लेख
07-Jun-2026
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इंसानियत को सबसे बड़ा धर्म कहा जाता है, और हाल ही में मीडिया की सुर्खियों में आई एक घटना ने इस सत्य को फिर से प्रमाणित किया है।पाठक जानते होंगे कि दिल्ली के मालवीय नगर इलाके के एक होटल में 3 जून 2026, बुधवार को सुबह लगभग 9:45 बजे भीषण आग लग गई, जिसमें 21 लोगों की जान चली गई। मृतकों में 11 विदेशी नागरिक भी शामिल थे, जिनमें से अधिकांश अपने रिश्तेदारों के इलाज के लिए दिल्ली आए थे और उसी होटल में ठहरे हुए थे। इस दुखद घटना के दौरान एक तस्वीर ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। तस्वीर में कई लोग होटल की ऊंचाई से सड़क पर बिछाए गए गद्दों पर कूदकर अपनी जान बचाते दिखाई दिए। मीडिया में प्रकाशित समाचारों के अनुसार यह साहसिक और सूझबूझ भरा कार्य होटल के ठीक सामने गद्दों की दुकान चलाने वाले रियाजुद्दीन मंसूरी और उनके बेटे अरमान मंसूरी ने किया था। आग की भयावहता को देखते हुए उन्होंने तुरंत अपनी दुकान के गद्दे सड़क पर बिछा दिए, जिससे होटल में फंसे लोग उन पर कूदकर सुरक्षित बाहर निकल सके।उपलब्ध जानकारी के अनुसार सड़क पर बिछाए गए गद्दों पर एक बार में सात से आठ लोगों ने छलांग लगाई, जबकि बाद में यह संख्या बढ़कर बारह से पंद्रह लोगों तक पहुंच गई। इस प्रयास से कई लोगों की जान बच गई। रियाजुद्दीन और उनके बेटे ने केवल इतना ही नहीं किया, बल्कि उन्होंने घायलों को बाहर निकालने में भी सहायता की और उन्हें अस्पताल भिजवाने के लिए चादरें तथा अन्य आवश्यक कपड़े उपलब्ध कराए। यहां तक कि एंबुलेंस से शव ले जाने के लिए भी उन्होंने बेडशीट और रजाइयों के कवर दिए। इस मानवीय कार्य के दौरान उनकी दुकान का काफी सामान नष्ट हो गया। हालांकि, इस लेख के लिखे जाने तक उनके नुकसान की भरपाई के लिए प्रशासन की ओर से कोई सहायता नहीं मिली थी। इसके बावजूद रियाजुद्दीन मंसूरी इस बात से संतुष्ट हैं कि उन्होंने संकट की घड़ी में लोगों की जान बचाने में योगदान दिया। उन्होंने मीडिया से बातचीत में कहा, आग देखकर जब हमें लगा कि शायद लोग नहीं बच पाएंगे, तो हमने अपनी दुकान के गद्दे रोड पर बिछा दिए। उस पर एक बार में सात से आठ लोग कूदे। फिर उनकी संख्या बढ़कर 12 से 15 हो गई। ये सब सुरक्षित बच गए। फिर हमने एंबुलेंस से बॉडी ले जाने के लिए भी बेड-शीट और रजाई के कवर दिए। मदद का सुकून है, पर दुकान के माल की भरपाई के लिए कोई नहीं आया। रियाजुद्दीन मंसूरी ने यह भी बताया कि यदि होटल का दूसरा निकास द्वार खुला होता, तो और अधिक लोगों की जान बचाई जा सकती थी। इस दुर्घटना के दौरान मालवीय नगर थाने में तैनात हवलदारों और सिपाहियों ने भी राहत एवं बचाव अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई तथा लोगों को सुरक्षित निकालने के लिए लगातार प्रयास किए, यह सराहनीय है। दिल्ली की इस भीषण आग के दौरान जो दृश्य सामने आए, वे इस बात का जीवंत प्रमाण हैं कि आज के स्वार्थ और भागदौड़ से भरे युग में भी इंसानियत पूरी तरह जीवित है। संकट के समय कुछ लोगों द्वारा दिखाया गया साहस, संवेदनशीलता और निःस्वार्थ सेवा मानवता की सर्वोच्च भावना को अभिव्यक्त करता है। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने भी कहा है-वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे, यही पशु-प्रवृत्ति है कि आप ही आप चरे। ईश्वर ने मनुष्य को इस धरती का सबसे विवेकशील प्राणी बनाया है। इसलिए केवल अपने स्वार्थ, भोजन और संग्रह के लिए जीवन व्यतीत करना पशु-प्रवृत्ति के समान है। मानव जीवन का उद्देश्य इससे कहीं अधिक व्यापक और उच्च होना चाहिए। जब मनुष्य अपने विवेक को भूलकर अभिमान और अहंकार के प्रभाव में जीने लगता है, तब वह पतन के मार्ग पर अग्रसर हो जाता है। आपदाएं और विपरीत परिस्थितियां पलभर में मनुष्य को उसकी सीमाओं और बेबसी का एहसास करा देती हैं। वास्तव में संसार में इंसानियत से बड़ा कोई धर्म, मजहब या आस्था नहीं है। सच्चा मनुष्य वही है जो बिना किसी भेदभाव के संकट में फंसे लोगों की सहायता करे और उनके दुःख को अपना दुःख समझे। परोपकार, करुणा, सहानुभूति और सेवा की भावना ही मानव जीवन को सार्थक बनाती है। दिल्ली की यह घटना हमें याद दिलाती है कि मानवता आज भी जीवित है और यही मानव सभ्यता की सबसे बड़ी शक्ति है। (सुनील कुमार महला, फ्रीलांस राइटर, कॉलमिस्ट व युवा साहित्यकार, पिथौरागढ़, उत्तराखंड।) ईएमएस / 07 जून 26