(08 जून विश्व महासागर दिवस) शायद ही कोई ऐसा इंसान होगा जिसे समंदर किनारे बैठना अच्छा न लगता हो। पानी की उठती-गिरती लहरें, ठंडी हवा और दूर तक फैला नीला पानी हर किसी का मन मोह लेता है। लेकिन क्या कभी हम यह सोचते हैं कि जिस समंदर को हम सिर्फ घूमने-फिरने की जगह समझते हैं, वो असल में हमारी हर सांस से जुड़ा हुआ है? आज 8 जून को पूरी दुनिया विश्व महासागर दिवस मना रही है। यह दिन सिर्फ अख़बारों में बधाई देने या भाषण झाड़ने का दिन नहीं है। यह दिन एक चेतावनी है उस समंदर की तरफ से, जो इंसानों की गलतियों की वजह से अब धीरे-धीरे बीमार पड़ रहा है। संयुक्त राष्ट्र ने इस बार रीइमेजिन यानी फिर से सोचने की बात कही है, जो हमें याद दिलाती है कि अगर समंदर नहीं बचा, तो हमारा वजूद भी नहीं बचेगा। किताबों में तो लिख दिया जाता है कि धरती पर सत्तर प्रतिशत पानी है। लेकिन आसान भाषा में समझें तो यह समंदर हमारे ग्रह के फेफड़े हैं। हम जो सांस लेते हैं, उसकी आधी से ज़्यादा ऑक्सीजन समंदर के छोटे-छोटे पौधों से आती है, न कि सिर्फ जंगलों से। दुनिया का मौसम बदलना, टाइम पर बारिश होना और धरती का तापमान काबू में रहना, यह सब इसी नीले समंदर के दम पर मुमकिन हो पाता है। लेकिन इसके बदले में हम इंसान समंदर को क्या दे रहे हैं? सिर्फ और सिर्फ अपना कचरा! हमारे घरों, नालों और फैक्ट्रियों का सारा गंदा पानी और केमिकल आखिरकार समंदर में ही जाकर मिलता है। इससे भी बड़ा दुश्मन है प्लास्टिक। हर साल लाखों टन प्लास्टिक की बोतलें, थैलियां और चिप्स के पैकेट समंदर में फेंक दिए जाते हैं। आज हालत यह है कि समंदर के बीचों-बीच प्लास्टिक के तैरते हुए बड़े-बड़े पहाड़ बन चुके हैं। इस इंसानी लापरवाही की सबसे भारी कीमत बेज़ुबान समुद्री जीव चुका रहे हैं। कछुओं के मुंह में प्लास्टिक की स्ट्रॉ फंस जाती है, तो मछलियों के पेट से टनों प्लास्टिक की थैलियां निकल रही हैं। और नुकसान सिर्फ उनका नहीं हो रहा। जो मछलियां इस प्लास्टिक को खाती हैं, जब वही मछलियां इंसानों की थाली तक पहुंचती हैं, तो वो ज़हर घूम-फिरकर हमारे खुद के शरीर में आ जाता है। अगर हम भारत की बात करें, तो हमारी तटीय सीमा बहुत बड़ी है। करोड़ों मछुआरों के परिवारों की रोटी-रोटी इसी समंदर से चलती है। लेकिन पिछले कुछ सालों में आपने भी ध्यान दिया होगा कि समुद्री तूफानों की गिनती अचानक बढ़ गई है। आए दिन चक्रवात तबाही मचाते हैं। ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि हमारी गलतियों से समंदर गर्म हो रहा है और उसका गुस्सा इन तूफानों के रूप में हमारे शहरों पर फूट रहा है। हम प्रकृति को जो दे रहे हैं, वही लौटकर हमारे पास आ रहा है। अब सवाल यह है कि एक आम आदमी क्या कर सकता है? हमें कोई बहुत बड़ा काम नहीं करना है, बस अपनी छोटी-छोटी आदतें बदलनी हैं। जब भी हम किसी बीच या नदी किनारे घूमने जाएं, तो वहां कचरा न फैलाएं। सिंगल-यूज़ प्लास्टिक का इस्तेमाल बंद कर दें। आज हमारे हाथ से छूटी एक प्लास्टिक की बोतल कल किसी मासूम जीव की जान ले सकती है। रही बात सरकारों और नेताओं की, तो बड़े-बड़े वादे और कागजी नियम बहुत बन चुके। अब ज़रूरत इस बात की है कि फैक्ट्रियों के मालिक और नगर निगम वाले शहर का गंदा नाला सीधे नदियों और समंदर में गिराना बंद करें। जब तक इन पर तगड़ा जुर्माना नहीं लगेगा और कैमरे लगाकर निगरानी नहीं होगी, तब तक कुछ बदलने वाला नहीं है। आखिर में बात बस इतनी सी है कि समंदर हमें चुपचाप जीवन दे रहा है और हम बदले में उसे धीरे-धीरे मार रहे हैं। अगर हम आज भी नहीं सुधरे, तो आने वाले समय में समंदर किनारे सिर्फ कचरे के ढेर और बदबू ही मिलेगी, सुकून नहीं। इसलिए, इस 8 जून को मोबाइल पर केवल फोटो और स्टेटस लगाने का दिखावा करने के बजाय, खुद से एक छोटा सा वादा करें कि हम अपनी तरफ से गंदगी नहीं फैलाएंगे। (लेखक पत्रकार हैं) ईएमएस / 07 जून 26