संसद में जब विपक्षी दल सरकार पर नोटबंदी को लेकर विरोध जता रहे थे उस समय पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा था जनता को यदि परेशानी होती तो वह सड़कों पर होती। जनता को नोटबंदी से कोई परेशानी नहीं है, विपक्षियों को नुकसान हुआ है इसलिए वह विरोध जता रहे हैं। कुछ समय पहले मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत जी ने बेरोजगार युवाओं को कॉकरोच की पहचान से नवाजा था। इसके विरोध में सारे युवा एकजुट हो रहे हैं। उनका कहना है कि सरकार शिक्षा, रोजगार, नौकरी और स्वास्थ्य सेवाएं नहीं दे पा रही है। स्नातक और पर परास्नातक की डिग्री लेने के बाद भी युवा बेरोजगार होकर यहां से वहां घूम रहे हैं। नीट जैसी परीक्षा के पेपर लीक हो रहे हैं। हर परीक्षा में धांधली हो रही है। ऐसी स्थिति में युवाओं के बारे में जो टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने की उसने युवा कॉकरोच को सड़कों पर लाकर खड़ा कर दिया है। रही सही कसर नीट परीक्षा का पेपर लीक होना तथा सीबीएसई के परीक्षा परिणाम में जिस तरह की गड़बड़ी हुई है उसमें जो भ्रष्टाचार हुआ है उसको लेकर लाखों छात्र और उनके परिवारजन सड़कों पर आने के लिए विवश हुए हैं। 6 जून काकरोचों के लिए एक ऐतिहासिक दिन साबित होने जा रहा है। जब अमेरिका से आकर दीपक अभीजीते के नेतृत्व में हजारों लोगों की भीड़ जंतर मंतर पर पहुंच गई। यह भीड़ अपनी लड़ाई अब स्वंय लड़ने के लिए देश भर में इकट्ठी हो रही है। पिछले कुछ वर्षों से सरकार असंवेदनशील होती चली जा रही है। जन आंदोलनो को सख्ती के साथ दबाया जा रहा है। किसान आंदोलन से लेकर अभी तक जितने भी आंदोलन हुए हैं, सरकार ने आंदोलनो को दबाने के लिए पुलिस का सहारा समय-समय पर लिया है। लाठी चार्ज, वाटर कैनिंग, आंसू गैस के गोले इत्यादि का प्रयोग कर भीड़ को खदेड़ दिया जाता है, लेकिन उनके द्वारा जिन समस्याओं को लेकर आंदोलन किए जा रहे थे उन पर केंद्र एवं राज्य सरकारें कोई निर्णय नहीं लेती हैं। अब पानी सर के ऊपर से गुजर चुका है। महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, बाजारवाद, कर्ज ऐसे मामले हो गए हैं जिनसे सबसे ज्यादा परेशान युवा वर्ग है। पढ़ाई करने के बाद भी उसे कोई रोजगार उपलब्ध नहीं हो रहा है। जो प्रतियोगी अथवा चयन के लिए परीक्षाएं हो रही हैं उन सब में पेपर लीक हो रहे हैं। पिछले दरवाजे से नौकरियां दी जा रही हैं। सारी व्यवस्था सत्ता में बैठे हुए लोगों के हाथ में केंद्रित हो गई है। करोड़ों युवा यहां से वहाँ भाग रहे हैं। ना तो उन्हें कोई काम मिल रहा है ना सरकारी नौकरी मिल रही है और ना ही संविदा नौकरी ही मिल रही है, उल्टे हर परीक्षा के नाम पर बेरोजगारों को लूटा जा रहा है। इससे अब युवा वर्ग नाराज होकर सड़कों पर आ गया है। शासन-प्रशासन और न्यायालय से वह पूरी तरह से निराश हो चुका है। शासन-प्रशासन और न्यायालय, सरकार और पूंजीपतियों के दबाव में काम कर रही हैं, जिसके कारण युवा वर्ग इस समय आक्रोशित है। रही सही कसर चुनाव आयोग ने पूरी कर दी। एसआईआर को लेकर जिस तरह से युवा मतदाताओं को परेशान और प्रताड़ित किया जा रहा है, उन्हें अब यह भी शक होने लगा है कि वह भारत के नागरिक हैं या नहीं। ऐसी स्थिति में अब उसका सड़कों पर उतरना तथा अपने जीवन की आर- पार की लड़ाई लड़ने का जैसे उसे एक लक्ष्य मिल गया है। युवा जिस तरह से आक्रोशित हैं उनका आक्रोश जायज है। जब वह परिवार में जाते हैं तो मां-बाप और परिवारजन उनकी बेरोजगारी को लेकर ताना कसते हैं। 30-35 साल की उम्र हो जाने के बाद भी उनकी शादी नहीं हो पा रही है। शादी नहीं होने का कारण बेरोजगारी है। सरकारी पद करोड़ों की संख्या में खाली पड़े हुए हैं। लोग सेवानिवृत होते जा रहे हैं। सरकारी पदों पर लगातार कटौती की जा रही है। कानून बदल दिए गए हैं। अब ठेके पर संविदा नौकरी दी जा रही है उसमें अधिकतम 12000 से ₹20000 तक मिल रहे हैं। यह नौकरी कभी भी छूट जाती है, जिसके कारण लड़के और लड़कियां शादी के बंधन में बंधना नहीं चाहते हैं। जब इतनी सारी समस्या हो तब केंद्र सरकार, राज्य सरकार और सुप्रीम कोर्ट जैसे सबसे ऊंचे पद पर बैठे हुए लोग युवाओं की अनदेखी करें ऐसी स्थिति में युवाओं को सड़कों पर उतरने के अलावा कोई चारा भी नहीं है। केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करना होगा। ऐसा क्यों हो रहा है, भारत सबसे बड़ा युवा आबादी वाला देश है। चीन जैसा देश जो कभी आबादी में सबसे बड़ा होता था उसने पिछले 30 वर्षों में जो विकास किया है उसने सारी दुनिया को चौंका दिया है। आज चीन निर्माण, रिसर्च और तकनीकी के क्षेत्र में सबसे आगे है और वह एक महाशक्ति बनने की कगार पर आकर खड़ा हो गया है। जिस तरह से चीन अमेरिका और रूस के मुकाबले आर्थिक और सामरिक संसाधनों से युक्त होते हुए उनके सामने खड़ा है। यह चीन की बड़ी सफलता है, लेकिन भारत इन्हीं 30 वर्षों में किस तरीके से चीन के ऊपर निर्भर होता चला गया है, हमने अपनी युवा पीढ़ी को सही दिशा देने में निश्चित रूप से कोई कोताही बरती है जिसके कारण पिछले 30 वर्षों में चीन के मुकाबले भारत तेजी के साथ बिछड़ना जा रहा है और आज हमारी सबसे बड़ी शक्ति जो युवा पीढ़ी के रूप में हमारे साथ है। वह आज सरकार, शासन-प्रशासन और पूंजीवाद के विरोध में सड़कों पर आने के लिए विवश हो गई है। सरकार इस गंभीर मामले को हल्के मे ले रही है। उसके कारण यह चिंता बढ़ना स्वाभाविक है कि आने वाला भविष्य भारत का किस तरह का होगा। युवा पीढ़ी के सामने अपना पूरा भविष्य पड़ा हुआ है यदि वही युवा आज अंधेरे में हाथ पैर मार रहा है। ऐसी स्थिति में स्थिति काफी चिंतनीय हो गई है। न्यायपालिका भी इस समय सरकार के दबाव में है। युवाओं का विश्वास न्यायपालिका से खत्म होता हुआ दिख रहा है यह स्थिति और भी चिंता को बढ़ा देती है। सही मायने में मुख्य न्यायाधीश ने युवाओं को कॉकरोच कहकर एक बड़े वर्ग में जो हलचल पैदा की है वह समुद्र मंथन की तरह है। अब इस मंथन से क्या निकाल कर आता है यह समय तय करेगा। ईएमएस / 07 जून 26