूर्णा के रूप में देखते हैं। एक शिक्षक का दायित्व केवल कक्षा में पढ़ाने तक सीमित नहीं होता। वास्तविक शिक्षक वही होता है जो विद्यार्थियों के जीवन में प्रकाश भर दे और उनके संघर्षों को अपना संघर्ष समझे। डॉ. अंजू श्रीवास्तव ने इसी आदर्श को अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया। उन्होंने देखा कि अनेक प्रतिभाशाली छात्राएं केवल कुछ सौ या कुछ हजार रुपये की फीस न होने के कारण अपनी पढ़ाई बीच में छोड़ने को मजबूर हो जाती हैं। उनके सपने अधूरे रह जाते हैं और उनकी प्रतिभा परिस्थितियों के अंधकार में खो जाती है। यह दृश्य उनके संवेदनशील हृदय को झकझोर देता था। उन्होंने तय किया कि जब तक उनके पास सामर्थ्य है तब तक किसी बेटी की शिक्षा केवल पैसों के अभाव में नहीं रुकेगी। वर्ष 1993 में शुरू हुआ उनका यह छोटा सा संकल्प समय के साथ एक विशाल सामाजिक अभियान बन गया। उन्होंने हर वर्ष कम से कम एक जरूरतमंद छात्रा की फीस भरने का निर्णय लिया। धीरे धीरे यह संख्या बढ़ती गई और देखते ही देखते उन्होंने 250 से अधिक बेटियों की शिक्षा का दायित्व निभाया। यह केवल आर्थिक सहायता नहीं थी बल्कि उन बेटियों के आत्मविश्वास को जगाने का प्रयास था जो परिस्थितियों के सामने हार मानने लगी थीं। उन्होंने उन छात्राओं को यह विश्वास दिलाया कि दुनिया में ऐसे लोग भी हैं जो बिना किसी स्वार्थ के उनके साथ खड़े हैं। डॉ. अंजू श्रीवास्तव की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने कभी अपने कार्य का प्रचार नहीं किया। उन्होंने कभी यह हिसाब नहीं रखा कि कितनी छात्राओं की फीस भरी और कितना धन खर्च किया। उनके लिए सबसे बड़ा पुरस्कार उन बेटियों की सफलता थी जो पढ़ लिखकर आत्मनिर्भर बनीं और सम्मानजनक जीवन जीने लगीं। वास्तव में यह सेवा का वह स्वरूप है जिसमें दिखावा नहीं होता केवल समर्पण होता है। उनका यह कथन कि दुआओं का कोई ऑडिट नहीं होता उनके व्यक्तित्व की महानता को दर्शाता है। जो व्यक्ति दूसरों की मुस्कान में अपनी खुशी खोज लेता है वह वास्तव में समाज का सबसे धनी व्यक्ति होता है। उनकी इस सेवा यात्रा के पीछे उनके माता पिता के संस्कार भी महत्वपूर्ण रहे। उन्हें बचपन से ही समाज सेवा और जरूरतमंदों की सहायता करने की प्रेरणा मिली। उनके माता पिता हर वर्ष गरीब बच्चों की किताबों और यूनिफॉर्म का खर्च उठाते थे। यही संस्कार उनके मन में गहराई से बसे और आगे चलकर उन्होंने उन्हें अपने जीवन का आधार बना लिया। यह दर्शाता है कि अच्छे संस्कार केवल परिवार को नहीं बल्कि पूरे समाज को समृद्ध बनाते हैं। जब कोई व्यक्ति नेक कार्य करता है तो समाज के अच्छे लोग भी उससे जुड़ने लगते हैं। डॉ. अंजू श्रीवास्तव के साथ भी ऐसा ही हुआ। उनके सहयोगी शिक्षकों ने इस मिशन में भागीदारी निभाई। बाद में वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने भी आर्थिक सहयोग देना शुरू किया। यह सब उनकी निष्ठा और विश्वास का परिणाम था। लोगों ने देखा कि यह कार्य किसी व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं बल्कि वास्तव में बेटियों के उज्ज्वल भविष्य के लिए किया जा रहा है। इसलिए अनेक हाथ इस पुण्य कार्य में सहयोग के लिए आगे आए। कोरोना महामारी का समय पूरी दुनिया के लिए कठिन था। उस दौरान अनेक परिवार आर्थिक संकट से गुजर रहे थे। शिक्षा पर भी इसका गंभीर प्रभाव पड़ा। ऐसे समय में जब सहयोग के कई स्रोत बंद हो गए तब भी डॉ. अंजू श्रीवास्तव ने हार नहीं मानी। उन्होंने और उनके सहयोगी शिक्षकों ने अपनी व्यक्तिगत बचत तथा भविष्य निधि से राशि निकालकर छात्राओं की पढ़ाई जारी रखी। यह उदाहरण बताता है कि उनके लिए यह कार्य केवल सामाजिक सेवा नहीं बल्कि जीवन का मिशन था। जो व्यक्ति दूसरों के सपनों को बचाने के लिए अपनी जमा पूंजी तक खर्च कर दे उसकी महानता शब्दों में व्यक्त करना आसान नहीं है। आज जिन बेटियों ने उनकी सहायता से शिक्षा प्राप्त की है वे विभिन्न क्षेत्रों में सम्मानजनक पदों पर कार्य कर रही हैं। वे आत्मनिर्भर हैं और अपने परिवारों का सहारा बनी हुई हैं। अनेक छात्राएं ऐसी हैं जिनके जीवन की दिशा ही बदल गई। यदि उस समय उन्हें सहायता न मिली होती तो शायद वे शिक्षा से वंचित रह जातीं। उनकी सफलता डॉ. अंजू श्रीवास्तव के त्याग और समर्पण की जीवंत कहानी कहती है। किसी भी समाज की वास्तविक प्रगति तभी संभव है जब उसकी बेटियां शिक्षित और सशक्त हों। इस दृष्टि से देखा जाए तो उन्होंने केवल 250 छात्राओं की सहायता नहीं की बल्कि सैकड़ों परिवारों के भविष्य को नई दिशा दी है। डॉ. अंजू श्रीवास्तव का जीवन यह संदेश देता है कि समाज में परिवर्तन लाने के लिए बहुत बड़े संसाधनों की आवश्यकता नहीं होती। आवश्यकता होती है संवेदनशील हृदय की और दूसरों के दुःख को समझने की। उन्होंने यह सिद्ध किया कि यदि एक व्यक्ति भी दृढ़ संकल्प कर ले तो वह अनेक जीवन बदल सकता है। उनकी सेवा भावना मानवता के सर्वोच्च आदर्शों का उदाहरण है। उन्होंने बेटियों को केवल शिक्षा नहीं दी बल्कि आत्मसम्मान आत्मविश्वास और जीवन में आगे बढ़ने की शक्ति भी प्रदान की। आज जब हम उनके योगदान को देखते हैं तो सहज ही मन श्रद्धा से भर उठता है। वे उन दुर्लभ व्यक्तित्वों में से हैं जो बिना किसी अपेक्षा के समाज को अपना सर्वश्रेष्ठ देते हैं। उन्होंने अपने कर्मों से यह साबित किया है कि सच्ची महानता पद प्रतिष्ठा या धन में नहीं बल्कि दूसरों के जीवन में प्रकाश फैलाने में होती है। उनके जैसे लोग समाज की अमूल्य धरोहर होते हैं जो आने वाली पीढ़ियों को मानवता और सेवा का मार्ग दिखाते हैं। वास्तव में डॉ. अंजू श्रीवास्तव केवल एक शिक्षिका नहीं बल्कि हजारों लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं। उन्होंने 250 बेटियों के सपनों को टूटने से बचाकर उन्हें नई उड़ान दी है। उनका जीवन करुणा दया प्रेम और निस्वार्थ सेवा का अनुपम उदाहरण है। समाज को ऐसे ही लोगों पर गर्व होता है जो अपने लिए नहीं बल्कि दूसरों के लिए जीते हैं। उनकी यह प्रेरक यात्रा सदैव याद रखी जाएगी और आने वाली पीढ़ियों को यह सिखाती रहेगी कि शिक्षा का दीप जलाकर किसी का जीवन रोशन करना संसार के सबसे महान कार्यों में से एक है। ईएमएस/05/06/2026