-राहुल गांधी के मजबूत इरादों के साथ ही गठबंधन राजनीति की परीक्षा -झारखंड और तमिलनाडु में सहयोगियों के समर्थन से सीटें मजबूत -आंध्र में भाजपा को सीट न मिलने की चर्चा नई दिल्ली,(ईएमएस)। आगामी 18 जून को होने वाले राज्यसभा चुनावों को लेकर राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं। 24 सीटों के लिए होने वाले चुनाव में भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस ने अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है। हालांकि इस बार चर्चा केवल संख्या बल की नहीं, बल्कि गठबंधन प्रबंधन की भी हो रही है। राजनीतिक हलकों में माना जा रहा है कि राहुल गांधी के मजबूत इरादों और कार्यों को लेकर कुछ राज्यों में कांग्रेस ने अपने सहयोगी दलों के साथ बेहतर तालमेल स्थापित कर अपने लिए अतिरिक्त राजनीतिक अवसर तैयार किए हैं। कांग्रेस द्वारा घोषित उम्मीदवारों में झारखंड से प्रणव झा और तमिलनाडु से प्रवीण चक्रवर्ती का नाम विशेष महत्व रखता है। झारखंड में कांग्रेस के पास अपने दम पर राज्यसभा सीट जीतने के लिए पर्याप्त संख्या नहीं है, लेकिन महागठबंधन में शामिल झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के समर्थन से उसके उम्मीदवार की राह आसान मानी जा रही है। विधानसभा में झामुमो के पास 34 और कांग्रेस के पास 16 विधायक हैं। ऐसे में गठबंधन की एकजुटता कांग्रेस के लिए निर्णायक साबित हो सकती है। तमिलनाडु में भी कांग्रेस को सहयोगी दल का समर्थन मिला है। मुख्यमंत्री विजय की पार्टी टीवीके द्वारा राज्यसभा की रिक्त सीट कांग्रेस को देने का निर्णय राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसे दोनों दलों के बीच बढ़ते विश्वास और गठबंधन की मजबूती के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। कांग्रेस रणनीतिकार प्रवीण चक्रवर्ती की संभावित राज्यसभा एंट्री को भी पार्टी की दीर्घकालिक राजनीतिक रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। दूसरी ओर आंध्र प्रदेश में भाजपा की स्थिति अपेक्षाकृत चुनौतीपूर्ण नजर आ रही है। एनडीए के भीतर सीटों के संभावित बंटवारे को लेकर चल रही चर्चाओं में तेलुगु देशम पार्टी और जन सेना पार्टी को प्राथमिकता मिलने की बात सामने आई है। यदि यही समीकरण अंतिम रूप लेता है तो भाजपा को राज्यसभा की सीट नहीं मिल पाएगी। लचीलेपन के साथ कांग्रेस की सक्रियता बढ़ी राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन घटनाक्रमों से गठबंधन राजनीति में कांग्रेस की सक्रियता और लचीले रुख का संकेत मिलता है। हाल के चुनावी परिणामों और सहयोगी दलों के साथ बढ़ते समन्वय को कांग्रेस नेतृत्व, विशेषकर राहुल गांधी की राजनीतिक स्वीकार्यता से भी जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि अंतिम तस्वीर मतदान और परिणामों के बाद ही स्पष्ट होगी, लेकिन फिलहाल राज्यसभा चुनावों ने यह संकेत जरूर दिया है कि राष्ट्रीय राजनीति में गठबंधन प्रबंधन आने वाले समय में निर्णायक भूमिका निभा सकता है। कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए यह चुनाव केवल सीटों का नहीं, बल्कि सहयोगियों के साथ रिश्तों की मजबूती का भी परीक्षण माना जा रहा है। हिदायत/ईएमएस 05जून26